Ad-Dukhan

سورة الدخان

सूरह 44 · मक्की · 59 आयतें

44:1जुज़ 25 · पृ. 496

حم1

ह़ा मीम।
44:2जुज़ 25 · पृ. 496

وَالْكِتَابِ الْمُبِينِ2

शपथ है इस खुली पुस्तक की।
44:3जुज़ 25 · पृ. 496

إِنَّا أَنْزَلْنَاهُ فِي لَيْلَةٍ مُبَارَكَةٍ ۚ إِنَّا كُنَّا مُنْذِرِينَ3

हमने ही उतारा है इसे[1] एक शुभ रात्रि में। वास्तव में, हम सावधान करने वाले हैं।
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1. शुभ रात्रि से अभिप्राय "लैलतुल क़द्र" है। यह रमज़ान के महीने के अन्तिम दशक की एक विषम रात्रि होती है। यहाँ आगे बताया जा रहा है कि इसी रात्रि में पूरे वर्ष होने वाले विषय का निर्णय किया जाता है। इस शुभ रात की विशेषता तथा प्रधानता के लिये सूरह क़द्र देखिये। इसी शुभ रात्रि में नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) पर क़ुर्आन उतरने का आरंभ हुआ। फिर 23 वर्षों तक आवश्यक्तानुसार विभिन्न समय में उतरता रहा। (देखियेः सूरह बक़रह, आयत संख्याः 185)
44:4जुज़ 25 · पृ. 496

فِيهَا يُفْرَقُ كُلُّ أَمْرٍ حَكِيمٍ4

उसी (रात्रि) में निर्णय किया जाता है, प्रत्येक सुदृढ़ कर्म का।
44:5जुज़ 25 · पृ. 496

أَمْرًا مِنْ عِنْدِنَا ۚ إِنَّا كُنَّا مُرْسِلِينَ5

ये (आदेश) हमारे पास से है। हम ही भेजने वाले हैं, रसूलों को।
44:6जुज़ 25 · पृ. 496

رَحْمَةً مِنْ رَبِّكَ ۚ إِنَّهُ هُوَ السَّمِيعُ الْعَلِيمُ6

आपके पालनहार की दया से, वास्तव में, वह सब कुछ सुनने-जानने वाला है।
44:7जुज़ 25 · पृ. 496

رَبِّ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَمَا بَيْنَهُمَا ۖ إِنْ كُنْتُمْ مُوقِنِينَ7

जो आकाशों तथा धरती का पालनहार है तथा जो कुछ उन दोनों के बीच है, यदि तुम विश्वास करने वाले हो।
44:8जुज़ 25 · पृ. 496

لَا إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ يُحْيِي وَيُمِيتُ ۖ رَبُّكُمْ وَرَبُّ آبَائِكُمُ الْأَوَّلِينَ8

नहीं है कोई वंदनीय, परन्तु वही, जो जीवन देता तथा मारता है। तुम्हारा पालनहार तथा तुम्हारे गुज़रे हुए पूर्वजों का पालनहार है।
44:9जुज़ 25 · पृ. 496

بَلْ هُمْ فِي شَكٍّ يَلْعَبُونَ9

बल्कि, वे (मुश्रिक) संदेह में खेल रहे हैं।
44:10जुज़ 25 · पृ. 496

فَارْتَقِبْ يَوْمَ تَأْتِي السَّمَاءُ بِدُخَانٍ مُبِينٍ10

तो आप प्रतीक्षा करें, उस दिन का, जब आकाश खुला धूँवा[1] लायेगा।
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1. इस प्रत्यक्ष धुवें तथा दुःखदायी यातना की व्याख्या सह़ीह़ ह़दीस में यह आयी है कि जब मक्कावासियों ने नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का कड़ा विरोध किया तो आप ने यह शाप दिया कि हे अल्लाह! उन पर सात वर्ष का अकाल भेज दे। और जब अकाल आया तो भूक के कारण उन्हें धुवाँ जैसा दिखायी देने लगा। तब उन्हों ने आप से कहा कि आप अल्लाह से प्रार्थना कर दें। वह हम से अकाल दूर कर देगा तो हम ईमान ले आयेंगे। और जब अकाल दूर हुआ तो फिर अपनी स्थिति पर आ गये। फिर अल्लाह ने बद्र के युध्द के दिन उन से बदला लिया। (सह़ीह़ बुख़ारीः 4821, तथा सह़ीह़ मुस्लिमः2798)
44:11जुज़ 25 · पृ. 496

يَغْشَى النَّاسَ ۖ هَٰذَا عَذَابٌ أَلِيمٌ11

जो छा जायेगा सब लोगों पर। यही दुःखदायी यातना है।
44:12जुज़ 25 · पृ. 496

رَبَّنَا اكْشِفْ عَنَّا الْعَذَابَ إِنَّا مُؤْمِنُونَ12

(वे कहेंगेः) हमारे पालनहार! हमसे यातना दूर कर दे। निश्चय हम ईमान लाने वाले हैं।
44:13जुज़ 25 · पृ. 496

أَنَّىٰ لَهُمُ الذِّكْرَىٰ وَقَدْ جَاءَهُمْ رَسُولٌ مُبِينٌ13

और उनके लिए शिक्षा का समय कहाँ रह गया? जबकि उनके पास आ गये एक रसूल (सत्य को) उजागर करने वाले।
44:14जुज़ 25 · पृ. 496

ثُمَّ تَوَلَّوْا عَنْهُ وَقَالُوا مُعَلَّمٌ مَجْنُونٌ14

फिर भी वे आपसे मुँह फेर गये तथा कह दिया कि एक सिखाया हुआ पागल है।
44:15जुज़ 25 · पृ. 496

إِنَّا كَاشِفُو الْعَذَابِ قَلِيلًا ۚ إِنَّكُمْ عَائِدُونَ15

हम दूर कर देने वाले हैं कुछ यातना, वास्तव में तुम, फिर अपनी प्रथम स्थिति पर आ जाने वाले हो।
44:16जुज़ 25 · पृ. 496

يَوْمَ نَبْطِشُ الْبَطْشَةَ الْكُبْرَىٰ إِنَّا مُنْتَقِمُونَ16

जिस दिन हम अत्यंत कड़ी पकड़[1] में ले लेंगे। तो हम निश्चय बदला लेने वाले हैं।
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1. यह कड़ी पकड़ का दिन बद्र के युध्द का दिन है। जिस में उन के बड़े-बड़े सत्तर प्रमुख मारे गये तथा इतनी ही संख्या में बंदी बनाये गये। और उन की दूसरी पकड़ क़्यामत के दिन होगी जो इस से भी बड़ी और गंभीर होगी।
44:17जुज़ 25 · पृ. 496

۞ وَلَقَدْ فَتَنَّا قَبْلَهُمْ قَوْمَ فِرْعَوْنَ وَجَاءَهُمْ رَسُولٌ كَرِيمٌ17

तथा हमने परीक्षा ली इनसे पूर्व फ़िरऔन की जाति की तथा उनके पास एक आदरणीय रसूल आया।
44:18जुज़ 25 · पृ. 496

أَنْ أَدُّوا إِلَيَّ عِبَادَ اللَّهِ ۖ إِنِّي لَكُمْ رَسُولٌ أَمِينٌ18

कि मुझे सौंप दो अल्लाह के भक्तों को। निश्चय मैं तुम्हारे लिए एक अमानतदार रसूल हूँ।
44:19जुज़ 25 · पृ. 497

وَأَنْ لَا تَعْلُوا عَلَى اللَّهِ ۖ إِنِّي آتِيكُمْ بِسُلْطَانٍ مُبِينٍ19

तथा अल्लाह के विपरीत घमंड न करो। मैं तुम्हारे सामने खुला प्रमाण प्रस्तुत करता हूँ।
44:20जुज़ 25 · पृ. 497

وَإِنِّي عُذْتُ بِرَبِّي وَرَبِّكُمْ أَنْ تَرْجُمُونِ20

तथा मैंने शरण ली है, अपने पालनहार की तथा तुम्हारे पालनहार की इससे कि तुम मुझपर पथराव कर दो।
44:21जुज़ 25 · पृ. 497

وَإِنْ لَمْ تُؤْمِنُوا لِي فَاعْتَزِلُونِ21

और यदि तुम मेरा विश्वास न करो, तो मुझसे परे हो जाओ।
44:22जुज़ 25 · पृ. 497

فَدَعَا رَبَّهُ أَنَّ هَٰؤُلَاءِ قَوْمٌ مُجْرِمُونَ22

अन्ततः, मूसा ने पुकारा अपने पालनहार को, कि वास्तव में ये लोग अपराधी हैं।
44:23जुज़ 25 · पृ. 497

فَأَسْرِ بِعِبَادِي لَيْلًا إِنَّكُمْ مُتَّبَعُونَ23

(हमने आदेश दिया) कि निकल जा रातों-रात, मेरे भक्तों को लेकर। निश्चय तुम्हारा पीछा किया जायेगा।
44:24जुज़ 25 · पृ. 497

وَاتْرُكِ الْبَحْرَ رَهْوًا ۖ إِنَّهُمْ جُنْدٌ مُغْرَقُونَ24

तथा छोड़ दे सागर को उसकी दशा पर, खुला। वास्तव में, ये डूब जाने वाली सेना है।
44:25जुज़ 25 · पृ. 497

كَمْ تَرَكُوا مِنْ جَنَّاتٍ وَعُيُونٍ25

वे छोड़ गये बहुत-से बाग़ तथा जल स्रोत।
44:26जुज़ 25 · पृ. 497

وَزُرُوعٍ وَمَقَامٍ كَرِيمٍ26

तथा खेतियाँ और सुखदायी स्थान।
44:27जुज़ 25 · पृ. 497

وَنَعْمَةٍ كَانُوا فِيهَا فَاكِهِينَ27

तथा सुख के साधन, जिनमें वे आन्नद ले रहे थे।
44:28जुज़ 25 · पृ. 497

كَذَٰلِكَ ۖ وَأَوْرَثْنَاهَا قَوْمًا آخَرِينَ28

इसी प्राकार हुआ और हमने उनका उत्तराधिकारी बना दिया दूसरे[1] लोगों को।
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1. अर्थात बनी इस्राईल (याक़ूब अलैहिस्सलाम की संतान) को।
44:29जुज़ 25 · पृ. 497

فَمَا بَكَتْ عَلَيْهِمُ السَّمَاءُ وَالْأَرْضُ وَمَا كَانُوا مُنْظَرِينَ29

तो नहीं रोया उनपर आकाश और न धरती और न उन्हें अवसर (समय) दिया गया।
44:30जुज़ 25 · पृ. 497

وَلَقَدْ نَجَّيْنَا بَنِي إِسْرَائِيلَ مِنَ الْعَذَابِ الْمُهِينِ30

तथा हमने बचा लिया इस्राईल की संतान को, अपमानकारी यातना से।
44:31जुज़ 25 · पृ. 497

مِنْ فِرْعَوْنَ ۚ إِنَّهُ كَانَ عَالِيًا مِنَ الْمُسْرِفِينَ31

फ़िरऔन से। वास्तव में, वह चढ़ा हुआ उल्लंघनकारियों में से था।
44:32जुज़ 25 · पृ. 497

وَلَقَدِ اخْتَرْنَاهُمْ عَلَىٰ عِلْمٍ عَلَى الْعَالَمِينَ32

तथा हमने प्रधानता दी उन्हें, जानते हुए, संसार वासियों पर।
44:33जुज़ 25 · पृ. 497

وَآتَيْنَاهُمْ مِنَ الْآيَاتِ مَا فِيهِ بَلَاءٌ مُبِينٌ33

तथा हमने उन्हें प्रदान कीं ऐसी निशानियाँ, जिनमें खुली परीक्षा थी।
44:34जुज़ 25 · पृ. 497

إِنَّ هَٰؤُلَاءِ لَيَقُولُونَ34

वास्तव में, ये[1] कहते हैं कि
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1. अर्थात मक्का के मुश्रिक कहते हैं कि संसारिक जीवन ही अन्तिम जीवन है। इस के पश्चात् परलोक का जीवन नहीं है।
44:35जुज़ 25 · पृ. 497

إِنْ هِيَ إِلَّا مَوْتَتُنَا الْأُولَىٰ وَمَا نَحْنُ بِمُنْشَرِينَ35

हमें तो बस प्रथम बार मरना है तथा हम फिर जीवित नहीं किये जायेंगे।
44:36जुज़ 25 · पृ. 497

فَأْتُوا بِآبَائِنَا إِنْ كُنْتُمْ صَادِقِينَ36

फिर यदि तुम सच्चे हो, तो हमारे पूर्वजों को (जीवित करके) ला दो।
44:37जुज़ 25 · पृ. 497

أَهُمْ خَيْرٌ أَمْ قَوْمُ تُبَّعٍ وَالَّذِينَ مِنْ قَبْلِهِمْ ۚ أَهْلَكْنَاهُمْ ۖ إِنَّهُمْ كَانُوا مُجْرِمِينَ37

ये अच्छे हैं अथवा तुब्बअ की जाति[1] तथा जो उनसे पूर्व रहे हैं? हमने उनका विनाश कर दिया। निश्चय वे अपराधि थे।
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1. तुब्बअ की जाति से अभिप्राय यमन की जाति सबा है। जिस के विनाश का वर्णन सूरह सबा में किया गया है। तुब्बअ ह़िम्यर जाति के शासकों की उपाधि थी जिसे उन की अवज्ञा के कारण ध्वस्त कर दिया गया। (देखियः सूरह सबा की आयतः 15 से 19 तक।)
44:38जुज़ 25 · पृ. 497

وَمَا خَلَقْنَا السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ وَمَا بَيْنَهُمَا لَاعِبِينَ38

तथा हमने आकाशों और धरती को एवं जो कुछ उन दोनों के बीच है, खेल नहीं बनाया है।
44:39जुज़ 25 · पृ. 497

مَا خَلَقْنَاهُمَا إِلَّا بِالْحَقِّ وَلَٰكِنَّ أَكْثَرَهُمْ لَا يَعْلَمُونَ39

हमने नहीं पैदा किया है उन दोनों को, परन्तु सत्य के आधार पर। किन्तु अधिक्तर लोग इसे नहीं जानते हैं।
44:40जुज़ 25 · पृ. 498

إِنَّ يَوْمَ الْفَصْلِ مِيقَاتُهُمْ أَجْمَعِينَ40

निःसंदेह निर्णय[1] का दिन, उन सबका निश्चित समय है।
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1. अर्थात आकाशों तथा धरती की रचना लोगों की परीक्षा के लिये की गई है। और परीक्षा फल के लिये प्रलय का समय निर्धारित कर दिया गया है।
44:41जुज़ 25 · पृ. 498

يَوْمَ لَا يُغْنِي مَوْلًى عَنْ مَوْلًى شَيْئًا وَلَا هُمْ يُنْصَرُونَ41

जिस दिन, कोई साथी किसी साथी के कुछ काम नहीं आयेगा और न उनकी सहायता की जायेगी।
44:42जुज़ 25 · पृ. 498

إِلَّا مَنْ رَحِمَ اللَّهُ ۚ إِنَّهُ هُوَ الْعَزِيزُ الرَّحِيمُ42

परन्तु, जिसपर अल्लाह की दया हो जाये, तो वास्तव में वह बड़ा प्रभावशाली, दयावान है।
44:43जुज़ 25 · पृ. 498

إِنَّ شَجَرَتَ الزَّقُّومِ43

निःसंदेह ज़क्कूम (थोहड़) का वृक्ष।
44:44जुज़ 25 · पृ. 498

طَعَامُ الْأَثِيمِ44

पापियों का भोजन है।
44:45जुज़ 25 · पृ. 498

كَالْمُهْلِ يَغْلِي فِي الْبُطُونِ45

पिघले हुए ताँबे जैसा, जो खौलेगा पेटों में।
44:46जुज़ 25 · पृ. 498

كَغَلْيِ الْحَمِيمِ46

गर्म पानी के खौलने के समान।
44:47जुज़ 25 · पृ. 498

خُذُوهُ فَاعْتِلُوهُ إِلَىٰ سَوَاءِ الْجَحِيمِ47

(आदेश होगा कि) उसे पकड़ो तथा धक्का देते हुए नरक के बीच तक पहुँचा दो।
44:48जुज़ 25 · पृ. 498

ثُمَّ صُبُّوا فَوْقَ رَأْسِهِ مِنْ عَذَابِ الْحَمِيمِ48

फिर बहाओ उसके सिर के ऊपर अत्यंत गर्म जल की यातना।[1]
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1. ह़दीस में है कि इस से जो कुछ उस के भीतर होगा पिघल कर दोनों पाँव के बीच से निकल जायेगा, फिर उसे अपनी पहली दशा पर कर दिया जायेगा। (तिर्मिज़ीः 2582, इस ह़दीस की सनद हसन है।)
44:49जुज़ 25 · पृ. 498

ذُقْ إِنَّكَ أَنْتَ الْعَزِيزُ الْكَرِيمُ49

(तथा कहा जायेगा कि) चख, क्योंकि तू बड़ा आदरणीय सम्मानित था।
44:50जुज़ 25 · पृ. 498

إِنَّ هَٰذَا مَا كُنْتُمْ بِهِ تَمْتَرُونَ50

यही वह चीज़ है, जिसमें तुम संदेह कर रहे थे।
44:51जुज़ 25 · पृ. 498

إِنَّ الْمُتَّقِينَ فِي مَقَامٍ أَمِينٍ51

निःसंदेह आज्ञाकारी शान्ति के स्थान में होंगे।
44:52जुज़ 25 · पृ. 498

فِي جَنَّاتٍ وَعُيُونٍ52

बाग़ों तथा जल स्रोतों में।
44:53जुज़ 25 · पृ. 498

يَلْبَسُونَ مِنْ سُنْدُسٍ وَإِسْتَبْرَقٍ مُتَقَابِلِينَ53

वस्त्र धारण किये हुए महीन तथा कोमल रेशम के, एक-दूसरे के सामने (आसीन) होंगे।
44:54जुज़ 25 · पृ. 498

كَذَٰلِكَ وَزَوَّجْنَاهُمْ بِحُورٍ عِينٍ54

इसी प्रकार होगा तथा हम विवाह देंगे उनको ह़ूरों से।[1]
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1. ह़ूर, अर्थात गोरी और बड़े-बड़े नैनों वाली स्त्रियाँ।
44:55जुज़ 25 · पृ. 498

يَدْعُونَ فِيهَا بِكُلِّ فَاكِهَةٍ آمِنِينَ55

वे माँग करेंगे उसमें, प्रत्येक प्रकार के मेवों की निश्चिन्त होकर।
44:56जुज़ 25 · पृ. 498

لَا يَذُوقُونَ فِيهَا الْمَوْتَ إِلَّا الْمَوْتَةَ الْأُولَىٰ ۖ وَوَقَاهُمْ عَذَابَ الْجَحِيمِ56

वे उस स्वर्ग में मौत[1] नहीं चखेंगे, प्रथम (सांसारिक) मौत के सिवा तथा (अल्लाह) बचा लेगा उन्हें, नरक की यातना से।
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1. ह़दीस में है कि जब स्वर्गी स्वर्ग में और नारकी नरक में चले जायेंगे तो मौत को स्वर्ग और नरक के बीच ला कर वध कर दिया जायेगा। और एलान कर दिया जायेगा कि अब मौत नहीं होगी। जिस से स्वर्गी प्रसन्न हो जायेंगे और नारकियों को शोक पर शोक हो जायेगा। (सह़ीह़ बुख़ारीः 6548, सह़ीह़ मुस्लिमः2850)
44:57जुज़ 25 · पृ. 498

فَضْلًا مِنْ رَبِّكَ ۚ ذَٰلِكَ هُوَ الْفَوْزُ الْعَظِيمُ57

आपके पालनहार की दया से, वही बड़ी सफलता है।
44:58जुज़ 25 · पृ. 498

فَإِنَّمَا يَسَّرْنَاهُ بِلِسَانِكَ لَعَلَّهُمْ يَتَذَكَّرُونَ58

तो हमने सरल कर दिया इस (क़ुर्आन) को आपकी भाषा में, ताकि वे शिक्षा ग्रहण करें।
44:59जुज़ 25 · पृ. 498

فَارْتَقِبْ إِنَّهُمْ مُرْتَقِبُونَ59

अतः, आप प्रतीक्षा करें,[1] वे भी प्रतीक्षा कर रहे हैं।
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1. अर्थात परिणाम की।

सूरह के आरंभ से चलाएँ