सूरह 34 · जुज़ 22
Saba · 34:52
وَقَالُوا آمَنَّا بِهِ وَأَنَّىٰ لَهُمُ التَّنَاوُشُ مِنْ مَكَانٍ بَعِيدٍ
और कहेंगेः हम उस[1] पर ईमान लाये तथा कहाँ हाथ आ सकता है उनके (ईमान), इतने दूर स्थान[2] से?
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1. अर्थात अल्लाह तथा उस के रसूल पर। 2. ईमान लाने का स्थान तो संसार था। परन्तु संसार में उसे अस्वीकार कर दिया।
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1. अर्थात अल्लाह तथा उस के रसूल पर। 2. ईमान लाने का स्थान तो संसार था। परन्तु संसार में उसे अस्वीकार कर दिया।
तफ़सीर
और जब वे अपना परिणाम देख लेंगे, तो कहेंगे : हम क़ियामत के दिन पर ईमान लाए। भला अब उनके लिए ईमान ग्रहण करना कैसे संभव है, जबकि ईमान की स्वीकृति का स्थान उनसे बहुत दूर हो गया है?! क्योंकि वे दुनिया के घर से, जो केवल कार्य करने का स्थान है, बदले का नहीं, (उससे) निकलकर आखिरत के घर में प्रवेश कर चुके हैं, जो केवल बदला दिए जाने का घर है, कार्य करने का नहीं।
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