सूरह 4 · जुज़ 5

An-Nisa · 4:83

وَإِذَا جَاءَهُمْ أَمْرٌ مِنَ الْأَمْنِ أَوِ الْخَوْفِ أَذَاعُوا بِهِ ۖ وَلَوْ رَدُّوهُ إِلَى الرَّسُولِ وَإِلَىٰ أُولِي الْأَمْرِ مِنْهُمْ لَعَلِمَهُ الَّذِينَ يَسْتَنْبِطُونَهُ مِنْهُمْ ۗ وَلَوْلَا فَضْلُ اللَّهِ عَلَيْكُمْ وَرَحْمَتُهُ لَاتَّبَعْتُمُ الشَّيْطَانَ إِلَّا قَلِيلًا

और जब उनके पास शांति या भय की कोई सूचना आती है, तो उसे फैला देते हैं। जबकि यदि वे उसे अल्लाह के रसूल तथा अपने अधिकारियों की ओर फेर देते, तो जो बात की तह तक पहुँचने वाले हैं, वे उसकी वास्तविक्ता जान लेते। यदि तुमपर अल्लाह की अनुकम्पा तथा दया न होती, तो तुममें थोड़े के सिवा सब शैतान के पीछे भाग[1] जाते।
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1. इस आयत द्वारा यह निर्देश दिया जा रहा है कि जब भी साधारण शांति या भय की कोई सूचना मिले तो उसे अधिकारियों तथा शासकों तक पहुँचा दिया जाये।

तफ़सीर

जब इन मुनाफ़िक़ों के पास मुसलमानों की सुरक्षा और ख़ुशी, या उनके डर और दुःख की कोई सूचना आती है, तो उसे फैला देते और प्रकाशित कर देते हैं। यदि वे धीरज धरते और उस मामले को रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की ओर तथा सोच-विचार, ज्ञान एवं शुभचिंतन वाले लोगों की तरफ़ लौटा देते, तो सोच-विचार करने और निष्कर्ष निकालने वाले लोग इस बात को अवश्य जान लेते कि उसे प्रकाशित करना चाहिए या गोपनीय रखना चाहिए। और - ऐ मोमिनो! - अगर इस्लाम के साथ तुमपर अल्लाह की अनुकंपा और क़ुरआन के साथ तुमपर उसकी दया न होती कि उसने तुम्हें उस दुर्दशा से सुरक्षित रखा जिससे इन मुनाफ़िक़ों को पीड़ित किया है; तो तुममें से कुछ को छोड़कर, सब शैतान के बहकावे में आ जाते।

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