Al-Buruj

سورة البروج

सूरह 85 · मक्की · 22 आयतें

85:1जुज़ 30 · पृ. 590

وَالسَّمَاءِ ذَاتِ الْبُرُوجِ1

शपथ है बुर्जों वाले आकाश की!
85:2जुज़ 30 · पृ. 590

وَالْيَوْمِ الْمَوْعُودِ2

शपश है उस दिन की, जिसका वचन दिया गया!
85:3जुज़ 30 · पृ. 590

وَشَاهِدٍ وَمَشْهُودٍ3

शपथ है साक्षी की और जिसपर साक्ष्य देगा!
85:4जुज़ 30 · पृ. 590

قُتِلَ أَصْحَابُ الْأُخْدُودِ4

खाईयों वालों का नाश हो गया![1]
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1. (1-4) इन में तीन चीज़ों की शपथ ली गई है। (1) बुर्जों वाले आकाश की। (2) प्रलय की, जिस का वचन दिया गया है। (3) प्रलय के भ्यावह दृश्य की और उस पूरी उत्पत्ति की जो उसे देखेगी। प्रथम शपथ इस बात की गवाही दे रही है जो शक्ति इस आकास के ग्रहों पर राज कर रही है उस की पकड़ से यह तुच्छ इन्सान बच कर कहाँ जा सकता है? दूसरी शपथ इस बात पर है कि संसार में इन्सान जो अत्याचार करना चाहे कर ले, परन्तु वह दिन अवश्य आना है जिस से उसे सावधान किया जा रहा है, जिस में सब के साथ न्याय किया जायेगा, और अत्याचारियों की पकड़ की जायेगी। तीसरी शपथ इस पर है कि जैसे इन अत्याचारियों ने विवश आस्तिकों के जलने का दृश्य देखा, इसी प्रकार प्रलय के दिन पूरी मानव जाति देखेगी कि उन की क्या दुर्गत है।
85:5जुज़ 30 · पृ. 590

النَّارِ ذَاتِ الْوَقُودِ5

जिनमें भड़कते हुए ईंधन की अग्नि थी।
85:6जुज़ 30 · पृ. 590

إِذْ هُمْ عَلَيْهَا قُعُودٌ6

जबकि वे उनपर बैठे हुए थे।
85:7जुज़ 30 · पृ. 590

وَهُمْ عَلَىٰ مَا يَفْعَلُونَ بِالْمُؤْمِنِينَ شُهُودٌ7

और वे ईमान वालों के साथ जो कर रहे थे, उसे देख रहे थे।
85:8जुज़ 30 · पृ. 590

وَمَا نَقَمُوا مِنْهُمْ إِلَّا أَنْ يُؤْمِنُوا بِاللَّهِ الْعَزِيزِ الْحَمِيدِ8

और उनका दोष केवल यही था कि वे प्रभावी प्रशंसा किये अल्लाह के प्रति विश्वास किये हुए थे।
85:9जुज़ 30 · पृ. 590

الَّذِي لَهُ مُلْكُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ ۚ وَاللَّهُ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ شَهِيدٌ9

जो आकाशों तथा धरती के राज्य का स्वामी है और अल्लाह सब कुछ देख रहा है।
85:10जुज़ 30 · पृ. 590

إِنَّ الَّذِينَ فَتَنُوا الْمُؤْمِنِينَ وَالْمُؤْمِنَاتِ ثُمَّ لَمْ يَتُوبُوا فَلَهُمْ عَذَابُ جَهَنَّمَ وَلَهُمْ عَذَابُ الْحَرِيقِ10

जिन्होंने ईमान लाने वाले नर नारियों को परीक्षा में डाला, फिर क्षमा याचना न की, उनके लिए नरक का दण्ड तथा भड़कती आग की यातना है।
85:11जुज़ 30 · पृ. 590

إِنَّ الَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ لَهُمْ جَنَّاتٌ تَجْرِي مِنْ تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ ۚ ذَٰلِكَ الْفَوْزُ الْكَبِيرُ11

वास्तव में, जो ईमान लाये और सदाचार बने, उनके लिए ऐसे स्वर्ग हैं, जिनके तले नहरें बह रही हैं और यही बड़ी सफलता है।[1]
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1. (5-11) इन आयतों में जो आस्तिक सताये गये उन के लिये सहायता का वचन तथा यदि वे अपने विश्वास (ईमान) पर स्थित रहे तो उन के लिये स्वर्ग की शुभ सूचना और अत्याचारियों के लिये नरक की धमकी है जिन्होंने उन को सताया और फिर अल्लाह से क्षमा याचना आदि कर के सत्य को नहीं माना।
85:12जुज़ 30 · पृ. 590

إِنَّ بَطْشَ رَبِّكَ لَشَدِيدٌ12

निश्चय तेरे पालनहार की पकड़ बहुत कड़ी है।
85:13जुज़ 30 · पृ. 590

إِنَّهُ هُوَ يُبْدِئُ وَيُعِيدُ13

वही पहले पैदा करता है और फिर दूसरी बार पैदा करेगा।
85:14जुज़ 30 · पृ. 590

وَهُوَ الْغَفُورُ الْوَدُودُ14

और वह अति क्षमा तथा प्रेम करने वाला है।
85:15जुज़ 30 · पृ. 590

ذُو الْعَرْشِ الْمَجِيدُ15

वह सिंहासन का महान स्वामी है।
85:16जुज़ 30 · पृ. 590

فَعَّالٌ لِمَا يُرِيدُ16

वह जो चाहे करता है।[1]
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1. (12-16) इन आयतों में बताया गया है कि अल्लाह की पकड़ के साथ ही जो क्षमा याचना कर के उस पर ईमान लाये, उस के लिये क्षमा और दया का द्वार खुला हुआ है। क़ुर्आन ने इस कुविचार का खण्डन किया है कि अल्लाह, पापों को क्षमा नहीं कर सकता। क्योंकि इस से संसार पापों से भर जायेगा और कोई स्वार्थी पापा कर के क्षमा याचना कर लेगा फिर पाप करेगा। यह कुविचार उस समय सह़ीह़ हो सकता है जब अल्लाह को एक इन्सान मान लिया जाये, जो यह न जानता हो कि जो व्यक्ति क्षमा माँग रहा है उस के मन में क्या है? अल्लाह तो मर्मज्ञ है, वह जानता है कि किस के मन में क्या है? फिर "तौबा" इस का नाम नहीं कि मुख से इस शब्द को बोल दिया जाये। तौबा (पश्चानुताप) मन से पाप न करने के प्रयत्न का नाम है और इसे अल्लाह तआला जानता है कि किसा के मन में क्या है?
85:17जुज़ 30 · पृ. 590

هَلْ أَتَاكَ حَدِيثُ الْجُنُودِ17

हे नबी! क्या तुम्हें सेनाओं की सूचना मिली?
85:18जुज़ 30 · पृ. 590

فِرْعَوْنَ وَثَمُودَ18

फ़िरऔन तथा समूद को।[1]
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1. (17-18) इन में अतीत की कुछ अत्याचारी जातियों की ओर संकेत है, जिन का सविस्तार वर्णन क़ुर्आन की अनेक सूरतों में आया है। जिन्होंने आस्तिकों पर अत्याचार किये जैसे मक्का के क़ुरैश मुसलमानों पर कर रहे थे। जब कि उन को पता था कि पिछली जातियों के साथ क्या हुआ। परन्तु वे अपने परिणाम से निश्चेत थे।
85:19जुज़ 30 · पृ. 590

بَلِ الَّذِينَ كَفَرُوا فِي تَكْذِيبٍ19

बल्कि काफ़िर (विश्वासहीन) झुठलाने में लगे हुए हैं।
85:20जुज़ 30 · पृ. 590

وَاللَّهُ مِنْ وَرَائِهِمْ مُحِيطٌ20

और अल्लाह उन्हें हर ओर से घेरे हुए है।[1]
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1. (19-20) इन दो आयतों में उन के दुर्भाग्य को बताया जा रहा है जो अपने प्रभुत्व के गर्व में क़ुर्आन को नहीं मानते। जब कि उसे माने बिना कोई उपाय नहीं, और वह अल्लाह के अधिकार के भीतर ही हैं।
85:21जुज़ 30 · पृ. 590

بَلْ هُوَ قُرْآنٌ مَجِيدٌ21

बल्कि, वह गौरव वाला क़ुर्आन है।
85:22जुज़ 30 · पृ. 590

فِي لَوْحٍ مَحْفُوظٍ22

जो लेखपत्र (लौह़े मह़फ़ूज़) में सुरक्षित है।[1]
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1. (21-22) इन आयतों में बताया गया है कि यह क़ुर्आन कविता और ज्योतिष नहीं है जैसा कि वह सोचते हैं, यह श्रेष्ठ और उच्चतम अल्लाह का कथन है जिस का उद्गम "लौह़े मह़फ़ूज़" में सुरक्षित है।

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