Al-Qalam

سورة القلم

सूरह 68 · मक्की · 52 आयतें

68:1जुज़ 29 · पृ. 564

ن ۚ وَالْقَلَمِ وَمَا يَسْطُرُونَ1

नून और शपथ है लेखनी (क़लम) की तथा उसकी[1] जिसे वो लिखते हैं।
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1. अर्थात क़ुर्आन की। जिसे उतरने के साथ ही नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) लेखकों से लिखवाते थे। जैसे ही कोई सूरह या आयत उतरती, लेखक क़लम तथा चमड़ों और झिल्लियों के साथ उपस्थित हो जाते थे, ताकि पूरे संसार के मनुष्यों को क़र्आन अपने वास्तविक रूप में पहुँच सके। और सदा के लिये सुरक्षित हो जाये। क्योंकि अब आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पश्चात् कोई नबी और कोई पुस्तक नहीं आयेगी। और प्रलय तक के लिये अब पूरे संसार के नबी आप ही हैं। और उन के मार्ग दर्शन के लिये क़ुर्आन ही एकमात्र धर्म पुस्तक है। इसी लिये इसे सुरक्षित कर दिया गया है। और यह विशेषता किसी भी आकाशीय ग्रन्थ को प्राप्त नहीं है। इस लिये अब मोक्ष के लिये अन्तिम नबी तथा अन्तिम धर्म ग्रन्थ क़ुर्आन पर ईमान लाना अनिवार्य है।
68:2जुज़ 29 · पृ. 564

مَا أَنْتَ بِنِعْمَةِ رَبِّكَ بِمَجْنُونٍ2

नहीं है आप, अपने पालनहार के अनुग्रह से पागल।
68:3जुज़ 29 · पृ. 564

وَإِنَّ لَكَ لَأَجْرًا غَيْرَ مَمْنُونٍ3

तथा निश्चय प्रतिफल (बदला) है आपके लिए अनन्त।
68:4जुज़ 29 · पृ. 564

وَإِنَّكَ لَعَلَىٰ خُلُقٍ عَظِيمٍ4

तथा निश्चय ही आप बड़े सुशील हैं।
68:5जुज़ 29 · पृ. 564

فَسَتُبْصِرُ وَيُبْصِرُونَ5

तो शीघ्र आप देख लेंगे तथा वे (काफ़िर भी) देख लेंगे।
68:6जुज़ 29 · पृ. 564

بِأَيْيِكُمُ الْمَفْتُونُ6

कि पागल कौन है।
68:7जुज़ 29 · पृ. 564

إِنَّ رَبَّكَ هُوَ أَعْلَمُ بِمَنْ ضَلَّ عَنْ سَبِيلِهِ وَهُوَ أَعْلَمُ بِالْمُهْتَدِينَ7

वास्तव में, आपका पालनहार ही अधिक जानता है उसे, जो कुपथ हो गया उसकी राह से और वही अधिक जानता है उन्हें, जो सीधी राह पर हैं।
68:8जुज़ 29 · पृ. 564

فَلَا تُطِعِ الْمُكَذِّبِينَ8

तो आप बात न मानें झुठलाने वालों की।
68:9जुज़ 29 · पृ. 564

وَدُّوا لَوْ تُدْهِنُ فَيُدْهِنُونَ9

वे चाहते हैं कि आप ढीले हो जायें, तो वे भी ढीले हो[1] जायें।
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1. जब काफ़िर, इस्लाम के प्रभाव को रोकने में असफल हो गये तो आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को धमकी और लालच देने के पश्चात्, कुछ लो और कुछ दो की नीति पर आ गये। इस लिये कहा गया कि आप उन की बातों में न आयें। और परिणाम की प्रतीक्षा करें।
68:10जुज़ 29 · पृ. 564

وَلَا تُطِعْ كُلَّ حَلَّافٍ مَهِينٍ10

और बात न मानें[1] आप किसी अधिक शपथ लेने वाले, हीन व्यक्ति की।
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1. इन आयतों में किसी विशेष काफ़िर की दशा का वर्णन नहीं बल्कि काफ़िरों के प्रमुखों के नैतिक पतन तथा कुविचारों और दुराचारों को बताया गया है जो लोगों को इस्लाम के विरुध्द उकसा रहे थे। तो फिर क्या इन की बात मानी जा सकती है?
68:11जुज़ 29 · पृ. 564

هَمَّازٍ مَشَّاءٍ بِنَمِيمٍ11

जो व्यंग करने वाला, चुगलियाँ खाता फिरता है।
68:12जुज़ 29 · पृ. 564

مَنَّاعٍ لِلْخَيْرِ مُعْتَدٍ أَثِيمٍ12

भलाई से रोकने वाला, अत्याचारी, बडा पापी है।
68:13जुज़ 29 · पृ. 564

عُتُلٍّ بَعْدَ ذَٰلِكَ زَنِيمٍ13

घमंडी है और इसके पश्चात् कुवंश (वर्ण संकर) है।
68:14जुज़ 29 · पृ. 564

أَنْ كَانَ ذَا مَالٍ وَبَنِينَ14

इसलिए कि वह धन तथा पुत्रों वाला है।
68:15जुज़ 29 · पृ. 564

إِذَا تُتْلَىٰ عَلَيْهِ آيَاتُنَا قَالَ أَسَاطِيرُ الْأَوَّلِينَ15

जब पढ़ी जाती है उसपर हमारी आयतें, तो कहता हैः ये पूर्वजों की कल्पित कथायें हैं।
68:16जुज़ 29 · पृ. 564

سَنَسِمُهُ عَلَى الْخُرْطُومِ16

शीघ्र ही हम दाग़ लगा देंगे उसके सूंड[1] पर।
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1. अर्थात नाक पर जिसे वह घमंड से ऊँची रखना चाहता है। और दाग़ लगाने का अर्थ अपमानित करना है।
68:17जुज़ 29 · पृ. 565

إِنَّا بَلَوْنَاهُمْ كَمَا بَلَوْنَا أَصْحَابَ الْجَنَّةِ إِذْ أَقْسَمُوا لَيَصْرِمُنَّهَا مُصْبِحِينَ17

निःसंदेह, हमने उन्हें परीक्षा में डाला[1] है, जिस प्रकार बाग़ वालों को परीक्षा में डाला था। जब उन्होंने शपथ ली कि अवश्य तोड़ लेंगे उसके फल भोर होते ही।
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1. अर्थात मक्का वालों को। इस लिये यदि वह नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) पर ईमान लायेंगे तो उन पर सफलता की राह खुलेगी। अन्यथा संसार और परलोक दोनों की यातना के भागी होंगे।
68:18जुज़ 29 · पृ. 565

وَلَا يَسْتَثْنُونَ18

और इन् शा अल्लाह (यदि अल्लाह ने चाहा) नहीं कहा।
68:19जुज़ 29 · पृ. 565

فَطَافَ عَلَيْهَا طَائِفٌ مِنْ رَبِّكَ وَهُمْ نَائِمُونَ19

तो फिर गया उस बाग़ पर एक कुचक्र, आपके पालनहार की ओर से और वे सोये हुए थे।
68:20जुज़ 29 · पृ. 565

فَأَصْبَحَتْ كَالصَّرِيمِ20

तो वह हो गया जैसे उजाड़ खेती हो।
68:21जुज़ 29 · पृ. 565

فَتَنَادَوْا مُصْبِحِينَ21

अब वे एक-दूसरे को पुकारने लगे भोर होते हीः
68:22जुज़ 29 · पृ. 565

أَنِ اغْدُوا عَلَىٰ حَرْثِكُمْ إِنْ كُنْتُمْ صَارِمِينَ22

कि तड़के चलो अपनी खेती पर, यदि फल तोड़ने हैं।
68:23जुज़ 29 · पृ. 565

فَانْطَلَقُوا وَهُمْ يَتَخَافَتُونَ23

फिर वे चल दिये आपस में चुपके-चुपके बातें करते हुए।
68:24जुज़ 29 · पृ. 565

أَنْ لَا يَدْخُلَنَّهَا الْيَوْمَ عَلَيْكُمْ مِسْكِينٌ24

कि कदापि न आने पाये उस (बाग़) के भीतर आज तुम्हारे पास कोई निर्धन।[1]
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1. ताकि उन्हें कुछ दान न करना पड़े।
68:25जुज़ 29 · पृ. 565

وَغَدَوْا عَلَىٰ حَرْدٍ قَادِرِينَ25

और प्रातः ही पहुँच गये कि वे फल तोड़ सकेंगे।
68:26जुज़ 29 · पृ. 565

فَلَمَّا رَأَوْهَا قَالُوا إِنَّا لَضَالُّونَ26

फिर जब उसे देखा तो कहाः निश्चय हम राह भूल गये।
68:27जुज़ 29 · पृ. 565

بَلْ نَحْنُ مَحْرُومُونَ27

बल्कि हम वंचित हो[1] गये।
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1. पहले तो सोचा कि राह भूल गये हैं। किन्तु फिर देखा कि बाग़ तो उन्हीं का है तो कहा कि यह तो ऐसा उजाड़ हो गया है कि अब कुछ तोड़ने के लिये रह ही नहीं गया है। वास्तव में यह हमारा दुर्भाग्य है।
68:28जुज़ 29 · पृ. 565

قَالَ أَوْسَطُهُمْ أَلَمْ أَقُلْ لَكُمْ لَوْلَا تُسَبِّحُونَ28

तो उनमें से बिचले भाई ने कहाः क्या मैंने तुमसे नहीं कहा था कि तुम (अल्लाह की) पवित्रता का वर्णन क्यों नहीं करते?
68:29जुज़ 29 · पृ. 565

قَالُوا سُبْحَانَ رَبِّنَا إِنَّا كُنَّا ظَالِمِينَ29

वे कहने लगेः पवित्र है हमारा पालनहार! वास्तव में, हम ही अत्याचारी थे।
68:30जुज़ 29 · पृ. 565

فَأَقْبَلَ بَعْضُهُمْ عَلَىٰ بَعْضٍ يَتَلَاوَمُونَ30

फिर सम्मुख हो गये, एक-दूसरे की निन्दा करते हुए।
68:31जुज़ 29 · पृ. 565

قَالُوا يَا وَيْلَنَا إِنَّا كُنَّا طَاغِينَ31

कहने लगेः हाय अफ़्सोस! हम ही विद्रोही थे।
68:32जुज़ 29 · पृ. 565

عَسَىٰ رَبُّنَا أَنْ يُبْدِلَنَا خَيْرًا مِنْهَا إِنَّا إِلَىٰ رَبِّنَا رَاغِبُونَ32

संभव है हमारा पालनहार हमें बदले में प्रदान करे इससे उत्तम (बाग)। हम अपने पालनहार ही की ओर रूचि रखते हैं।
68:33जुज़ 29 · पृ. 565

كَذَٰلِكَ الْعَذَابُ ۖ وَلَعَذَابُ الْآخِرَةِ أَكْبَرُ ۚ لَوْ كَانُوا يَعْلَمُونَ33

ऐसे ही यातना होती है और आख़िरत (परलोक) की यातना इससे भी बड़ी है। काश वे जानते!
68:34जुज़ 29 · पृ. 565

إِنَّ لِلْمُتَّقِينَ عِنْدَ رَبِّهِمْ جَنَّاتِ النَّعِيمِ34

निःसंदेह, सदाचारियों के लिए उनके पालनहार के पास सुखों वाले स्वर्ग हैं।
68:35जुज़ 29 · पृ. 565

أَفَنَجْعَلُ الْمُسْلِمِينَ كَالْمُجْرِمِينَ35

क्या हम आज्ञाकारियों[1] को पापियों के समान कर देंगे?
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1. मक्का के प्रमुख कहते थे कि यदि प्रलय हुई तो वहाँ भी हमें यही संसारिक सुख-सुविधा प्राप्त होगी। जिस का खण्डन इस आयत में किया जा रहा है। अभिप्राय यह है कि अल्लाह के यहाँ देर है परन्तु अंधेर नहीं है।
68:36जुज़ 29 · पृ. 565

مَا لَكُمْ كَيْفَ تَحْكُمُونَ36

तुम्हें क्या हो गया है? तुम कैसा निर्णय कर रहे हो?
68:37जुज़ 29 · पृ. 565

أَمْ لَكُمْ كِتَابٌ فِيهِ تَدْرُسُونَ37

क्या तुम्हारे पास कोई पुस्तक है, जिसमें तुम पढ़ते हो?
68:38जुज़ 29 · पृ. 565

إِنَّ لَكُمْ فِيهِ لَمَا تَخَيَّرُونَ38

कि तुम्हें वही मिलेगा, जो तुम चाहोगे?
68:39जुज़ 29 · पृ. 565

أَمْ لَكُمْ أَيْمَانٌ عَلَيْنَا بَالِغَةٌ إِلَىٰ يَوْمِ الْقِيَامَةِ ۙ إِنَّ لَكُمْ لَمَا تَحْكُمُونَ39

या तुमने हमसे शपथें ले रखी हैं, जो प्रलय तक चली जायेंगी कि तुम्हें वही मिलेगा जिसका तुम निर्णय करोगे?
68:40जुज़ 29 · पृ. 565

سَلْهُمْ أَيُّهُمْ بِذَٰلِكَ زَعِيمٌ40

आप उनसे पूछिये कि उनमें कौन इसकी ज़मानत लेता है?
68:41जुज़ 29 · पृ. 565

أَمْ لَهُمْ شُرَكَاءُ فَلْيَأْتُوا بِشُرَكَائِهِمْ إِنْ كَانُوا صَادِقِينَ41

क्या उनके कुछ साझी हैं? फिर तो वे अपने साझियों को लायें,[1] यदि वे सच्चे हैं।
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1. ताकि वह उन्हें अच्छा स्थान दिला दें।
68:42जुज़ 29 · पृ. 565

يَوْمَ يُكْشَفُ عَنْ سَاقٍ وَيُدْعَوْنَ إِلَى السُّجُودِ فَلَا يَسْتَطِيعُونَ42

जिस दिन पिंडली खोल दी जायेगी और वह बुलाये जायेंगे सज्दा करने के लिए, तो (सज्दा) नहीं कर सकेंगे।[1]
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1. ह़दीस में है कि प्रलय के दिन अल्लाह अपनी पिंडली खोलेगा तो प्रत्येक मोमिन पुरुष तथा स्त्री सज्दे में गिर जायेंगे। हाँ वह शेष रह जायेंगे जो दिखावे और नाम के लिये (संसार में) सज्दे किया करते थे। वह सज्दा करना चाहेंगे परन्तु उन की रीढ़ की हड्डी तख्त के समान बन जायेगी। जिस के कारण उन के लिये सज्दा करना असंभव हो जायेगा। (बुख़ारीः 4919)
68:43जुज़ 29 · पृ. 566

خَاشِعَةً أَبْصَارُهُمْ تَرْهَقُهُمْ ذِلَّةٌ ۖ وَقَدْ كَانُوا يُدْعَوْنَ إِلَى السُّجُودِ وَهُمْ سَالِمُونَ43

उनकी आँखें झुकी होंगी और उनपर अपमान छाया होगा। वे (संसार में) सज्दा करने के लिए बुलाये जाते रहे जबकि वे स्वस्थ थे।
68:44जुज़ 29 · पृ. 566

فَذَرْنِي وَمَنْ يُكَذِّبُ بِهَٰذَا الْحَدِيثِ ۖ سَنَسْتَدْرِجُهُمْ مِنْ حَيْثُ لَا يَعْلَمُونَ44

अतः, आप छोड़ दें मुझे तथा उन्हें, जो झुठला रहे हैं इस बात (क़ुर्आन) को, हम उन्हें धीरे-धीरे खींच लायेंगे,[1] इस प्रकार कि उन्हें ज्ञान भी नहीं होगा।
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1. अर्थात उन के बुरे परिणाम की ओर।
68:45जुज़ 29 · पृ. 566

وَأُمْلِي لَهُمْ ۚ إِنَّ كَيْدِي مَتِينٌ45

तथा हम उन्हें अवसर दे रहे हैं।[1] वस्तुतः, हमारा उपाय सुदृढ़ है।
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1. अर्थात् संसारिक सुख-सुविधा में मग्न रखेंगे। फिर अन्ततः वह यातना में ग्रस्त हो जायेंगे।
68:46जुज़ 29 · पृ. 566

أَمْ تَسْأَلُهُمْ أَجْرًا فَهُمْ مِنْ مَغْرَمٍ مُثْقَلُونَ46

तो क्या आप माँग कर रहे हैं किसी पारिश्रमिक[1] की, तो वे बोझ से दबे जा रहे हैं।
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1. अर्थात धर्म के प्रचार पर।
68:47जुज़ 29 · पृ. 566

أَمْ عِنْدَهُمُ الْغَيْبُ فَهُمْ يَكْتُبُونَ47

या उनके पास ग़ैब का ज्ञान है, जिसे वे लिख[1] रहे हैं?
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1. या ''लौह़े मह़फ़ूज़'' (सुरक्षित पुस्तक) उन के अधिकार में है इस लिये आप का आज्ञा पालन नहीं करते और उसी से ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं?
68:48जुज़ 29 · पृ. 566

فَاصْبِرْ لِحُكْمِ رَبِّكَ وَلَا تَكُنْ كَصَاحِبِ الْحُوتِ إِذْ نَادَىٰ وَهُوَ مَكْظُومٌ48

तो आप धैर्य रखें अपने पालनहार के निर्णय तक और न हो जायें मछली वाले के समान।[1] जब उसने पुकारा और वह शोकपूर्ण था।
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1. इस से अभिप्राय यूनुस (अलैहिस्सलाम) हैं जिन को मछली ने निगल लिया था। (देखियेः सूरह साफ़्फ़ात, आयतः139)
68:49जुज़ 29 · पृ. 566

لَوْلَا أَنْ تَدَارَكَهُ نِعْمَةٌ مِنْ رَبِّهِ لَنُبِذَ بِالْعَرَاءِ وَهُوَ مَذْمُومٌ49

और यदि न पा लेती उसे उसके पालनहार की दया, तो वह फेंक दिया जाता बंजर में और वह बुरी दशा में होता।
68:50जुज़ 29 · पृ. 566

فَاجْتَبَاهُ رَبُّهُ فَجَعَلَهُ مِنَ الصَّالِحِينَ50

फिर चुन लिया उसे उसके पालनहार ने और बना दिया उसे सदाचारियों में से।
68:51जुज़ 29 · पृ. 566

وَإِنْ يَكَادُ الَّذِينَ كَفَرُوا لَيُزْلِقُونَكَ بِأَبْصَارِهِمْ لَمَّا سَمِعُوا الذِّكْرَ وَيَقُولُونَ إِنَّهُ لَمَجْنُونٌ51

और ऐसा लगता है कि जो काफ़िपर हो गये, वे अवश्य फिसला देंगे आपको अपनी आँखों से (घूर कर) जब वे सुनते हों क़ुर्आन को तथा कहते हैं कि वह अवशय् पागल है।
68:52जुज़ 29 · पृ. 566

وَمَا هُوَ إِلَّا ذِكْرٌ لِلْعَالَمِينَ52

जबकि ये क़ुर्आन तो बस एक[1] शिक्षा है, पूरे संसार वासियों के लिए।
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1. इस में यह बताया गया है कि क़ुर्आन केवल अरबों के लिये नहीं, संसार के सभी देशों और जातियों की शिक्षा के लिये उतरा है।

सूरह के आरंभ से चलाएँ