सूरह 65 · जुज़ 28

At-Talaq · 65:2

فَإِذَا بَلَغْنَ أَجَلَهُنَّ فَأَمْسِكُوهُنَّ بِمَعْرُوفٍ أَوْ فَارِقُوهُنَّ بِمَعْرُوفٍ وَأَشْهِدُوا ذَوَيْ عَدْلٍ مِنْكُمْ وَأَقِيمُوا الشَّهَادَةَ لِلَّهِ ۚ ذَٰلِكُمْ يُوعَظُ بِهِ مَنْ كَانَ يُؤْمِنُ بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الْآخِرِ ۚ وَمَنْ يَتَّقِ اللَّهَ يَجْعَلْ لَهُ مَخْرَجًا

फिर जब पहुचने लगें अपने निर्धारित अवधि को, तो उन्हें रोक लो नियमानुसार अथवा अलग कर दो नियमानुसार[1] और गवाह (साक्षी) बना लो[2] अपने में से दो न्यायकारियों को तथा सीधी गवाही दो अल्लाह के[3] लिए। इसकी शिक्षा दी जा रही है उसे, जो ईमान रखता हो अल्लाह तथा अन्त-दिवस (प्रलय) पर और जो कोई डरता हो अल्लाह से, तो वह बना देगा उसके लिए कोई निकलने का उपाय।
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1. अर्थात तलाक़ तथा रज्अत पर। 2. यदि एक या दो तलाक़ दी हो। (देखियेः सूरह बक़रह, आयतः229) 3. अर्थात निष्पक्ष हो कर।

तफ़सीर

फिर जब उनकी इद्दत समाप्त होने लगे, तो उन्हें इच्छा और अच्छे सहवास के साथ लौटा लो, या उन्हें लौटाने से बाज़ रहो यहाँ तक कि उनकी इद्दत गुज़र जाए, फिर वे अपने मामले के मालिक हो जाएँगीं। तथा उनके जो अधिकार हैं, उन्हें दे दो। और जब तुम उन्हें लौटाना या अलग करना चाहो, तो विवाद को समाप्त करने के लिए अपने में से दो न्यायवान् व्यक्तियों को गवाह बना लो। और (ऐ गवाहो) तुम अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए ठीक-ठीक गवाही दो। इन अहकाम के द्वारा उस व्यक्ति को नसीहत की जाती है, जो अल्लाह और क़ियामत के दिन पर ईमान रखता है, क्योंकि वही याद दिलाने और उपदेश से लाभान्वित होता है। और जो कोई भी अल्लाह से, उसके आदेशों का पालन करके और उसके निषेधों से बचकर, डरता है, उसके लिए अल्लाह हर तंगी और परेशानी से निकलने का रास्ता बना देगा।

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