An-Naba

سورة النبأ

सूरह 78 · मक्की · 40 आयतें

78:1जुज़ 30 · पृ. 582

عَمَّ يَتَسَاءَلُونَ1

वे आपस में किस विषय में प्रश्न कर रहे हैं?
78:2जुज़ 30 · पृ. 582

عَنِ النَّبَإِ الْعَظِيمِ2

बहुत बड़ी सूचना के विषय में।
78:3जुज़ 30 · पृ. 582

الَّذِي هُمْ فِيهِ مُخْتَلِفُونَ3

जिसमें मतभेद कर रहे हैं।
78:4जुज़ 30 · पृ. 582

كَلَّا سَيَعْلَمُونَ4

निश्चय वे जान लेंगे।
78:5जुज़ 30 · पृ. 582

ثُمَّ كَلَّا سَيَعْلَمُونَ5

फिर निश्चय वे जान लेंगे।[1]
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1. (1-5) इन आयतों में उन को धिक्कारा गया है, जो प्रलय की हँसी उड़ाते हैं। जैसे उन के लिये प्रलय की सूचना किसी गंभीर चिन्ता के योग्य नहीं। परन्तु वह दिन दूर नहीं जब प्रलय उन के आगे आ जायेगी और वे विश्व विधाता के सामने उत्तरदायित्व के लिये उपस्थित होंगे।
78:6जुज़ 30 · पृ. 582

أَلَمْ نَجْعَلِ الْأَرْضَ مِهَادًا6

क्या हमने धरती को पालना नहीं बनाया?
78:7जुज़ 30 · पृ. 582

وَالْجِبَالَ أَوْتَادًا7

और पर्वतों को मेख?
78:8जुज़ 30 · पृ. 582

وَخَلَقْنَاكُمْ أَزْوَاجًا8

तथा तुम्हें जोड़े-जोड़े पैदा किया।
78:9जुज़ 30 · पृ. 582

وَجَعَلْنَا نَوْمَكُمْ سُبَاتًا9

तथा तुम्हारी निद्रा को स्थिरता (आराम) बनाया।
78:10जुज़ 30 · पृ. 582

وَجَعَلْنَا اللَّيْلَ لِبَاسًا10

और रात को वस्त्र बनाया।
78:11जुज़ 30 · पृ. 582

وَجَعَلْنَا النَّهَارَ مَعَاشًا11

और दिन को कमाने के लिए बनाया।
78:12जुज़ 30 · पृ. 582

وَبَنَيْنَا فَوْقَكُمْ سَبْعًا شِدَادًا12

तथा हमने तुम्हारे ऊपर सात दृढ़ आकाश बनाये।
78:13जुज़ 30 · पृ. 582

وَجَعَلْنَا سِرَاجًا وَهَّاجًا13

और एक दमकता दीप (सूर्य) बनाया।
78:14जुज़ 30 · पृ. 582

وَأَنْزَلْنَا مِنَ الْمُعْصِرَاتِ مَاءً ثَجَّاجًا14

और बादलों से मूसलाधार वर्षा की।
78:15जुज़ 30 · पृ. 582

لِنُخْرِجَ بِهِ حَبًّا وَنَبَاتًا15

ताकि उससे अन्न और वनस्पति उपजायें।
78:16जुज़ 30 · पृ. 582

وَجَنَّاتٍ أَلْفَافًا16

और घने-घने बाग़।[1]
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1. (6-16) इन आयतों में अल्लाह की शक्ति प्रतिपालन (रूबूबिय्यत) और प्रज्ञा के लक्षण दर्शाये गये हैं जो यह साक्ष्य देते हैं कि प्रतिकार (बदले) का दिन आवश्यक है, क्योंकि जिस के लिये इतनी बड़ी व्यवस्था की गई हो और उसे कर्मों के अधिकार भी दिये गये हों तो उस के कर्मों का पुरस्कार या दण्ड तो मिलना ही चाहिये।
78:17जुज़ 30 · पृ. 582

إِنَّ يَوْمَ الْفَصْلِ كَانَ مِيقَاتًا17

निश्चय निर्णय (फ़ैसले) का दिन निश्चित है।
78:18जुज़ 30 · पृ. 582

يَوْمَ يُنْفَخُ فِي الصُّورِ فَتَأْتُونَ أَفْوَاجًا18

जिस दिन सूर में फूँका जायेगा। फिर तुम दलों ही दलों में चले आओगे।
78:19जुज़ 30 · पृ. 582

وَفُتِحَتِ السَّمَاءُ فَكَانَتْ أَبْوَابًا19

और आकाश खोल दिया जायेगा, तो उसमें द्वार ही द्वार हो जायेंगे।
78:20जुज़ 30 · पृ. 582

وَسُيِّرَتِ الْجِبَالُ فَكَانَتْ سَرَابًا20

और पर्वत चला दिये जायेंगे, तो वे मरिचिका बन जायेंगे।[1]
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1. (17-20) इन आयतों में बताया जा रहा है कि निर्णय का दिन अपने निश्चित समय पर आकर रहेगा, उस दिन आकाश तथा धरती में एक बड़ी उथल पुथल होगी। इस के लिये सूर में एक फूँक मारने की देर है। फिर जिस की सूचना दी जा रही है तुम्हारे सामने आ जायेगी। तुम्हारे मानने या न मानने का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। और सब अपना ह़िसाब देने के लिये अल्लाह के न्यायालय की ओर चल पड़ेंगे।
78:21जुज़ 30 · पृ. 582

إِنَّ جَهَنَّمَ كَانَتْ مِرْصَادًا21

वास्तव में, नरक घात में है।
78:22जुज़ 30 · पृ. 582

لِلطَّاغِينَ مَآبًا22

जो दुराचारियों का स्थान है।
78:23जुज़ 30 · पृ. 582

لَابِثِينَ فِيهَا أَحْقَابًا23

जिसमें वे असंख्य वर्षों तक रहेंगे।
78:24जुज़ 30 · पृ. 582

لَا يَذُوقُونَ فِيهَا بَرْدًا وَلَا شَرَابًا24

उसमें ठणडी तथा पेय (पीने की चीज़) नहीं चखेंगे।
78:25जुज़ 30 · पृ. 582

إِلَّا حَمِيمًا وَغَسَّاقًا25

सिवाये गर्म पानी और पीप रक्त के।
78:26जुज़ 30 · पृ. 582

جَزَاءً وِفَاقًا26

ये पूरा-पूरा प्रतिफल है।
78:27जुज़ 30 · पृ. 582

إِنَّهُمْ كَانُوا لَا يَرْجُونَ حِسَابًا27

निःसंदेह वे ह़िसाब की आशा नहीं रखते थे।
78:28जुज़ 30 · पृ. 582

وَكَذَّبُوا بِآيَاتِنَا كِذَّابًا28

तथा वे हमारी आयतों को झुठलाते थे।
78:29जुज़ 30 · पृ. 582

وَكُلَّ شَيْءٍ أَحْصَيْنَاهُ كِتَابًا29

और हमने सब विषय लिखकर सुरक्षित कर लिये हैं।
78:30जुज़ 30 · पृ. 582

فَذُوقُوا فَلَنْ نَزِيدَكُمْ إِلَّا عَذَابًا30

तो चखो, हम तुम्हारी यातना अधिक ही करते रहेंगे।[1]
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1. (21-30) इन आयतों में बताया गया है कि जो ह़िसाब की आशा नहीं रखते और हमारी आयतों को नहीं मानते हम ने उन के एक एक कर्तूत को गिन कर अपने यहाँ लिख रखा है। और उन की ख़बर लेने के लिये नरक घात लगाये तैयार है, जहाँ उन के कुकर्मों का भरपूर बदला दिया जायेगा।
78:31जुज़ 30 · पृ. 583

إِنَّ لِلْمُتَّقِينَ مَفَازًا31

वास्तव में, जो डरते हैं उन्हीं के लिए सफलता है।
78:32जुज़ 30 · पृ. 583

حَدَائِقَ وَأَعْنَابًا32

बाग़ तथा अँगूर हैं।
78:33जुज़ 30 · पृ. 583

وَكَوَاعِبَ أَتْرَابًا33

और नवयुवति कुमारियाँ।
78:34जुज़ 30 · पृ. 583

وَكَأْسًا دِهَاقًا34

और छलकते प्याले।
78:35जुज़ 30 · पृ. 583

لَا يَسْمَعُونَ فِيهَا لَغْوًا وَلَا كِذَّابًا35

उसमें बकवास और मिथ्या बातें नहीं सुनेंगे।
78:36जुज़ 30 · पृ. 583

جَزَاءً مِنْ رَبِّكَ عَطَاءً حِسَابًا36

ये तुम्हारे पालनहार की ओर से भरपूर पुरस्कार है।
78:37जुज़ 30 · पृ. 583

رَبِّ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَمَا بَيْنَهُمَا الرَّحْمَٰنِ ۖ لَا يَمْلِكُونَ مِنْهُ خِطَابًا37

जो आकाश, धरती तथा जो उनके बीच है, सबका अति करुणामय पालनहार है। जिससे बात करने का वे साहस नहीं कर सकेंगे।
78:38जुज़ 30 · पृ. 583

يَوْمَ يَقُومُ الرُّوحُ وَالْمَلَائِكَةُ صَفًّا ۖ لَا يَتَكَلَّمُونَ إِلَّا مَنْ أَذِنَ لَهُ الرَّحْمَٰنُ وَقَالَ صَوَابًا38

जिस दिन रूह़ (जिब्रील) तथा फ़रिश्ते पंक्तियों में खड़े होंगे, वही बात कर सकेगा जिसे रहमान (अल्लाह) आज्ञा देगा और सह़ीह़ बात करेगा।
78:39जुज़ 30 · पृ. 583

ذَٰلِكَ الْيَوْمُ الْحَقُّ ۖ فَمَنْ شَاءَ اتَّخَذَ إِلَىٰ رَبِّهِ مَآبًا39

वह दिन निःसंदेह होना ही है। अतः जो चाहे अपने पालनहार की ओर (जाने का) ठिकाना बना ले।[1]
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1. (37-39) इन आयतों में अल्लाह के न्यायालय में उपस्थिति (ह़ाज़िरी) का चित्र दिखाया गया है। और जो इस भ्रम में पड़े हैं कि उन के देवी देवता आदि अभिस्तावना करेंगे उन को सावधान किया गया है कि उस दिन कोई बिना उस की आज्ञा के मुँह नहीं खोलेगा और अल्लाह की आज्ञा से अभिस्तावना भी करेगा तो उसी के लिये जो संसार में सत्य वचन "ला इलाहा इल्लल्लाह" को मानता हो। अल्लाह के द्रोही और सत्य के विरोधी किसी अभिस्तावना के योग्य नगीं होंगे।
78:40जुज़ 30 · पृ. 583

إِنَّا أَنْذَرْنَاكُمْ عَذَابًا قَرِيبًا يَوْمَ يَنْظُرُ الْمَرْءُ مَا قَدَّمَتْ يَدَاهُ وَيَقُولُ الْكَافِرُ يَا لَيْتَنِي كُنْتُ تُرَابًا40

हमने तुम्हें समीप यातना से सावधान कर दिया, जिस दिन इन्सान अपना करतूत देखेगा और काफ़िर (विश्वासहीन) कहेगा कि काश मैं मिट्टी हो जाता![1]
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1. (40) बात को इस चेतावनी पर समाप्त किया गया है कि जिस दिन के आने की सूचना दी जा रही है, उस का आना सत्य है, उसे दूर न समझो। अब जिस का दिल चाहे इसे मान कर अपने पालनहार की ओर मार्ग बना ले। परन्तु इस चेतावनी के होते जो इन्कार करेगा उस का किया धरा सामने आयेगा तो पछता-पछता कर यह कामना करेगा कि मैं संसार में पैदा ही न होता। उस समय इस संसार के बारे में उस का यह विचार होगा जिस के प्रेम में आज वह परलोक से अंधा बना हुआ है।

सूरह के आरंभ से चलाएँ