Ta-Ha

سورة طه

सूरह 20 · मक्की · 135 आयतें

20:1जुज़ 16 · पृ. 312

طه1

ता, हा।
20:2जुज़ 16 · पृ. 312

مَا أَنْزَلْنَا عَلَيْكَ الْقُرْآنَ لِتَشْقَىٰ2

हमने नहीं अवतरित किया है आपपर क़ुर्आन इस लिए कि आप दुःखी हों[1]।
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1. अर्थात विरोधियों के ईमान न लाने पर।
20:3जुज़ 16 · पृ. 312

إِلَّا تَذْكِرَةً لِمَنْ يَخْشَىٰ3

परन्तु ये उसकी शिक्षा के लिए है, जो डरता[1] हो।
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1. अर्थात ईमान न लाने तथा कुकर्मों के दुष्परिणाम से।
20:4जुज़ 16 · पृ. 312

تَنْزِيلًا مِمَّنْ خَلَقَ الْأَرْضَ وَالسَّمَاوَاتِ الْعُلَى4

उतारा जाना उस ओर से है, जिसने उत्पत्ति की है धरती तथा उच्च आकाशों की।
20:5जुज़ 16 · पृ. 312

الرَّحْمَٰنُ عَلَى الْعَرْشِ اسْتَوَىٰ5

जो अत्यंत कृपाशील, अर्श पर स्थिर है।
20:6जुज़ 16 · पृ. 312

لَهُ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ وَمَا بَيْنَهُمَا وَمَا تَحْتَ الثَّرَىٰ6

उसी का[1] है, जो आकाशों, जो धरती में, जो दोनों के बीच तथा जो भूमि के नीचे है।
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1. अर्थात उसी के स्वामित्व में तथा उसी के अधीन है।
20:7जुज़ 16 · पृ. 312

وَإِنْ تَجْهَرْ بِالْقَوْلِ فَإِنَّهُ يَعْلَمُ السِّرَّ وَأَخْفَى7

यदि तुम उच्च स्वर में बात करो, तो वास्तव में, वह जानता है भेद को तथा अत्यधिक छुपे भेद को।
20:8जुज़ 16 · पृ. 312

اللَّهُ لَا إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ ۖ لَهُ الْأَسْمَاءُ الْحُسْنَىٰ8

वही अल्लाह है, नहीं है कोई वंदनीय (पूज्य) परन्तु वही। उसी के उत्तम नाम हैं।
20:9जुज़ 16 · पृ. 312

وَهَلْ أَتَاكَ حَدِيثُ مُوسَىٰ9

और (हे नबी!) क्या आपको मूसा की बात पहुँची?
20:10जुज़ 16 · पृ. 312

إِذْ رَأَىٰ نَارًا فَقَالَ لِأَهْلِهِ امْكُثُوا إِنِّي آنَسْتُ نَارًا لَعَلِّي آتِيكُمْ مِنْهَا بِقَبَسٍ أَوْ أَجِدُ عَلَى النَّارِ هُدًى10

जब उसने देखी एक अग्नि, फिर कहा अपने परिवार सेः रुको, मैंने एक अग्नि देखी है, सम्भव है कि मैं तुम्हारे पास उसका कोई अंगार लाऊँ अथवा पा जाऊँ आग पर मार्ग की कोई सूचना[1]।
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1. यह उस समय की बात है, जब मूसा अपने परिवार के साथ मद्यन नगर से मिस्र आ रहे थे और मार्ग भूल गये थे।
20:11जुज़ 16 · पृ. 312

فَلَمَّا أَتَاهَا نُودِيَ يَا مُوسَىٰ11

फिर जब वहाँ पहुँचा, तो पुकारा गयाः हे मूसा!
20:12जुज़ 16 · पृ. 312

إِنِّي أَنَا رَبُّكَ فَاخْلَعْ نَعْلَيْكَ ۖ إِنَّكَ بِالْوَادِ الْمُقَدَّسِ طُوًى12

वास्तव में, मैं ही तेरा पालनहार हूँ, तू उतार दे अपने दोनों जूते, क्योंकि तू पवित्र वादी (उपत्यका) "तुवा" में है।
20:13जुज़ 16 · पृ. 313

وَأَنَا اخْتَرْتُكَ فَاسْتَمِعْ لِمَا يُوحَىٰ13

और मैंने तुझे चुन[1] लिया है। अतः ध्यान से सुन, जो वह़्यी की जा रही है।
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1. अर्थात नबी बना दिया।
20:14जुज़ 16 · पृ. 313

إِنَّنِي أَنَا اللَّهُ لَا إِلَٰهَ إِلَّا أَنَا فَاعْبُدْنِي وَأَقِمِ الصَّلَاةَ لِذِكْرِي14

निःसंदेह मैं ही अल्लाह हूँ, मेरे सिवा कोई पूज्य नहीं, तो मेरी ही इबादत (वंदना) कर तथा मेरे स्मरण (याद) के लिए नमाज़ की स्थापना[1] कर।
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1. इबादत में नमाज़ सम्मिलित है, फिर भी उस का महत्व दिखाने के लिये उस का विशेष आदेश दिया गया है।
20:15जुज़ 16 · पृ. 313

إِنَّ السَّاعَةَ آتِيَةٌ أَكَادُ أُخْفِيهَا لِتُجْزَىٰ كُلُّ نَفْسٍ بِمَا تَسْعَىٰ15

निश्चय प्रलय आने वाली है, मैं उसे गुप्त रखना चाहता हूँ, ताकि प्रतिकार (बदला) दिया जाये, प्रत्येक प्राणी को उसके प्रयास के अनुसार।
20:16जुज़ 16 · पृ. 313

فَلَا يَصُدَّنَّكَ عَنْهَا مَنْ لَا يُؤْمِنُ بِهَا وَاتَّبَعَ هَوَاهُ فَتَرْدَىٰ16

अतः, तुम्हें न रोक दे, उस ( के विश्वास) से, जो उसपर ईमान (विश्वास) नहीं रखता और अनुसरण किया अपनी इच्छा का, अन्यथा तेरा नाश हो जायेगा।
20:17जुज़ 16 · पृ. 313

وَمَا تِلْكَ بِيَمِينِكَ يَا مُوسَىٰ17

और हे मूसा! ये तेरे दाहिने हाथ में क्या है?
20:18जुज़ 16 · पृ. 313

قَالَ هِيَ عَصَايَ أَتَوَكَّأُ عَلَيْهَا وَأَهُشُّ بِهَا عَلَىٰ غَنَمِي وَلِيَ فِيهَا مَآرِبُ أُخْرَىٰ18

उत्तर दियाः ये मेरी लाठी है; मैं इसपर सहारा लेता हूँ, इससे अपनी बकरियों के लिए पत्ते झाड़ता हूँ तथा मेरी इसमें दूसरी आवश्यक्तायें (भी) हैं।
20:19जुज़ 16 · पृ. 313

قَالَ أَلْقِهَا يَا مُوسَىٰ19

कहाः इसे फेंकिए, हे मूसा!
20:20जुज़ 16 · पृ. 313

فَأَلْقَاهَا فَإِذَا هِيَ حَيَّةٌ تَسْعَىٰ20

तो उसने उसे फेंक दिया और सहसा वह एक सर्प थी, जो दोड़ रहा था।
20:21जुज़ 16 · पृ. 313

قَالَ خُذْهَا وَلَا تَخَفْ ۖ سَنُعِيدُهَا سِيرَتَهَا الْأُولَىٰ21

कहाः पकड़ ले इसे, और डर नहीं, हम इसे फेर देंगे, इसकी प्रथम स्थिति की ओर।
20:22जुज़ 16 · पृ. 313

وَاضْمُمْ يَدَكَ إِلَىٰ جَنَاحِكَ تَخْرُجْ بَيْضَاءَ مِنْ غَيْرِ سُوءٍ آيَةً أُخْرَىٰ22

और अपना हाथ लगा दे अपनी कांख (बग़ल) की ओर, वह निकलेगा चमकता हुआ बिना किसी रोग के, ये दूसरा चमत्कार है।
20:23जुज़ 16 · पृ. 313

لِنُرِيَكَ مِنْ آيَاتِنَا الْكُبْرَى23

ताकि हम तुझे दिखायें, अपनी बड़ी निशानियाँ।
20:24जुज़ 16 · पृ. 313

اذْهَبْ إِلَىٰ فِرْعَوْنَ إِنَّهُ طَغَىٰ24

तुम फ़िरऔन के पास जाओ, वह विद्रोही हो गया है।
20:25 · My Lord, expand my chestजुज़ 16 · पृ. 313

قَالَ رَبِّ اشْرَحْ لِي صَدْرِي25

मूसा ने प्रार्थना कीः हे मेरे पालनहार! खोल दे, मेरे लिए मेरा सीना।
20:26जुज़ 16 · पृ. 313

وَيَسِّرْ لِي أَمْرِي26

तथा सरल कर दे, मेरे लिए मेरा काम।
20:27जुज़ 16 · पृ. 313

وَاحْلُلْ عُقْدَةً مِنْ لِسَانِي27

और खोल दे, मेरी ज़ुबान की गाँठ।
20:28जुज़ 16 · पृ. 313

يَفْقَهُوا قَوْلِي28

ताकि लोग मेरी बात समझें।
20:29जुज़ 16 · पृ. 313

وَاجْعَلْ لِي وَزِيرًا مِنْ أَهْلِي29

तथा बना दे, मेरा एक सहायक मेरे परिवार में से।
20:30जुज़ 16 · पृ. 313

هَارُونَ أَخِي30

मेरे भीई हारून को।
20:31जुज़ 16 · पृ. 313

اشْدُدْ بِهِ أَزْرِي31

उसके द्वारा दृढ़ कर दे मेरी शक्ति को।
20:32जुज़ 16 · पृ. 313

وَأَشْرِكْهُ فِي أَمْرِي32

और साझी बना दे, उसे मेरे काम में।
20:33जुज़ 16 · पृ. 313

كَيْ نُسَبِّحَكَ كَثِيرًا33

ताकि हम दोनों तेरी पवित्रता का गान अधिक करें।
20:34जुज़ 16 · पृ. 313

وَنَذْكُرَكَ كَثِيرًا34

तथा तुझे अधिक स्मरण (याद) करें।
20:35जुज़ 16 · पृ. 313

إِنَّكَ كُنْتَ بِنَا بَصِيرًا35

निःसंदेह, तू हमें भली प्रकार देखने-भालने वाला है।
20:36जुज़ 16 · पृ. 313

قَالَ قَدْ أُوتِيتَ سُؤْلَكَ يَا مُوسَىٰ36

अल्लाह ने कहाः हे मूसा! तेरी सब माँग पूरी कर दी गयी।
20:37जुज़ 16 · पृ. 313

وَلَقَدْ مَنَنَّا عَلَيْكَ مَرَّةً أُخْرَىٰ37

और हम उपकार कर चुके हैं तुमपर एक बार और[1] (भी)।
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1. यह उस समय की बात है जब मूसा का जन्म हुआ। उस समय फ़िरऔन का आदेश था कि बनी इस्राईल में जो भी शिशु जन्म ले, उसे वध कर दिया जाये।
20:38जुज़ 16 · पृ. 314

إِذْ أَوْحَيْنَا إِلَىٰ أُمِّكَ مَا يُوحَىٰ38

जब हमने उतार दिया, तेरी माँ के दिल में, जिसकी वह़्यी (प्रकाश्ना) की जा रही है।
20:39जुज़ 16 · पृ. 314

أَنِ اقْذِفِيهِ فِي التَّابُوتِ فَاقْذِفِيهِ فِي الْيَمِّ فَلْيُلْقِهِ الْيَمُّ بِالسَّاحِلِ يَأْخُذْهُ عَدُوٌّ لِي وَعَدُوٌّ لَهُ ۚ وَأَلْقَيْتُ عَلَيْكَ مَحَبَّةً مِنِّي وَلِتُصْنَعَ عَلَىٰ عَيْنِي39

कि इसे रख दे ताबूत (सन्दूक़) में, फिर उसे नदी में डाल दे, फिर नदी उसे किनारे लगा देगी, जिसे उठा लेगा मेरा शत्रु तथा उसका शत्रु[1] और मैंने डाल दिया तुझपर अपनी ओर से विशेष[2] प्रेम, ताकि तेरा पालन-पोषण मेरी रक्षा में हो।
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1. इस से तात्पर्य मिस्र का राजा फ़िरऔन है। 2. अर्थात तुम्हें सब का प्रिय अथवा फ़िरऔन का भी प्रिय बना दिया।
20:40जुज़ 16 · पृ. 314

إِذْ تَمْشِي أُخْتُكَ فَتَقُولُ هَلْ أَدُلُّكُمْ عَلَىٰ مَنْ يَكْفُلُهُ ۖ فَرَجَعْنَاكَ إِلَىٰ أُمِّكَ كَيْ تَقَرَّ عَيْنُهَا وَلَا تَحْزَنَ ۚ وَقَتَلْتَ نَفْسًا فَنَجَّيْنَاكَ مِنَ الْغَمِّ وَفَتَنَّاكَ فُتُونًا ۚ فَلَبِثْتَ سِنِينَ فِي أَهْلِ مَدْيَنَ ثُمَّ جِئْتَ عَلَىٰ قَدَرٍ يَا مُوسَىٰ40

जब चल रही थी तेरी बहन[1], फिर कह रही थीः क्या मैं तुम्हें उसे बता दूँ, जो इसका लालन-पालन करे? फिर हमने पुनः तुम्हें पहुँचा दिया तुम्हारी माँ के पास, ताकि उसकी आँख ठण्डी हो और उदासीन न हो तथा हे मूसा! तूने मार दिया एक व्यक्ति को, तो हमने तुझे मुक्त कर दिया चिन्ता[2] से और हमने तेरी भली-भाँति परीक्षा ली। फिर तू रह गया वर्षों मद्यन के लोगों में, फिर तू (मद्यन से) अपने निश्चित समय पर आ गया।
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1. अर्थात संदूक़ के पीछे नदी के किनारे। 2. अर्थात एक फ़िरऔनी को मारा और वह मर गया, तो तुम मद्यन चले गये, इस का वर्णन सूरह क़स़स़ में आयेगा।
20:41जुज़ 16 · पृ. 314

وَاصْطَنَعْتُكَ لِنَفْسِي41

और मैंने बना लिया है तुझे विश्ष अपने लिए।
20:42जुज़ 16 · पृ. 314

اذْهَبْ أَنْتَ وَأَخُوكَ بِآيَاتِي وَلَا تَنِيَا فِي ذِكْرِي42

जा तू और तेरा भाई, मेरी निशानियाँ लेकर और दोनों आलस्य न करना मेरे स्मरण (याद) में।
20:43जुज़ 16 · पृ. 314

اذْهَبَا إِلَىٰ فِرْعَوْنَ إِنَّهُ طَغَىٰ43

तुम दोनों फ़िरऔन के पास जाओ, वास्तव में, वह उल्लंघन कर गया है।
20:44जुज़ 16 · पृ. 314

فَقُولَا لَهُ قَوْلًا لَيِّنًا لَعَلَّهُ يَتَذَكَّرُ أَوْ يَخْشَىٰ44

फिर उससे कोमल बोल बोलो, कदाचित् वह शिक्षा ग्रहण करे अथवा डरे।
20:45जुज़ 16 · पृ. 314

قَالَا رَبَّنَا إِنَّنَا نَخَافُ أَنْ يَفْرُطَ عَلَيْنَا أَوْ أَنْ يَطْغَىٰ45

दोनों ने कहाः हे हमारे पालनहार! हमें भय है कि वह हमपर अत्याचार अथवा अतिक्रमण कर दे।
20:46जुज़ 16 · पृ. 314

قَالَ لَا تَخَافَا ۖ إِنَّنِي مَعَكُمَا أَسْمَعُ وَأَرَىٰ46

उस (अल्लाह) ने कहाः तुम भय न करो, मैं तुम दोनों के साथ हूँ, सुनता तथा देखता हूँ।
20:47जुज़ 16 · पृ. 314

فَأْتِيَاهُ فَقُولَا إِنَّا رَسُولَا رَبِّكَ فَأَرْسِلْ مَعَنَا بَنِي إِسْرَائِيلَ وَلَا تُعَذِّبْهُمْ ۖ قَدْ جِئْنَاكَ بِآيَةٍ مِنْ رَبِّكَ ۖ وَالسَّلَامُ عَلَىٰ مَنِ اتَّبَعَ الْهُدَىٰ47

तुम उसके पास जाओ और कहो कि हम तेरे पालनहार के रसूल हैं। अतः, हमारे साथ बनी इस्राईल को जाने दे और उन्हें यातना न दे, हम तेरे पास तेरे पालनहार की निशानी लाये हैं और शान्ति उसके लिए है, जो मार्गदर्शन का अनुसरण करे।
20:48जुज़ 16 · पृ. 314

إِنَّا قَدْ أُوحِيَ إِلَيْنَا أَنَّ الْعَذَابَ عَلَىٰ مَنْ كَذَّبَ وَتَوَلَّىٰ48

वास्तव में, हमारी ओर वह़्यी (प्रकाशना) की गई है कि यातना उसी के लिए है, जो झुठलाये और मुख फेरे।
20:49जुज़ 16 · पृ. 314

قَالَ فَمَنْ رَبُّكُمَا يَا مُوسَىٰ49

उसने कहाः हे मूसा! कौन है तुम दोनों का पालनहार?
20:50जुज़ 16 · पृ. 314

قَالَ رَبُّنَا الَّذِي أَعْطَىٰ كُلَّ شَيْءٍ خَلْقَهُ ثُمَّ هَدَىٰ50

मूसा ने कहाः हमारा पालनहार वह है, जिसने प्रत्येक वस्तु को उसका विशेष रूप प्रदान किया, फिर मार्गदर्शन[1] दिया।
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1. आयत का भावार्थ यह है कि अल्लाह ने प्रत्येक जीव जन्तु के योग्य उस का रूप बनाया है। और उस के जीवन की आवश्यक्ता के अनुसार उसे खाने पीने तथा निवास की विधि समझा दी है।
20:51जुज़ 16 · पृ. 314

قَالَ فَمَا بَالُ الْقُرُونِ الْأُولَىٰ51

उसने कहाः फिर उनकी दशा क्या होनी है, जो पूर्व के लोग हैं?
20:52जुज़ 16 · पृ. 315

قَالَ عِلْمُهَا عِنْدَ رَبِّي فِي كِتَابٍ ۖ لَا يَضِلُّ رَبِّي وَلَا يَنْسَى52

मूसा ने कहाः उसका ज्ञान मेरे पालनहार के पास एक लेख्य में सुरक्षित है, मेरा पालनहार न तो चूकता है और न[1] भूलता है।
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1. अर्थात उन्हों ने जैसा किया होगा, उन के आगे उन का परिणाम आयेगा।
20:53जुज़ 16 · पृ. 315

الَّذِي جَعَلَ لَكُمُ الْأَرْضَ مَهْدًا وَسَلَكَ لَكُمْ فِيهَا سُبُلًا وَأَنْزَلَ مِنَ السَّمَاءِ مَاءً فَأَخْرَجْنَا بِهِ أَزْوَاجًا مِنْ نَبَاتٍ شَتَّىٰ53

जिसने तुम्हारे लिए धरती को बिस्तर बनाया और तुम्हारे चलने के लिए उसमें मार्ग बनाये और तुम्हारे लिए आकाश से जल बरसाया, फिर उसके द्वारा विभिन्न प्रकार की उपज निकाली।
20:54जुज़ 16 · पृ. 315

كُلُوا وَارْعَوْا أَنْعَامَكُمْ ۗ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَآيَاتٍ لِأُولِي النُّهَىٰ54

तुम स्वयं खाओ तथा अपने पशुओं को चराओ, वस्तुतः, इसमें बहुत-सी निशानियाँ हैं बुध्दिमानों के लिए।
20:55जुज़ 16 · पृ. 315

۞ مِنْهَا خَلَقْنَاكُمْ وَفِيهَا نُعِيدُكُمْ وَمِنْهَا نُخْرِجُكُمْ تَارَةً أُخْرَىٰ55

इसी (धरती) से हमने तुम्हारी उत्पत्ति की है, इसीमें तुम्हें वापस ले जायेंगे और इसीसे तुम सबको पुनः[1] निकालेंगे।
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1. अर्थात प्रलय के दिन पुनः जीवित निकालेंगे।
20:56जुज़ 16 · पृ. 315

وَلَقَدْ أَرَيْنَاهُ آيَاتِنَا كُلَّهَا فَكَذَّبَ وَأَبَىٰ56

और हमने उसे दिखा दी अपनी सभी निशानियाँ, फिर भी उसने झुठला दिया और नहीं माना।
20:57जुज़ 16 · पृ. 315

قَالَ أَجِئْتَنَا لِتُخْرِجَنَا مِنْ أَرْضِنَا بِسِحْرِكَ يَا مُوسَىٰ57

उसने कहाः क्या तू हमारे पास इसलिए आया है कि हमें हमारी धरती (देश) से अपने जादू (के बल) से निकाल दे, हे मूसा?
20:58जुज़ 16 · पृ. 315

فَلَنَأْتِيَنَّكَ بِسِحْرٍ مِثْلِهِ فَاجْعَلْ بَيْنَنَا وَبَيْنَكَ مَوْعِدًا لَا نُخْلِفُهُ نَحْنُ وَلَا أَنْتَ مَكَانًا سُوًى58

फिर तो हम तेरे पास अवश्य इसीके समान जादू लायेंगे, अतः हमारे और अपने बीच एक समय निर्धारित कर ले, जिसके विरुध्द न हम करेंगे और न तुम, एक खुले मैदान में।
20:59जुज़ 16 · पृ. 315

قَالَ مَوْعِدُكُمْ يَوْمُ الزِّينَةِ وَأَنْ يُحْشَرَ النَّاسُ ضُحًى59

मूसा ने कहाः तुम्हारा निर्धारित समय शोभा (उत्सव) का दिन[1] है तथा ये कि लोग दिन चढ़े एकत्र हो जायेँ।
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1. इस से अभिप्राय उन का कोई वार्षिक उत्सव (मेले) का दिन था।
20:60जुज़ 16 · पृ. 315

فَتَوَلَّىٰ فِرْعَوْنُ فَجَمَعَ كَيْدَهُ ثُمَّ أَتَىٰ60

फिर फ़िरऔन लौट गया,[1] अपने हथकण्डे एकत्र किये और फिर आया।
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1. मूसा के सत्य को न मान कर, मुक़ाबले की तैयारी में व्यस्त हो गया।
20:61जुज़ 16 · पृ. 315

قَالَ لَهُمْ مُوسَىٰ وَيْلَكُمْ لَا تَفْتَرُوا عَلَى اللَّهِ كَذِبًا فَيُسْحِتَكُمْ بِعَذَابٍ ۖ وَقَدْ خَابَ مَنِ افْتَرَىٰ61

मूसा ने उन (जादूगरों) से कहाः तुम्हारा विनाश हो! अल्लाह पर मिथ्या आरोप न लगाओ कि वह तुम्हारा किसी यातना द्वारा सर्वनाश कर दे और वह निष्फल ही रहा है, जिसने मिथ्यारोपण किया।
20:62जुज़ 16 · पृ. 315

فَتَنَازَعُوا أَمْرَهُمْ بَيْنَهُمْ وَأَسَرُّوا النَّجْوَىٰ62

फिर[1] उनके बीच विवाद हो गया और वे चुपके-चुपके गुप्त मंत्रणा करने लगे।
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1. अर्थात मूसा (अलैहिस्सलाम) की बात सुन कर उन में मतभेद हो गया। कुछ ने कहा कि यह नबी की बात लग रही है। और कुछ ने कहा कि यह जादूगर है।
20:63जुज़ 16 · पृ. 315

قَالُوا إِنْ هَٰذَانِ لَسَاحِرَانِ يُرِيدَانِ أَنْ يُخْرِجَاكُمْ مِنْ أَرْضِكُمْ بِسِحْرِهِمَا وَيَذْهَبَا بِطَرِيقَتِكُمُ الْمُثْلَىٰ63

कुछ ने कहाः ये दोनों वास्तव में, जादूगर हैं, दोनों चाहते हैं कि तुम्हें तुम्हारी धरती से अपने जादू द्वारा निकाल दें और तुम्हारी आदर्श प्रणाली का अन्त कर दें।
20:64जुज़ 16 · पृ. 315

فَأَجْمِعُوا كَيْدَكُمْ ثُمَّ ائْتُوا صَفًّا ۚ وَقَدْ أَفْلَحَ الْيَوْمَ مَنِ اسْتَعْلَىٰ64

अतः अपने सब उपाय एकत्र कर लो, फिर एक पंक्ति में होकर आ जाओ और आज वही सफल हो गया, जो ऊपर रहा।
20:65जुज़ 16 · पृ. 316

قَالُوا يَا مُوسَىٰ إِمَّا أَنْ تُلْقِيَ وَإِمَّا أَنْ نَكُونَ أَوَّلَ مَنْ أَلْقَىٰ65

उन्होंने कहाः हे मूसा! तू फेंकता है या पहले हम फेंकें?
20:66जुज़ 16 · पृ. 316

قَالَ بَلْ أَلْقُوا ۖ فَإِذَا حِبَالُهُمْ وَعِصِيُّهُمْ يُخَيَّلُ إِلَيْهِ مِنْ سِحْرِهِمْ أَنَّهَا تَسْعَىٰ66

मूसा ने कहाः बल्कि तुम्हीं फेंको। फिर उनकी रस्सियाँ तथा लाठियाँ उसे लग रही थीं कि उनके जादू (के बल) से दौड़ रही हैं।
20:67जुज़ 16 · पृ. 316

فَأَوْجَسَ فِي نَفْسِهِ خِيفَةً مُوسَىٰ67

इससे मूसा अपने मन में डर गया[1]।
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1. मूसा अलैहिस्सलाम को यह भय हुआ कि लोग जादूगरों के धोखे में न आ जायें।
20:68जुज़ 16 · पृ. 316

قُلْنَا لَا تَخَفْ إِنَّكَ أَنْتَ الْأَعْلَىٰ68

हमने कहाः डर मत, तूही ऊपर रहेगा।
20:69जुज़ 16 · पृ. 316

وَأَلْقِ مَا فِي يَمِينِكَ تَلْقَفْ مَا صَنَعُوا ۖ إِنَّمَا صَنَعُوا كَيْدُ سَاحِرٍ ۖ وَلَا يُفْلِحُ السَّاحِرُ حَيْثُ أَتَىٰ69

और फेंक दे, जो तेरे दायें हाथ में है, वह निगल जायेगा, जो कुछ उन्होंने बनाया है। वह केवल जादू का स्वाँग बनाकर लाए हैं तथा जादूगर सफल नहीं होता, जहाँ से आये।
20:70जुज़ 16 · पृ. 316

فَأُلْقِيَ السَّحَرَةُ سُجَّدًا قَالُوا آمَنَّا بِرَبِّ هَارُونَ وَمُوسَىٰ70

अन्ततः, जादूगर सज्दे में गिर गये, उन्होंने कहा कि हम ईमान लाये हारून तथा मूसा के पालनहार पर।
20:71जुज़ 16 · पृ. 316

قَالَ آمَنْتُمْ لَهُ قَبْلَ أَنْ آذَنَ لَكُمْ ۖ إِنَّهُ لَكَبِيرُكُمُ الَّذِي عَلَّمَكُمُ السِّحْرَ ۖ فَلَأُقَطِّعَنَّ أَيْدِيَكُمْ وَأَرْجُلَكُمْ مِنْ خِلَافٍ وَلَأُصَلِّبَنَّكُمْ فِي جُذُوعِ النَّخْلِ وَلَتَعْلَمُنَّ أَيُّنَا أَشَدُّ عَذَابًا وَأَبْقَىٰ71

फ़िरऔन बालाः क्या तुमने उसका विश्वास कर लिया, इससे पूर्व कि मैं तुम्हें आज्ञा दूँ? वास्तव में, वह तुम्हारा बड़ा (गुरू) है, जिसने तुम्हें जादू सिखाया है। तो मैं अवश्य कटवा दूँगा तुम्हारे हाथों तथा पावों को, विपरीत दिशा[1] से और तुम्हें सूली दे दूँगा खजूर के तनों पर तथा तुम्हें अवश्य ज्ञान हो जायेगा कि हममें से किसकी यातना अधिक कड़ी तथा स्थायी है।
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1. अर्थात दाहिना हाथ और बायाँ पैर अथवा बायाँ हाथ और दाहिना पैर।
20:72जुज़ 16 · पृ. 316

قَالُوا لَنْ نُؤْثِرَكَ عَلَىٰ مَا جَاءَنَا مِنَ الْبَيِّنَاتِ وَالَّذِي فَطَرَنَا ۖ فَاقْضِ مَا أَنْتَ قَاضٍ ۖ إِنَّمَا تَقْضِي هَٰذِهِ الْحَيَاةَ الدُّنْيَا72

उन्होंने कहाः हम तुझे कभी उन खुली निशानियों (तर्कों) पर प्रधानता नहीं देंगे, जो हमारे पास आ गयी हैं और न उस (अल्लाह) पर, जिसने हमें पैदा किया है, तू जो करना चाहे, कर ले, तू बस इसी सांसारिक जीवन में आदेश दे सकता है।
20:73जुज़ 16 · पृ. 316

إِنَّا آمَنَّا بِرَبِّنَا لِيَغْفِرَ لَنَا خَطَايَانَا وَمَا أَكْرَهْتَنَا عَلَيْهِ مِنَ السِّحْرِ ۗ وَاللَّهُ خَيْرٌ وَأَبْقَىٰ73

हम तो अपने पालनहार पर ईमान लाये हैं, ताकि वह क्षमा कर दे, हमारे लिए, हमारे पापों को तथा जिस जादू पर तूने हमें बाध्य किया और अल्लाह सर्वोत्तम तथा अनन्त[1] है।
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1. और तेरा राज्य तथा जीवन तो साम्यिक है।
20:74जुज़ 16 · पृ. 316

إِنَّهُ مَنْ يَأْتِ رَبَّهُ مُجْرِمًا فَإِنَّ لَهُ جَهَنَّمَ لَا يَمُوتُ فِيهَا وَلَا يَحْيَىٰ74

वास्तव में, जो जायेगा अपने पालनहार के पास पापी बनकर, तो उसी के लिए नरक है, जिसमें न वह मरेगा और न जीवित रहेगा[1]।
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1. अर्थात उसे जीवन का कोई सुख नहीं मिलेगा।
20:75जुज़ 16 · पृ. 316

وَمَنْ يَأْتِهِ مُؤْمِنًا قَدْ عَمِلَ الصَّالِحَاتِ فَأُولَٰئِكَ لَهُمُ الدَّرَجَاتُ الْعُلَىٰ75

तथा जो उसके पास ईमान लेकर आयेगा, तो उन्हीं के लिए उच्च श्रेणियाँ होंगी।
20:76जुज़ 16 · पृ. 316

جَنَّاتُ عَدْنٍ تَجْرِي مِنْ تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ خَالِدِينَ فِيهَا ۚ وَذَٰلِكَ جَزَاءُ مَنْ تَزَكَّىٰ76

स्थायी स्वर्ग, जिनमें नहरें बहती होंगी, जिनमें सदा वासी होंगे और यही उसका प्रतिफल है, जो पवित्र हो गया।
20:77जुज़ 16 · पृ. 317

وَلَقَدْ أَوْحَيْنَا إِلَىٰ مُوسَىٰ أَنْ أَسْرِ بِعِبَادِي فَاضْرِبْ لَهُمْ طَرِيقًا فِي الْبَحْرِ يَبَسًا لَا تَخَافُ دَرَكًا وَلَا تَخْشَىٰ77

और हमने मूसी की ओर वह़्यी की कि रातों-रात चल पड़ मेरे भक्तों को लेकर और उनके लिए सागर में सूखा मार्ग बना ले[1], तुझे पा लिए जाने का कोई भय नहीं होगा और न डरेगा।
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1. इस का सविस्तार वर्णन सूरह शुअराः 26 में आ रहा है।
20:78जुज़ 16 · पृ. 317

فَأَتْبَعَهُمْ فِرْعَوْنُ بِجُنُودِهِ فَغَشِيَهُمْ مِنَ الْيَمِّ مَا غَشِيَهُمْ78

फिर उनका पीछा किया फ़िरऔन ने अपनी सेना के साथ, तो उनपर सागर छा गया, जैसा कुछ छा गया।
20:79जुज़ 16 · पृ. 317

وَأَضَلَّ فِرْعَوْنُ قَوْمَهُ وَمَا هَدَىٰ79

और कुपथ कर दिया फ़िरऔन ने अपनी जाति को और सुपथ नहीं दिखाया।
20:80जुज़ 16 · पृ. 317

يَا بَنِي إِسْرَائِيلَ قَدْ أَنْجَيْنَاكُمْ مِنْ عَدُوِّكُمْ وَوَاعَدْنَاكُمْ جَانِبَ الطُّورِ الْأَيْمَنَ وَنَزَّلْنَا عَلَيْكُمُ الْمَنَّ وَالسَّلْوَىٰ80

हे इस्राईल के पुत्रो! हमने तुम्हें मुक्त कर दिया तुम्हारे शत्रु से और वचन दिया तुम्हें तूर पर्वत से दाहिनी[1] ओर का तथा तुमपर उतारा "मन्न" तथा "सल्वा"[2]।
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1. अर्ताथ तुम पर तौरात उतारने के लिये। 2. मन्न तथा सल्वा के भाष्य के लिये देखियेः बक़रा, आयतः57
20:81जुज़ 16 · पृ. 317

كُلُوا مِنْ طَيِّبَاتِ مَا رَزَقْنَاكُمْ وَلَا تَطْغَوْا فِيهِ فَيَحِلَّ عَلَيْكُمْ غَضَبِي ۖ وَمَنْ يَحْلِلْ عَلَيْهِ غَضَبِي فَقَدْ هَوَىٰ81

खाओ उन स्वच्छ चीज़ों में से, जो जीविका हमने तुम्हें दी है तथा उल्लंघन न करो उसमें, अन्यथा उतर जायेगा तुमपर मेरा प्रकोप तथा जिसपर उतर जायेगा मेरा प्रकोप, तो निःसंदेह वह गिर गया।
20:82जुज़ 16 · पृ. 317

وَإِنِّي لَغَفَّارٌ لِمَنْ تَابَ وَآمَنَ وَعَمِلَ صَالِحًا ثُمَّ اهْتَدَىٰ82

और मैं निश्चय बड़ा क्षमाशील हूँ उसके लिए, जिसने क्षमा याचना की तथा ईमान लाया और सदाचार किया फिर सुपथ पर रहा।
20:83जुज़ 16 · पृ. 317

۞ وَمَا أَعْجَلَكَ عَنْ قَوْمِكَ يَا مُوسَىٰ83

और हे मूसा! क्या चीज़ तुम्हें ले आई अपनी जाति से पहले[1]?
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1. अर्थात तुम पर्वत की दाहिनी ओर अपनी जाति से पहले क्यों आ गये और उन्हें पीछे क्यों छोड़ दिया?
20:84जुज़ 16 · पृ. 317

قَالَ هُمْ أُولَاءِ عَلَىٰ أَثَرِي وَعَجِلْتُ إِلَيْكَ رَبِّ لِتَرْضَىٰ84

उसने कहाः वे मेरे पीछे आ ही रहे हैं और मैं तेरी सेवा में शीघ्र आ गया, हे मेरे पालनहार! ताकि तू प्रसन्न हो जाये।
20:85जुज़ 16 · पृ. 317

قَالَ فَإِنَّا قَدْ فَتَنَّا قَوْمَكَ مِنْ بَعْدِكَ وَأَضَلَّهُمُ السَّامِرِيُّ85

अल्लाह ने कहाः हमने परीक्षा में डाल दिया तेरी जाति को तेरे (आने के) पश्चात् और कुपथ कर दिया है उन्हें सामरी[1] ने।
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1. सामरी बनी इस्राईल के एक व्यक्ति का नाम है।
20:86जुज़ 16 · पृ. 317

فَرَجَعَ مُوسَىٰ إِلَىٰ قَوْمِهِ غَضْبَانَ أَسِفًا ۚ قَالَ يَا قَوْمِ أَلَمْ يَعِدْكُمْ رَبُّكُمْ وَعْدًا حَسَنًا ۚ أَفَطَالَ عَلَيْكُمُ الْعَهْدُ أَمْ أَرَدْتُمْ أَنْ يَحِلَّ عَلَيْكُمْ غَضَبٌ مِنْ رَبِّكُمْ فَأَخْلَفْتُمْ مَوْعِدِي86

तो मूसा वापस आया अपनी जाति की ओर अति क्रुध्द-शोकातुर होकर। उसने कहाः हे मेरी जाति के लोगो! क्या तुम्हें वचन नहीं दिया था तुम्हारे पालनहार ने एक अच्छा वचन[1]? तो क्या तुम्हें बहुत दिन लग[2] गये? अथवा तुमने चाहा कि उतर जाये कोई प्रकोप तुम्हारे पालनहार की ओर से? अतः तुमने मेरे वचन[3] को भंग कर दिया।
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1. अर्थात धर्म-पुस्तक तौरात देने का वचन। 2. अर्थात वचन की अवधि दीर्घ प्रतीत होने लगी। 3. अर्थात मेरे वापिस आने तक, अल्लाह की इबादत पर स्थिर रहने की जो प्रतिज्ञा की थी।
20:87जुज़ 16 · पृ. 317

قَالُوا مَا أَخْلَفْنَا مَوْعِدَكَ بِمَلْكِنَا وَلَٰكِنَّا حُمِّلْنَا أَوْزَارًا مِنْ زِينَةِ الْقَوْمِ فَقَذَفْنَاهَا فَكَذَٰلِكَ أَلْقَى السَّامِرِيُّ87

उन्होंने उत्तर दिया हमने नहीं भंग किया है तेरा वचन अपनी इच्छा से, परन्तु हमपर लाद दिया गया था जाति[1] के आभूषणों का बोझ, तो हमने उसे फेंक[2] दिया और ऐसे ही फेंक[3] दिया सामरी ने।
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1. जाति से अभिप्रेत फ़िरऔन की जाति है, जिन के आभूषण उन्हों ने उधार ले रखे थे। अर्थात अपने पास रखना नहीं चाहा, और एक अग्नि कुण्ड में फेंक दिया। 3. अर्थात जो कुछ उस के पास था।
20:88जुज़ 16 · पृ. 318

فَأَخْرَجَ لَهُمْ عِجْلًا جَسَدًا لَهُ خُوَارٌ فَقَالُوا هَٰذَا إِلَٰهُكُمْ وَإِلَٰهُ مُوسَىٰ فَنَسِيَ88

फिर वह[1] निकाल लाया उनके लिए एक बछड़े की मूर्ति, जिसकी गाय जैसी ध्वनि (आवाज़) थी, तो सबने कहाः ये है तुम्हारा पूज्य तथा मूसा का पूज्य, (परन्तु) मूसा इसे भूल गया है।
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1. अर्थात सामरी ने आभूषणों को पिघला कर बछड़ा बना लिया।
20:89जुज़ 16 · पृ. 318

أَفَلَا يَرَوْنَ أَلَّا يَرْجِعُ إِلَيْهِمْ قَوْلًا وَلَا يَمْلِكُ لَهُمْ ضَرًّا وَلَا نَفْعًا89

तो क्या वे नहीं देखते कि वह न उनकी किसी बात की उत्तर देता है और न अधिकार रखता है, उनके लिए किसी हानि का, न किसी लाभ का[1]?
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1. फिर वह पूज्य कैसे हो सकता है?
20:90जुज़ 16 · पृ. 318

وَلَقَدْ قَالَ لَهُمْ هَارُونُ مِنْ قَبْلُ يَا قَوْمِ إِنَّمَا فُتِنْتُمْ بِهِ ۖ وَإِنَّ رَبَّكُمُ الرَّحْمَٰنُ فَاتَّبِعُونِي وَأَطِيعُوا أَمْرِي90

और कह दिया था हारून ने इससे पहले ही कि हे मेरी जाति के लोगो! तुम्हारी परीक्षा की गयी है इसके द्वारा और वास्तव में तुम्हारा पालनहार अत्यंत कृपाशील है। अतः मेरा अनुसरण करो तथा मेरे आदेश का पालन करो।
20:91जुज़ 16 · पृ. 318

قَالُوا لَنْ نَبْرَحَ عَلَيْهِ عَاكِفِينَ حَتَّىٰ يَرْجِعَ إِلَيْنَا مُوسَىٰ91

उन्होंने कहाः हमसब उसी के पुजारी रहेंगे, जब तक (तूर से) हमारे पास मूसा वापस न आ जाये।
20:92जुज़ 16 · पृ. 318

قَالَ يَا هَارُونُ مَا مَنَعَكَ إِذْ رَأَيْتَهُمْ ضَلُّوا92

मूसा ने कहाः हे हारून! किस बात ने तुझे रोक दिया, जब तूने उन्हें देखा कि कुपथ हो गये?
20:93जुज़ 16 · पृ. 318

أَلَّا تَتَّبِعَنِ ۖ أَفَعَصَيْتَ أَمْرِي93

कि मेरा अनुसरण न करे? क्या तूने अवज्ञा कर दी मेरे आदेश की?
20:94जुज़ 16 · पृ. 318

قَالَ يَا ابْنَ أُمَّ لَا تَأْخُذْ بِلِحْيَتِي وَلَا بِرَأْسِي ۖ إِنِّي خَشِيتُ أَنْ تَقُولَ فَرَّقْتَ بَيْنَ بَنِي إِسْرَائِيلَ وَلَمْ تَرْقُبْ قَوْلِي94

उसने कहाः मेरे माँ जाये भाई! मेरी दाढ़ी न पकड़ और न मेरा सिर। वास्तव में, मुझे भय हुआ कि आप कहेंगे कि तूने विभेद उत्पन्न कर दिया बनी इस्राईल में और[1] प्रतीक्षा नहीं की मेरी बात (आदेश) की।
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1. देखियेः सूरह आराफ़, आयतः142
20:95जुज़ 16 · पृ. 318

قَالَ فَمَا خَطْبُكَ يَا سَامِرِيُّ95

(मूसा ने) पूछाः तेरा समाचार क्या है, हे सामरी?
20:96जुज़ 16 · पृ. 318

قَالَ بَصُرْتُ بِمَا لَمْ يَبْصُرُوا بِهِ فَقَبَضْتُ قَبْضَةً مِنْ أَثَرِ الرَّسُولِ فَنَبَذْتُهَا وَكَذَٰلِكَ سَوَّلَتْ لِي نَفْسِي96

उसने कहाः मैंने वह चीज़ देखी, जिसे उन्होंने नहीं देखा, तो मैंने ले ली एक मुट्ठी रसूल के पद्चिन्ह से, फिर उसे फेंक दिया और इसी प्रकार सुझा दिया मुझे[1] मेरे मन ने।
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1. अधिकांश भाष्यकारों ने रसूल से अभिप्राय जिब्रील (फ़रिश्ता) लिया है। और अर्थ यह है कि सामरी ने यह बात बनाई कि जब उस ने फ़िरऔन और उस की सेना के डूबने के समय जिब्रील (अलैहिस्सलाम) को घोड़े पर सवार वहाँ देखा तो उन के घोड़े के पद्चिन्ह की मिट्टी रख ली। और जब सोने का बछड़ा बना कर उस धूल को उस पर फेंक दिया तो उस के प्रभाव से उस में से एक प्रकार की आवाज़ निकलने लगी जो उन के कुपथ होने का कारण बनी।
20:97जुज़ 16 · पृ. 318

قَالَ فَاذْهَبْ فَإِنَّ لَكَ فِي الْحَيَاةِ أَنْ تَقُولَ لَا مِسَاسَ ۖ وَإِنَّ لَكَ مَوْعِدًا لَنْ تُخْلَفَهُ ۖ وَانْظُرْ إِلَىٰ إِلَٰهِكَ الَّذِي ظَلْتَ عَلَيْهِ عَاكِفًا ۖ لَنُحَرِّقَنَّهُ ثُمَّ لَنَنْسِفَنَّهُ فِي الْيَمِّ نَسْفًا97

मूसा ने कहाः जा तेरे लिए जीवन में ये होना है कि तू कहता रहेः मुझे स्पर्श न करना[1]। तथा तेरे लिए एक और[2] वचन है, जिसके विरुध्द कदापि न होगा और अपने पूज्य को देख, जिसका पुजारी बना रहा, हम अवश्य उसे जला देंगे, फिर उसे उड़ा देंगे नदी में चूर-चूर करके।
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1. अर्थात मेरे समीप न आना और न मुझे छूना, मैं अछूत हूँ। 2. अर्थात प्रलोक की यातना का।
20:98जुज़ 16 · पृ. 318

إِنَّمَا إِلَٰهُكُمُ اللَّهُ الَّذِي لَا إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ ۚ وَسِعَ كُلَّ شَيْءٍ عِلْمًا98

निःसंदेह तुम सभी का पूज्य, बस अल्लाह है, कोई पूज्य नहीं है, उसके सिवा। वह समोये हुए है, प्रत्येक वस्तु को (अपने) ज्ञान में।
20:99जुज़ 16 · पृ. 319

كَذَٰلِكَ نَقُصُّ عَلَيْكَ مِنْ أَنْبَاءِ مَا قَدْ سَبَقَ ۚ وَقَدْ آتَيْنَاكَ مِنْ لَدُنَّا ذِكْرًا99

इसी प्रकार, (हे नबी!) हम आपके समक्ष विगत समाचारों में से कुछ का वर्णन कर रहे हैं और हमने आपको प्रदान कर दी है अपने पास से एक शिक्षा (क़ुर्आन)।
20:100जुज़ 16 · पृ. 319

مَنْ أَعْرَضَ عَنْهُ فَإِنَّهُ يَحْمِلُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ وِزْرًا100

जो उससे मुँह फेरेगा, तो वह निश्चय प्रलय के दिन लादे हुए होगा, भारी[1] बोझ।
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3. अर्थात पापों का बोझ।
20:101जुज़ 16 · पृ. 319

خَالِدِينَ فِيهِ ۖ وَسَاءَ لَهُمْ يَوْمَ الْقِيَامَةِ حِمْلًا101

वे सदा रहन वाले होंगे उसमें और प्रलय के दिन उनके लिए बुरा बोझ होगा।
20:102जुज़ 16 · पृ. 319

يَوْمَ يُنْفَخُ فِي الصُّورِ ۚ وَنَحْشُرُ الْمُجْرِمِينَ يَوْمَئِذٍ زُرْقًا102

जिस दिन फूंक दिया जायेगा सूर[1] (नरसिंघा) में, और हम एकत्र कर देंगे उस दिन पापियों को, इस दशा में कि उनकी आँखें (भय से) नीली होंगी।
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1. "सूर" का अर्थ नरसिंघा है, जिस में अल्लाह के आदेश से एक फ़रिश्ता इस्राफ़ील अलैहिस्सलाम फूँकेगा, और प्रलय आ जायेगी। (मुस्नद अह़्मदः 2191) और पुनः फूँकेगा तो सब जीवित हो कर हश्र के मैदान में आ जायेंगे।
20:103जुज़ 16 · पृ. 319

يَتَخَافَتُونَ بَيْنَهُمْ إِنْ لَبِثْتُمْ إِلَّا عَشْرًا103

वे आपस में चुपके-चुपके कहेंगे कि तुम (संसार में) बस दस दिन रहे हो।
20:104जुज़ 16 · पृ. 319

نَحْنُ أَعْلَمُ بِمَا يَقُولُونَ إِذْ يَقُولُ أَمْثَلُهُمْ طَرِيقَةً إِنْ لَبِثْتُمْ إِلَّا يَوْمًا104

हम भली-भाँति जानते हैं, जो कुछ वे कहेंगे, जिस समय कहेगा उनमें से सबसे चतुर कि तुम केवल एक ही दिन रहे[1] हो।
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1. अर्थात उन्हें संसारिक जीवन क्षण दो क्षण प्रतीत होगा।
20:105जुज़ 16 · पृ. 319

وَيَسْأَلُونَكَ عَنِ الْجِبَالِ فَقُلْ يَنْسِفُهَا رَبِّي نَسْفًا105

वे आपसे प्रश्न कर रहे हैं पर्वतों के संबन्ध में? आप कह दें कि उड़ा देगा उन्हें मेरा पालनहार चूर-चूर करके।
20:106जुज़ 16 · पृ. 319

فَيَذَرُهَا قَاعًا صَفْصَفًا106

फिर धरती को छोड़ देगा, समतल मैदान बनाकर।
20:107जुज़ 16 · पृ. 319

لَا تَرَىٰ فِيهَا عِوَجًا وَلَا أَمْتًا107

तुम नहीं देखोगे उसमें कोई टेढ़ापन और न नीच-ऊँच।
20:108जुज़ 16 · पृ. 319

يَوْمَئِذٍ يَتَّبِعُونَ الدَّاعِيَ لَا عِوَجَ لَهُ ۖ وَخَشَعَتِ الْأَصْوَاتُ لِلرَّحْمَٰنِ فَلَا تَسْمَعُ إِلَّا هَمْسًا108

उस दिन लोग पीछे चलेंगे पुकारने वाले के, कोई उससे कतरायेगा नहीं और धीमी हो जायेँगी आवाजें अत्यंत कृपाशील के लिए, फिर तुम नहीं सुनोगे कानाफूँसी की आवाज़ के सिवा।
20:109जुज़ 16 · पृ. 319

يَوْمَئِذٍ لَا تَنْفَعُ الشَّفَاعَةُ إِلَّا مَنْ أَذِنَ لَهُ الرَّحْمَٰنُ وَرَضِيَ لَهُ قَوْلًا109

उस दिन लाभ नहीं देगी सिफ़ारिश, परन्तु जिसे आज्ञा दे अत्यंत कृपाशील और प्रसन्न हो उसके[1] लिए बात करने से।
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1. अर्थात जिस के लिये सिफ़ारिश कर रहा है।
20:110जुज़ 16 · पृ. 319

يَعْلَمُ مَا بَيْنَ أَيْدِيهِمْ وَمَا خَلْفَهُمْ وَلَا يُحِيطُونَ بِهِ عِلْمًا110

वह जानता है, जो कुछ उनके आगे तथा पीछे है और वे उसका पूरा ज्ञान नहीं रखते।
20:111जुज़ 16 · पृ. 319

۞ وَعَنَتِ الْوُجُوهُ لِلْحَيِّ الْقَيُّومِ ۖ وَقَدْ خَابَ مَنْ حَمَلَ ظُلْمًا111

तथा सभी के सिर झुक जायेंगे, जीवित नित्य स्थायी (अल्लाह) के लिए और निश्चय वह निष्फल हो गया, जिसने अत्याचार लाद[1] लिया।
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1. संसार में किसी पर अत्याचार, तथा अल्लाह के साथ शिर्क किया हो।
20:112जुज़ 16 · पृ. 319

وَمَنْ يَعْمَلْ مِنَ الصَّالِحَاتِ وَهُوَ مُؤْمِنٌ فَلَا يَخَافُ ظُلْمًا وَلَا هَضْمًا112

तथा जो सदाचार करेगा और वह ईमान वाला भी हो, तो वह नहीं डरेगा अत्याचार से, न अधिकार हनन से।
20:113जुज़ 16 · पृ. 319

وَكَذَٰلِكَ أَنْزَلْنَاهُ قُرْآنًا عَرَبِيًّا وَصَرَّفْنَا فِيهِ مِنَ الْوَعِيدِ لَعَلَّهُمْ يَتَّقُونَ أَوْ يُحْدِثُ لَهُمْ ذِكْرًا113

और इसी प्रकार, हमने इस अरबी क़ुर्आन को अवतरित किया है तथा विभिन्न प्रकार से वर्णन कर दिया है उसमें चेतावनी का, ताकि लोग आज्ञाकारी हो जायेँ अथवा वह उनके लिए उत्पन्न कर दे एक शिक्षा।
20:114 · My Lord, increase me in knowledgeजुज़ 16 · पृ. 320

فَتَعَالَى اللَّهُ الْمَلِكُ الْحَقُّ ۗ وَلَا تَعْجَلْ بِالْقُرْآنِ مِنْ قَبْلِ أَنْ يُقْضَىٰ إِلَيْكَ وَحْيُهُ ۖ وَقُلْ رَبِّ زِدْنِي عِلْمًا114

अतः, उच्च है अल्लाह वास्तविक स्वामी और (हे नबी!) आप शीघ्रता[1] न करें क़ुर्आन के साथ इससे पूर्व कि पूरी कर दी जाये आपकी ओर इसकी वह़्यी (प्रकाशना) तथा प्रार्थना करें कि हे मेरे पालनहार! मुझे अधिक ज्ञान प्रदान कर।
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1. जब जिब्रील अलैहिस्सलाम नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास वह़्यी (प्रकाशना) लाते, तो आप इस भय से कि कुछ भूल न जायें, उन के साथ-साथ ही पढ़ने लगते। अल्लाह ने आप को ऐसा करने से रोक दिया। इस का वर्णन सूरह क़ियामा, आयतः75 में आ रहा है।
20:115जुज़ 16 · पृ. 320

وَلَقَدْ عَهِدْنَا إِلَىٰ آدَمَ مِنْ قَبْلُ فَنَسِيَ وَلَمْ نَجِدْ لَهُ عَزْمًا115

और हमने आदेश दिया आदम को इससे पहले, तो वह भूल गया और हमने नहीं पाया उसमें कोई दृढ़ संकल्प[1]।
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1. अर्थात वह भूल से शैतान की बात में आ गया, उस ने जान बूझ कर हमारे आदेश का उल्लंघन नहीं किया।
20:116जुज़ 16 · पृ. 320

وَإِذْ قُلْنَا لِلْمَلَائِكَةِ اسْجُدُوا لِآدَمَ فَسَجَدُوا إِلَّا إِبْلِيسَ أَبَىٰ116

तथा जब हमने कहा फ़रिश्तों से कि सज्दा करो आदम को, तो सबने सज्दा किया इब्लीस के सिवा, उसने इन्कार कर दिया।
20:117जुज़ 16 · पृ. 320

فَقُلْنَا يَا آدَمُ إِنَّ هَٰذَا عَدُوٌّ لَكَ وَلِزَوْجِكَ فَلَا يُخْرِجَنَّكُمَا مِنَ الْجَنَّةِ فَتَشْقَىٰ117

तब हमने कहाः हे आदम! वास्तव में, ये शत्रु है तेरा और तेरी पत्नी का, तो ऐसा न हो कि तुम दोनों को निकलवा दे स्वर्ग से और तू आपदा में पड़ जाये।
20:118जुज़ 16 · पृ. 320

إِنَّ لَكَ أَلَّا تَجُوعَ فِيهَا وَلَا تَعْرَىٰ118

यहाँ तुझे ये सुविधा है कि न भूखा रहता है और न नग्न रहता है।
20:119जुज़ 16 · पृ. 320

وَأَنَّكَ لَا تَظْمَأُ فِيهَا وَلَا تَضْحَىٰ119

और न प्यासा होता है और न तुझे धूप सताती है।
20:120जुज़ 16 · पृ. 320

فَوَسْوَسَ إِلَيْهِ الشَّيْطَانُ قَالَ يَا آدَمُ هَلْ أَدُلُّكَ عَلَىٰ شَجَرَةِ الْخُلْدِ وَمُلْكٍ لَا يَبْلَىٰ120

तो फुसलाया उसे शैतान ने, कहाः हे आदम! क्या मैं तुझे न बताऊँ, शाश्वत जीवन का वृक्ष तथा ऐसा राज्य, जो पतनशील न हो?
20:121जुज़ 16 · पृ. 320

فَأَكَلَا مِنْهَا فَبَدَتْ لَهُمَا سَوْآتُهُمَا وَطَفِقَا يَخْصِفَانِ عَلَيْهِمَا مِنْ وَرَقِ الْجَنَّةِ ۚ وَعَصَىٰ آدَمُ رَبَّهُ فَغَوَىٰ121

तो दोनों ने उस (वृक्ष) से खा लिया, फिर उनके गुप्तांग उन दोनों के लिए खुल गये और दोनों चिपकाने लगे अपने ऊपर स्वर्ग के पत्ते और आदम अवज्ञा कर गया अपने पालनहार की और कुपथ हो गया।
20:122जुज़ 16 · पृ. 320

ثُمَّ اجْتَبَاهُ رَبُّهُ فَتَابَ عَلَيْهِ وَهَدَىٰ122

फिर उस (अल्लाह) ने उसे चुन लिया और उसे क्षमा कर दिया और सुपथ दिखा दिया।
20:123जुज़ 16 · पृ. 320

قَالَ اهْبِطَا مِنْهَا جَمِيعًا ۖ بَعْضُكُمْ لِبَعْضٍ عَدُوٌّ ۖ فَإِمَّا يَأْتِيَنَّكُمْ مِنِّي هُدًى فَمَنِ اتَّبَعَ هُدَايَ فَلَا يَضِلُّ وَلَا يَشْقَىٰ123

कहाः तुम दोनों (आदम तथा शैतान) यहाँ से उतर जाओ, तुम एक-दूसरे के शत्रु हो। अब यदि आये तुम्हारे पास मेरी ओर से मार्गदर्शन, तो जो अनुपालन करेगा मेरे मार्गदर्शन का, वह कुपथ नहीं होगा और न दुर्भाग्य ग्रस्त होगा।
20:124जुज़ 16 · पृ. 320

وَمَنْ أَعْرَضَ عَنْ ذِكْرِي فَإِنَّ لَهُ مَعِيشَةً ضَنْكًا وَنَحْشُرُهُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ أَعْمَىٰ124

तथा जो मुख फेर लेगा मेरे स्मरण से, तो उसी का सांसारिक जीवन संकीर्ण (तंग)[1] होगा तथा हम उसे उठायेंगे प्रलय के दिन अन्धा करके।
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1. अर्थात वह संसार में धनी हो तब भी उसे संतोष नहीं होगा। और सदा चिन्तित और व्याकूल रहेगा।
20:125जुज़ 16 · पृ. 320

قَالَ رَبِّ لِمَ حَشَرْتَنِي أَعْمَىٰ وَقَدْ كُنْتُ بَصِيرًا125

वह कहेगाः मेरे पालनहार! मुझे अन्धा क्यों उठाया, मैं तो (संसार में) आँखों वाला था?
20:126जुज़ 16 · पृ. 321

قَالَ كَذَٰلِكَ أَتَتْكَ آيَاتُنَا فَنَسِيتَهَا ۖ وَكَذَٰلِكَ الْيَوْمَ تُنْسَىٰ126

अल्लाह कहेगाः इसी प्रकार, तेरे पास हमारी आयतें आयीं, तो तूने उन्हें भुला दिया। अतः इसी प्रकार, आज तू भुला दिया जायेगा।
20:127जुज़ 16 · पृ. 321

وَكَذَٰلِكَ نَجْزِي مَنْ أَسْرَفَ وَلَمْ يُؤْمِنْ بِآيَاتِ رَبِّهِ ۚ وَلَعَذَابُ الْآخِرَةِ أَشَدُّ وَأَبْقَىٰ127

तथा इसी प्रकार, हम बदला देते हैं उसे, जो सीमा का उल्लंघन करे और ईमान न लाये अपने पालनहार की आयतों पर और निश्चय आख़िरत की यातना अति कड़ी तथा अधिक स्थायी है।
20:128जुज़ 16 · पृ. 321

أَفَلَمْ يَهْدِ لَهُمْ كَمْ أَهْلَكْنَا قَبْلَهُمْ مِنَ الْقُرُونِ يَمْشُونَ فِي مَسَاكِنِهِمْ ۗ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَآيَاتٍ لِأُولِي النُّهَىٰ128

तो क्या उन्हें मार्गदर्शन नहीं दिया इस बात ने कि हमने ध्वस्त कर दिया, इनसे पहले बहुत-सी जातियों को, जो चल-फिर रही थीं अपनी बस्तियों में, निःसंदेह इसमें निशानियाँ हैं बुध्दिमानों के लिए।
20:129जुज़ 16 · पृ. 321

وَلَوْلَا كَلِمَةٌ سَبَقَتْ مِنْ رَبِّكَ لَكَانَ لِزَامًا وَأَجَلٌ مُسَمًّى129

और यदि, एक बात पहले से निश्चित न होती आपके पालनहार की ओर से, तो यातना आ चुकी होती और एक निर्धारित समय न होता[1]।
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1. आयत का भावार्थ यह है कि अल्लाह का यह निर्णय है कि वह किसी जाति का उस के विरुध्द तर्क तथा उस की निश्चित अवधि पूरी होने पर ही विनाश करता है, यदि यह बात न होती तो इन मक्का के मिश्रणवादियों पर यातना आ चुकी होती।
20:130जुज़ 16 · पृ. 321

فَاصْبِرْ عَلَىٰ مَا يَقُولُونَ وَسَبِّحْ بِحَمْدِ رَبِّكَ قَبْلَ طُلُوعِ الشَّمْسِ وَقَبْلَ غُرُوبِهَا ۖ وَمِنْ آنَاءِ اللَّيْلِ فَسَبِّحْ وَأَطْرَافَ النَّهَارِ لَعَلَّكَ تَرْضَىٰ130

अतः आप सहन करें उनकी बातों को तथा अपने पालनहार की पवित्रता का वर्णन उसकी प्रशंसा के साथ करते रहें, सूर्योदय से पहले[1], सुर्यास्त से[2] पहले, रात्रि के क्षणों[3] में और दिन के किनारों[4] में, ताकि आप प्रसन्न हो जायेँ।
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1. अर्थात फ़ज्र की नमाज में। 2. अर्थात अस्र की नमाज़ में। 3. अर्थात इशा की नमाज़ में। 4. अर्थात ज़ुह्र तथा मग़्रिब की नमाज़ में।
20:131जुज़ 16 · पृ. 321

وَلَا تَمُدَّنَّ عَيْنَيْكَ إِلَىٰ مَا مَتَّعْنَا بِهِ أَزْوَاجًا مِنْهُمْ زَهْرَةَ الْحَيَاةِ الدُّنْيَا لِنَفْتِنَهُمْ فِيهِ ۚ وَرِزْقُ رَبِّكَ خَيْرٌ وَأَبْقَىٰ131

और कदापि न देखिए आप, उस आनन्द की ओर, जो हमने उन[1] में से विभिन्न प्रकार के लोगों को दे रखा है, वे सांसारिक जीवन की शोभा है, ताकि हम उनकी परीक्षा लें और आपके पालनहार का प्रदान[2] ही उत्तम तथा अति स्थायी है।
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1. अर्थात मिश्रणवादियों में से। 2. अर्थात प्रलोक का प्रतिफल।
20:132जुज़ 16 · पृ. 321

وَأْمُرْ أَهْلَكَ بِالصَّلَاةِ وَاصْطَبِرْ عَلَيْهَا ۖ لَا نَسْأَلُكَ رِزْقًا ۖ نَحْنُ نَرْزُقُكَ ۗ وَالْعَاقِبَةُ لِلتَّقْوَىٰ132

और आप अपने परिवार को नमाज़ का आदेश दें और स्वयं भी उसपर स्थित रहें, हम आपसे कोई जीविका नहीं माँगते, हम ही आपको जीविका प्रदान करते हैं और अच्छा परिणाम आज्ञाकारियों के लिए है।
20:133जुज़ 16 · पृ. 321

وَقَالُوا لَوْلَا يَأْتِينَا بِآيَةٍ مِنْ رَبِّهِ ۚ أَوَلَمْ تَأْتِهِمْ بَيِّنَةُ مَا فِي الصُّحُفِ الْأُولَىٰ133

तथा उन्होंने कहाः क्यों वह हमारे पास कोई निशानी अपने पालनहार की ओर से नहीं लाता? क्या उनके पास उसका प्रत्यक्ष प्रमाण (क़र्आन) नहीं आ गया, जिसमें अगली पुस्तकों की (शिक्षायें) हैं?
20:134जुज़ 16 · पृ. 321

وَلَوْ أَنَّا أَهْلَكْنَاهُمْ بِعَذَابٍ مِنْ قَبْلِهِ لَقَالُوا رَبَّنَا لَوْلَا أَرْسَلْتَ إِلَيْنَا رَسُولًا فَنَتَّبِعَ آيَاتِكَ مِنْ قَبْلِ أَنْ نَذِلَّ وَنَخْزَىٰ134

और यदि हम ध्वस्त कर देते उन्हें, किसी यातना से, इससे[1] पहले, तो वे अवश्य कहते कि हे हमारे पालनहार! तूने हमारी ओर कोई रसूल क्यों नहीं भेजा कि हम तेरी आयतों का अनुपालन करते, इससे पहले कि हम अपमानित और हीन होते।
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1. अर्थात नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और क़ुर्आन के आने से पहले।
20:135जुज़ 16 · पृ. 321

قُلْ كُلٌّ مُتَرَبِّصٌ فَتَرَبَّصُوا ۖ فَسَتَعْلَمُونَ مَنْ أَصْحَابُ الصِّرَاطِ السَّوِيِّ وَمَنِ اهْتَدَىٰ135

आप कह दें कि प्रत्येक, (परिणाम की) प्रतीक्षा में है। अतः तुमभी प्रतीक्षा करो, शीघ्र ही तुम्हें ज्ञान हो जायेगा कि कौन सीधी राह वाले हैं, और किसने सीधी राह पायी है।

सूरह के आरंभ से चलाएँ