सूरह 39 · जुज़ 24

Az-Zumar · 39:42

اللَّهُ يَتَوَفَّى الْأَنْفُسَ حِينَ مَوْتِهَا وَالَّتِي لَمْ تَمُتْ فِي مَنَامِهَا ۖ فَيُمْسِكُ الَّتِي قَضَىٰ عَلَيْهَا الْمَوْتَ وَيُرْسِلُ الْأُخْرَىٰ إِلَىٰ أَجَلٍ مُسَمًّى ۚ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَآيَاتٍ لِقَوْمٍ يَتَفَكَّرُونَ

अल्लाह ही खींचता है प्राणों को, उनके मरण के समय तथा जिसके मरण का समय नहीं आया, उसकी निद्रा में। फिर रोक लेता है जिसपर निर्णय कर दिया हो मरण का तथा भेज देता है अन्य को, एक निर्धारित समय तक के लिए। वास्तव में, इसमें कई निशानियाँ हैं उनके लिए, जो मनन-चिन्तन[1] करते हों।
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1. इस आयत में बताया जा रहा है कि मरण तथा जीवन अल्लाह के नियंत्रण में हैं। निद्रा में प्राणों को खींचने का अर्थ है, उन की संवेदन शक्ति को समाप्त कर देना। अतः कोई इस निद्रा की दशा पर विचार करे तो यह समझ सकता है कि अल्लाह मुर्दों को भी जीवित कर सकता है।

तफ़सीर

अल्लाह ही उन प्राणों को क़ब्ज़ करता है, जिनका निर्धारित समय खत्म हो चुका हो। और रहे वह, जिनका निर्धारित समय खत्म नही हुआ है, तो उनको नींद के समय क़ब्ज़ करता है। फिर जिसकी मौत का फ़ैसला हो चुका हो, उसे रोक लेता है और जिसकी मौत का फ़ैसला न हुआ हो, उसे अपने ज्ञान के उनुसार एक निर्धारित समय तक छोड़ देता है। अवश्य इस क़ब्ज़ करने तथा छोड़ने और मौत देने तथा जीवित रखने में, उन लोगों के लिए निशानियाँ हैं, जो इस बिंदु पर सोचते हैं कि वह हस्ती जो ऐसा करने की क्षमता रखती है, वह लोगों को मरने के पश्चात हिसाब व प्रतिफ़ल के लिए दोबारा ज़िंदा भी कर सकती है।

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