Abasa

سورة عبس

सूरह 80 · मक्की · 42 आयतें

80:1जुज़ 30 · पृ. 585

عَبَسَ وَتَوَلَّىٰ1

(नबी ने) त्योरी चढ़ाई तथा मुँह फेर लिया।
80:2जुज़ 30 · पृ. 585

أَنْ جَاءَهُ الْأَعْمَىٰ2

इस कारण कि उसके पास एक अँधा आया।
80:3जुज़ 30 · पृ. 585

وَمَا يُدْرِيكَ لَعَلَّهُ يَزَّكَّىٰ3

और तुम क्या जानो शायद वह पवित्रता प्राप्त करे।
80:4जुज़ 30 · पृ. 585

أَوْ يَذَّكَّرُ فَتَنْفَعَهُ الذِّكْرَىٰ4

या नसीह़त ग्रहण करे, जो उसे लाभ देती।
80:5जुज़ 30 · पृ. 585

أَمَّا مَنِ اسْتَغْنَىٰ5

परन्तु, जो विमुख (निश्चिन्त) है।
80:6जुज़ 30 · पृ. 585

فَأَنْتَ لَهُ تَصَدَّىٰ6

तुम उनकी ओर ध्यान दे रहे हो।
80:7जुज़ 30 · पृ. 585

وَمَا عَلَيْكَ أَلَّا يَزَّكَّىٰ7

जबकि तुमपर कोई दोष नहीं, यदि वह पवित्रता ग्रहण न करे।
80:8जुज़ 30 · पृ. 585

وَأَمَّا مَنْ جَاءَكَ يَسْعَىٰ8

तथा जो तुम्हारे पास दौड़ता आया।
80:9जुज़ 30 · पृ. 585

وَهُوَ يَخْشَىٰ9

और वह डर भी रहा है।
80:10जुज़ 30 · पृ. 585

فَأَنْتَ عَنْهُ تَلَهَّىٰ10

तुम उसकी ओर ध्यान नहीं देते।[1]
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1. (1-10) भावार्थ यह है कि सत्य के प्रचारक का यह कर्तव्य है कि जो सत्य की खोज में हो भले ही वह दरिद्र हो उसी के सुधार पर ध्यान दे। और जो अभिमान के कारण सत्य की परवाह नहीं करते उन के पीछे समय न गवायें। आप का यह दायित्व भी नहीं है कि उन्हें अपनी बात मनवा दें।
80:11जुज़ 30 · पृ. 585

كَلَّا إِنَّهَا تَذْكِرَةٌ11

कदापि ये न करो, ये (अर्थात क़ुर्आन) एक स्मृति (याद दहानी) है।
80:12जुज़ 30 · पृ. 585

فَمَنْ شَاءَ ذَكَرَهُ12

अतः, जो चाहे स्मरण (याद) करे।
80:13जुज़ 30 · पृ. 585

فِي صُحُفٍ مُكَرَّمَةٍ13

माननीय शास्त्रों में है।
80:14जुज़ 30 · पृ. 585

مَرْفُوعَةٍ مُطَهَّرَةٍ14

जो ऊँचे तथा पवित्र हैं।
80:15जुज़ 30 · पृ. 585

بِأَيْدِي سَفَرَةٍ15

ऐसे लेखकों (फ़रिश्तों) के हाथों में है।
80:16जुज़ 30 · पृ. 585

كِرَامٍ بَرَرَةٍ16

जो सम्मानित और आदरणीय हैं।[1]
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1. (11-16) इन में क़ुर्आन की महानता को बताया गया है कि यह एक स्मृति (याद दहानी) है। किसी पर थोपने के लिये नहीं आया है। बल्कि वह तो फ़रिश्तों के हाथों में स्वर्ग में एक पवित्र शास्त्र के अन्दर सूरक्षित है। और वहीं से वह (क़ुर्आन) इस संसार में नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) पर उतारा जा रहा है।
80:17जुज़ 30 · पृ. 585

قُتِلَ الْإِنْسَانُ مَا أَكْفَرَهُ17

इन्सान मारा जाये, वह कितना कृतघ्न (नाशुक्रा) है।
80:18जुज़ 30 · पृ. 585

مِنْ أَيِّ شَيْءٍ خَلَقَهُ18

उसे किस वस्तु से (अल्लाह) ने पैदा किया?
80:19जुज़ 30 · पृ. 585

مِنْ نُطْفَةٍ خَلَقَهُ فَقَدَّرَهُ19

उसे वीर्य से पैदा किया, फिर उसका भाग्य बनाया।
80:20जुज़ 30 · पृ. 585

ثُمَّ السَّبِيلَ يَسَّرَهُ20

फिर उसके लिए मार्ग सरल किया।
80:21जुज़ 30 · पृ. 585

ثُمَّ أَمَاتَهُ فَأَقْبَرَهُ21

फिर मौत दी, फिर समाधि में डाल दिया।
80:22जुज़ 30 · पृ. 585

ثُمَّ إِذَا شَاءَ أَنْشَرَهُ22

फिर जब चाहेगा, उसे जीवित कर लेगा।
80:23जुज़ 30 · पृ. 585

كَلَّا لَمَّا يَقْضِ مَا أَمَرَهُ23

वस्तुतः, उसने उसकी आज्ञा का पालन नहीं किया।[1]
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1. (17-23) तक विश्वासहीनों पर धिक्कार है कि यदि वह अपने अस्तित्व पर विचार करें कि हम ने कितनी तुच्छ वीर्य की बूँद से उस की रचना की तथा अपनी दया से उसे चेतना और समझ दी। परन्तु इन सब उपकारों को भूल कर कृतघ्न बना हुआ है, और पूजा उपासना अन्य की करता है।
80:24जुज़ 30 · पृ. 585

فَلْيَنْظُرِ الْإِنْسَانُ إِلَىٰ طَعَامِهِ24

इन्सान अपने भोजन की ओर ध्यान दे।
80:25जुज़ 30 · पृ. 585

أَنَّا صَبَبْنَا الْمَاءَ صَبًّا25

हमने मूसलाधार वर्षा की।
80:26जुज़ 30 · पृ. 585

ثُمَّ شَقَقْنَا الْأَرْضَ شَقًّا26

फिर धरती को चीरा फाड़ा।
80:27जुज़ 30 · पृ. 585

فَأَنْبَتْنَا فِيهَا حَبًّا27

फिर उससे अन्न उगाया।
80:28जुज़ 30 · पृ. 585

وَعِنَبًا وَقَضْبًا28

तथा अंगूर और तरकारियाँ।
80:29जुज़ 30 · पृ. 585

وَزَيْتُونًا وَنَخْلًا29

तथा ज़ैतून एवं खजूर।
80:30जुज़ 30 · पृ. 585

وَحَدَائِقَ غُلْبًا30

तथा घने बाग़।
80:31जुज़ 30 · पृ. 585

وَفَاكِهَةً وَأَبًّا31

एवं फल तथा वनस्पतियाँ।
80:32जुज़ 30 · पृ. 585

مَتَاعًا لَكُمْ وَلِأَنْعَامِكُمْ32

तुम्हारे तथा तुम्हारे पशुओं के लिए।[1]
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1. (24-32) इन आयतों में इन्सान के जीवन साधनों को साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया गया है जो अल्लाह की अपार दया की परिचायक हैं। अतः जब सारी व्यवस्था वही करता है तो फिर उस के इन उपकारों पर इन्सान के लिये उचित था कि उसी की बात माने और उसी के आदेशों का पालन करे जो क़ुर्आन के माध्यम से अन्तिम नबी मूह़म्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्म) द्वारा परस्तुत किया जा रहा है। (दावतुल क़ुर्आन)
80:33जुज़ 30 · पृ. 585

فَإِذَا جَاءَتِ الصَّاخَّةُ33

तो जब कान फाड़ देने वाली (प्रलय) आ जायेगी।
80:34जुज़ 30 · पृ. 585

يَوْمَ يَفِرُّ الْمَرْءُ مِنْ أَخِيهِ34

उस दिन इन्सान अपने भाई से भागेगा।
80:35जुज़ 30 · पृ. 585

وَأُمِّهِ وَأَبِيهِ35

तथा अपने माता और पिता से।
80:36जुज़ 30 · पृ. 585

وَصَاحِبَتِهِ وَبَنِيهِ36

एवं अपनी पत्नी तथा अपने पुत्रों से।
80:37जुज़ 30 · पृ. 585

لِكُلِّ امْرِئٍ مِنْهُمْ يَوْمَئِذٍ شَأْنٌ يُغْنِيهِ37

प्रत्येक व्यक्ति को उस दिन अपनी पड़ी होगी।
80:38जुज़ 30 · पृ. 585

وُجُوهٌ يَوْمَئِذٍ مُسْفِرَةٌ38

उस दिन बहुत से चेहरे उज्ज्वल होंगे।
80:39जुज़ 30 · पृ. 585

ضَاحِكَةٌ مُسْتَبْشِرَةٌ39

हंसते एवं प्रसन्न होंगे।
80:40जुज़ 30 · पृ. 585

وَوُجُوهٌ يَوْمَئِذٍ عَلَيْهَا غَبَرَةٌ40

तथा बहुत-से चेहरों पर धूल पड़ी होगी।
80:41जुज़ 30 · पृ. 586

تَرْهَقُهَا قَتَرَةٌ41

उनपर कालिमा छाई होगी।
80:42जुज़ 30 · पृ. 586

أُولَٰئِكَ هُمُ الْكَفَرَةُ الْفَجَرَةُ42

वही काफ़िर और कुकर्मी लोग हैं।[1]
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1. (33-42) इन आयतों का भावार्थ यह है कि संसार में किसी पर कोई आपदा आती है तो उस के अपने लोग उस की सहायता और रक्षा करते हैं। परन्तु प्रलय के दिन सब को अपनी अपनी पड़ी होगी और उस के कर्म ही उस की रक्षा करेंगे।

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