وَالنَّجْمِ إِذَا هَوَىٰ1
An-Najm
سورة النجم
सूरह 53 · मक्की · 62 आयतें
مَا ضَلَّ صَاحِبُكُمْ وَمَا غَوَىٰ2
وَمَا يَنْطِقُ عَنِ الْهَوَىٰ3
إِنْ هُوَ إِلَّا وَحْيٌ يُوحَىٰ4
عَلَّمَهُ شَدِيدُ الْقُوَىٰ5
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1. इस से अभिप्राय जिब्रील (अलैहिस्सलाम) हैं जो वह़्यी लाते थे।
ذُو مِرَّةٍ فَاسْتَوَىٰ6
وَهُوَ بِالْأُفُقِ الْأَعْلَىٰ7
ثُمَّ دَنَا فَتَدَلَّىٰ8
فَكَانَ قَابَ قَوْسَيْنِ أَوْ أَدْنَىٰ9
فَأَوْحَىٰ إِلَىٰ عَبْدِهِ مَا أَوْحَىٰ10
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1. अर्थात मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की ओर। इन आयतों में नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के जिब्रील (फरिश्ते) को उन के वास्तविक रूप में दो बार देखने का वर्णन है। आइशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) ने कहाः जो कहे कि मुह़म्मद (सल्लल्लहु अलैहि व सल्लम) ने अल्लाह को देखा है तो वह झूठा है। और जो कहे कि आप कल (भविष्य) की बात जानते थे तो वह झूठा है। तथा जो कहे कि आप ने धर्म की कुछ बातें छुपा लीं तो वह झूठा है। किन्तु आप ने जिब्रील (अलैहिस्सलाम) को उन के रूप में दो बार देखा। (बुख़ारीः 4855) इब्ने मसऊद ने कहा कि आप ने जिब्रील को देखा जिन के छः सौ पंख थे। (बुख़ारीः 4856)
مَا كَذَبَ الْفُؤَادُ مَا رَأَىٰ11
أَفَتُمَارُونَهُ عَلَىٰ مَا يَرَىٰ12
وَلَقَدْ رَآهُ نَزْلَةً أُخْرَىٰ13
عِنْدَ سِدْرَةِ الْمُنْتَهَىٰ14
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1. सिद्-रतुल मुन्तहा यह छठे या सातवें आकाश पर बैरी का एक वृक्ष है। जिस तक धरती की चीज़ पहुँचती है। तथा ऊपर की चीज़ उतरती है। (सह़ीह़ मुस्लिमः 173)
عِنْدَهَا جَنَّةُ الْمَأْوَىٰ15
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1. यह आठ स्वर्गों में से एक का नाम है।
إِذْ يَغْشَى السِّدْرَةَ مَا يَغْشَىٰ16
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1. ह़दीस में है कि वह सोने के पतिंगे थे। (सह़ीह़ मुस्लिमः 173)
مَا زَاغَ الْبَصَرُ وَمَا طَغَىٰ17
لَقَدْ رَأَىٰ مِنْ آيَاتِ رَبِّهِ الْكُبْرَىٰ18
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1. इस में मेराज की रात आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के आकाशों में अल्लाह की निशानियाँ देखने का वर्णन है।
أَفَرَأَيْتُمُ اللَّاتَ وَالْعُزَّىٰ19
وَمَنَاةَ الثَّالِثَةَ الْأُخْرَىٰ20
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1. लात, उज़्ज़ा और मनात यह तीनों मक्का के मुश्रिकों की देवियों के नाम हैं। और अर्थ यह है कि क्या इन की भी कोई वास्तविक्ता है?
أَلَكُمُ الذَّكَرُ وَلَهُ الْأُنْثَىٰ21
تِلْكَ إِذًا قِسْمَةٌ ضِيزَىٰ22
إِنْ هِيَ إِلَّا أَسْمَاءٌ سَمَّيْتُمُوهَا أَنْتُمْ وَآبَاؤُكُمْ مَا أَنْزَلَ اللَّهُ بِهَا مِنْ سُلْطَانٍ ۚ إِنْ يَتَّبِعُونَ إِلَّا الظَّنَّ وَمَا تَهْوَى الْأَنْفُسُ ۖ وَلَقَدْ جَاءَهُمْ مِنْ رَبِّهِمُ الْهُدَىٰ23
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1. मुश्रिक अपनी मूर्तियों को अल्लाह की पुत्रियाँ कह कर उन की पूजा करते थे। जिस का यहाँ खण्डन किया जा रहा है।
أَمْ لِلْإِنْسَانِ مَا تَمَنَّىٰ24
فَلِلَّهِ الْآخِرَةُ وَالْأُولَىٰ25
۞ وَكَمْ مِنْ مَلَكٍ فِي السَّمَاوَاتِ لَا تُغْنِي شَفَاعَتُهُمْ شَيْئًا إِلَّا مِنْ بَعْدِ أَنْ يَأْذَنَ اللَّهُ لِمَنْ يَشَاءُ وَيَرْضَىٰ26
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1. अरब के मुश्रिक यह समझते थे कि यदि हम फ़रिश्तों की पूजा करेंगे तो वह अल्लाह से सिफ़ारिश कर के हमें यातना से मुक्त करा देंगे। इसी का खण्डन यहाँ किया जा रहा है।
إِنَّ الَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِالْآخِرَةِ لَيُسَمُّونَ الْمَلَائِكَةَ تَسْمِيَةَ الْأُنْثَىٰ27
وَمَا لَهُمْ بِهِ مِنْ عِلْمٍ ۖ إِنْ يَتَّبِعُونَ إِلَّا الظَّنَّ ۖ وَإِنَّ الظَّنَّ لَا يُغْنِي مِنَ الْحَقِّ شَيْئًا28
فَأَعْرِضْ عَنْ مَنْ تَوَلَّىٰ عَنْ ذِكْرِنَا وَلَمْ يُرِدْ إِلَّا الْحَيَاةَ الدُّنْيَا29
ذَٰلِكَ مَبْلَغُهُمْ مِنَ الْعِلْمِ ۚ إِنَّ رَبَّكَ هُوَ أَعْلَمُ بِمَنْ ضَلَّ عَنْ سَبِيلِهِ وَهُوَ أَعْلَمُ بِمَنِ اهْتَدَىٰ30
وَلِلَّهِ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ لِيَجْزِيَ الَّذِينَ أَسَاءُوا بِمَا عَمِلُوا وَيَجْزِيَ الَّذِينَ أَحْسَنُوا بِالْحُسْنَى31
الَّذِينَ يَجْتَنِبُونَ كَبَائِرَ الْإِثْمِ وَالْفَوَاحِشَ إِلَّا اللَّمَمَ ۚ إِنَّ رَبَّكَ وَاسِعُ الْمَغْفِرَةِ ۚ هُوَ أَعْلَمُ بِكُمْ إِذْ أَنْشَأَكُمْ مِنَ الْأَرْضِ وَإِذْ أَنْتُمْ أَجِنَّةٌ فِي بُطُونِ أُمَّهَاتِكُمْ ۖ فَلَا تُزَكُّوا أَنْفُسَكُمْ ۖ هُوَ أَعْلَمُ بِمَنِ اتَّقَىٰ32
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1. निर्लज्जा से अभिप्राय निर्लज्जा पर आधारित कुकर्म हैं। जैसे बाल-मैथुन, व्यभिचार, नारियों का अपने सौन्दर्य का प्रदर्शन और पर्दे का त्याग, मिश्रित शिक्षा, मिश्रित सभायें, सौन्दर्य की प्रतियोगिता आदि। जिसे आधुनिक युग में सभ्यता का नाम दिया जाता है। और मुस्लिम समाज भी इस से प्रभावित हो रहा है। ह़दीस में है कि सात विनाशकारी कर्मों से बचो। 1- अल्लाह का साझी बनाने से। 2- जादू करना। 3- अकारण जान मारना। 4- मदिरा पीना। 5- अनाथ का धन खाना। 6- युध्द के दिन भागना। 7- तथा भोली-भाली पवित्र स्त्री को कलंक लगाना। (सह़ीह़ बुख़ारीः 2766, मुस्लिमः89) 2. अर्थात तुम्हारे मूल आदम (अलैहिस्सलाम) को।
أَفَرَأَيْتَ الَّذِي تَوَلَّىٰ33
وَأَعْطَىٰ قَلِيلًا وَأَكْدَىٰ34
أَعِنْدَهُ عِلْمُ الْغَيْبِ فَهُوَ يَرَىٰ35
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1. इस आयत में जो परम्परागत धर्म को मोक्ष का साधन समझता है उस से कहा जा रहा है कि क्या वह जानता है कि प्रलय के दिन इतने ही से सफल हो जायेगा? जब कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) वह़्यी के आधार पर जो परस्तु कर रहे हैं वही सत्य है। और अल्लाह की वह़्यी ही परोक्ष के ज्ञान का साधन है।
أَمْ لَمْ يُنَبَّأْ بِمَا فِي صُحُفِ مُوسَىٰ36
وَإِبْرَاهِيمَ الَّذِي وَفَّىٰ37
أَلَّا تَزِرُ وَازِرَةٌ وِزْرَ أُخْرَىٰ38
وَأَنْ لَيْسَ لِلْإِنْسَانِ إِلَّا مَا سَعَىٰ39
وَأَنَّ سَعْيَهُ سَوْفَ يُرَىٰ40
ثُمَّ يُجْزَاهُ الْجَزَاءَ الْأَوْفَىٰ41
وَأَنَّ إِلَىٰ رَبِّكَ الْمُنْتَهَىٰ42
وَأَنَّهُ هُوَ أَضْحَكَ وَأَبْكَىٰ43
وَأَنَّهُ هُوَ أَمَاتَ وَأَحْيَا44
وَأَنَّهُ خَلَقَ الزَّوْجَيْنِ الذَّكَرَ وَالْأُنْثَىٰ45
مِنْ نُطْفَةٍ إِذَا تُمْنَىٰ46
وَأَنَّ عَلَيْهِ النَّشْأَةَ الْأُخْرَىٰ47
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1. अर्थात प्रलय के दिन प्रतिफल प्रदान करने के लिये।
وَأَنَّهُ هُوَ أَغْنَىٰ وَأَقْنَىٰ48
وَأَنَّهُ هُوَ رَبُّ الشِّعْرَىٰ49
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1. शेअरा एक तारे का नाम है। जिस की पूजा कुछ अरब के लोग किया करते थे। (इब्ने कसीर) अर्थ यह है कि यह तारा पूज्य नहीं, वास्तविक पूज्य उस का स्वामी अल्लाह है।
وَأَنَّهُ أَهْلَكَ عَادًا الْأُولَىٰ50
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1. यह हूद (अलैहिस्सलाम) की जाति थे।
وَثَمُودَ فَمَا أَبْقَىٰ51
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1. अर्थात सालेह अलैहिस्सलाम की जाति को।
وَقَوْمَ نُوحٍ مِنْ قَبْلُ ۖ إِنَّهُمْ كَانُوا هُمْ أَظْلَمَ وَأَطْغَىٰ52
وَالْمُؤْتَفِكَةَ أَهْوَىٰ53
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1. अर्थात लूत अलैहिस्सलमा की जाति कि बस्तियों को।
فَغَشَّاهَا مَا غَشَّىٰ54
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1. अर्थात पत्थरों की वर्षा कर के उन की बस्ती को ढाँक दिया।
فَبِأَيِّ آلَاءِ رَبِّكَ تَتَمَارَىٰ55
هَٰذَا نَذِيرٌ مِنَ النُّذُرِ الْأُولَىٰ56
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1. अर्थात मुह़म्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) भी एक रसूल हैं प्रथम रसूलों के समान।
أَزِفَتِ الْآزِفَةُ57
لَيْسَ لَهَا مِنْ دُونِ اللَّهِ كَاشِفَةٌ58
أَفَمِنْ هَٰذَا الْحَدِيثِ تَعْجَبُونَ59
وَتَضْحَكُونَ وَلَا تَبْكُونَ60
وَأَنْتُمْ سَامِدُونَ61
فَاسْجُدُوا لِلَّهِ وَاعْبُدُوا ۩62
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1. ह़दीस में है कि जब सज्दे की प्रथम सूरह "नज्म" उतरी तो नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) और जो आप के पास थे सब ने सज्दा किया एक व्यक्ति के सिवा। उस ने कुछ धूल ली, और उस पर सज्दा किया। तो मैं ने इस के पश्चात् देखा कि वह काफ़िर रहते हुये मारा गया। और वह उमैया बिन ख़लफ़ है। (सह़ीह़ बुख़ारीः 4863)