सूरह 7 · जुज़ 9
Al-A'raf · 7:177
سَاءَ مَثَلًا الْقَوْمُ الَّذِينَ كَذَّبُوا بِآيَاتِنَا وَأَنْفُسَهُمْ كَانُوا يَظْلِمُونَ
उनकी उपमा कितनी बुरी है, जिन लोगों ने हमारी आयतों को झुठला दिया! और वे अपने ही ऊपर अत्याचार[1] कर रहे थे।
____________________
1. भाष्यकारों ने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के युग और प्राचीन युग के कई ऐसे व्यक्तियों का नाम लिया है, जिन का यह उदाहरण हो सकता है। परन्तु आयत का भावार्थ बस इतना है कि प्रत्येक व्यक्ति जिस में यह अवगुण पाये जाते हों, उस की दशा यही होती है, जिस की जीभ से माया-मोह के कारण राल टपकती रहती है, और उस की लोभाग्नि कभी नहीं बुझती।
____________________
1. भाष्यकारों ने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के युग और प्राचीन युग के कई ऐसे व्यक्तियों का नाम लिया है, जिन का यह उदाहरण हो सकता है। परन्तु आयत का भावार्थ बस इतना है कि प्रत्येक व्यक्ति जिस में यह अवगुण पाये जाते हों, उस की दशा यही होती है, जिस की जीभ से माया-मोह के कारण राल टपकती रहती है, और उस की लोभाग्नि कभी नहीं बुझती।
तफ़सीर
उन लोगों से अधिक बुरा कोई नहीं है, जिन्होंने हमारे तर्कों और सबूतों को झुठला दिया और उनपर विश्वास नहीं किया। इस प्रकार वे खुद को विनाश के घाट उतार कर अपने ही ऊपर अत्याचार कर रहे थे।
पाठक में खोलें - पूरी सूरह पढ़ें