Ad-Duha

سورة الضحى

सूरह 93 · मक्की · 11 आयतें

93:1जुज़ 30 · पृ. 596

وَالضُّحَىٰ1

शपथ है दिन चढ़े की!
93:2जुज़ 30 · पृ. 596

وَاللَّيْلِ إِذَا سَجَىٰ2

और शपथ है रात्रि की, जब उसका सन्नाटा छा जाये!
93:3जुज़ 30 · पृ. 596

مَا وَدَّعَكَ رَبُّكَ وَمَا قَلَىٰ3

(हे नबी!) तेरे पालनहार ने तुझे न तो छोड़ा और ने ही विमुख हुआ।
93:4जुज़ 30 · पृ. 596

وَلَلْآخِرَةُ خَيْرٌ لَكَ مِنَ الْأُولَىٰ4

और निश्चय ही आगामी युग तेरे लिए प्रथम युग से उत्तम है।

وَلَسَوْفَ يُعْطِيكَ رَبُّكَ فَتَرْضَىٰ5

और तेरा पालनहार तुझे इतना देगा कि तू प्रसन्न हो जायेगा।
93:6जुज़ 30 · पृ. 596

أَلَمْ يَجِدْكَ يَتِيمًا فَآوَىٰ6

क्या उसने तुझे अनाथ पाकर शरण नहीं दी?
93:7जुज़ 30 · पृ. 596

وَوَجَدَكَ ضَالًّا فَهَدَىٰ7

और तुझे पथ भूला हुआ पाया, तो सीधा मार्ग नहीं दिखाया?
93:8जुज़ 30 · पृ. 596

وَوَجَدَكَ عَائِلًا فَأَغْنَىٰ8

और निर्धन पाया, तो धनी नहीं कर दिया?
93:9जुज़ 30 · पृ. 596

فَأَمَّا الْيَتِيمَ فَلَا تَقْهَرْ9

तो तुम अनाथ पर क्रोध न करना।[1]
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1. (1-9) इन आयतों में अल्लाह ने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से फ़रमाया है कि तुम्हें यह चिन्ता कैसे हो गई है कि हम अप्रसन्न हो गये? हम ने तो तुम्हारे जन्म के दिन से निरन्तर तुम पर उपकार किये हैं। तुम अनाथ थे तो तुम्हारे पालन और रक्षा की व्यवस्था की। राह से अंजान थे तो राह दिखाई। निर्धन थे तो धनी बना दिया। यह बातें बता रही हैं कि तुम आरम्भ ही से हमारे प्रियवर हो और तुम पर हमारा उपकार निरन्तर है।
93:10जुज़ 30 · पृ. 596

وَأَمَّا السَّائِلَ فَلَا تَنْهَرْ10

और माँगने वाले को न झिड़कना।
93:11जुज़ 30 · पृ. 596

وَأَمَّا بِنِعْمَةِ رَبِّكَ فَحَدِّثْ11

और अपने पालनहार के उपकार का वर्णन करना।[1]
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1. (10-11) इन अन्तिम आयतों में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को बताया गया है कि हम ने तुम पर जो उपकार किये हैं उन के बदले में तुम अल्लाह की उत्पत्ति के साथ दया और उपकार करो यही हमारे उपकारों की कृतज्ञता होगी।

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