सूरह 40 · जुज़ 24

Ghafir · 40:67

هُوَ الَّذِي خَلَقَكُمْ مِنْ تُرَابٍ ثُمَّ مِنْ نُطْفَةٍ ثُمَّ مِنْ عَلَقَةٍ ثُمَّ يُخْرِجُكُمْ طِفْلًا ثُمَّ لِتَبْلُغُوا أَشُدَّكُمْ ثُمَّ لِتَكُونُوا شُيُوخًا ۚ وَمِنْكُمْ مَنْ يُتَوَفَّىٰ مِنْ قَبْلُ ۖ وَلِتَبْلُغُوا أَجَلًا مُسَمًّى وَلَعَلَّكُمْ تَعْقِلُونَ

वही है, जिसने तुम्हें पैदा किया मिट्टी से, फिर वीर्य से, फिर बंधे रक्त से, फिर तुम्हें निकालता है (गर्भाशयों से) शिशु बनाकर। फिर बड़ा करता है, ताकि तुम अपनी पूरी शक्ति को पहुँचो। फिर बूढ़े हो जाओ तथा तुममें कुछ इससे पहले ही मर जाते हैं और ये इसलिए होता है, ताकि तुम अपनी निश्चित आयु को पहुँच जाओ तथा ताकि तुम समझो।[1]
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1. अर्थात तुम यह समझो कि जो अल्लाह तुम्हें अस्तित्व में लाता है तथा गर्भ से ले कर आयु पूरी होने तक तुम्हारा पालन-पोषण करता है तुम स्वयं अपने जीवन और मरण के विषय में कोई अधिकार नहीं रखते तो फिर तुम्हें वंदना भी उसी एक की करनी चाहिये। यही समझ-बूझ का निर्णय है।

तफ़सीर

वही है, जिसने तुमहारे बाप आदम (अलैहिस्सलाम) को मिट्टी से पैदा किया। फ़िर उसके पश्चात तम्हें वीर्य से पैदा किया। फ़िर वीर्य के बाद जमे हुए रक्त से। फिर वह तुम्हें तुम्हारी माओं के गर्भाशयों से शिशु बनाकर निकालता है। फिर तुम्हें बड़े करता है, ताकि तुम शारीरिक रूप से मज़बूती की आयु तक पहुँच जाओ। फिर तुम बूढ़े हो जाओ। और तुममें से कोई तो इससे पहले ही मर जाता है। यह इसलिए होता है, ताकि तुम उस आयु तक पहुँच जाओ, जो अल्लाह के ज्ञान में निर्धारित है, न तुम उसे घटा सकते हो न बढ़ा सकते हो। और ताकि तुम इन प्रमाणों और दलीलों से अल्लाह की शक्ति और उसके एकत्व का पता लगा सको।

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