सूरह 30 · जुज़ 21
Ar-Rum · 30:48
اللَّهُ الَّذِي يُرْسِلُ الرِّيَاحَ فَتُثِيرُ سَحَابًا فَيَبْسُطُهُ فِي السَّمَاءِ كَيْفَ يَشَاءُ وَيَجْعَلُهُ كِسَفًا فَتَرَى الْوَدْقَ يَخْرُجُ مِنْ خِلَالِهِ ۖ فَإِذَا أَصَابَ بِهِ مَنْ يَشَاءُ مِنْ عِبَادِهِ إِذَا هُمْ يَسْتَبْشِرُونَ
अल्लाह ही है, जो वायुओं को भेजता है, फिर वह बादल उठाती हैं, फिर वह उसे फैलाता है आकाश में, जैसे चाहता है और उसे घंघोर बना देता है। तो तुम देखते हो बूंदों को निकलते उसके बीच से, फिर जब उसे पहुँचाता है जिसे चाहता है, अपने भक्तों में से, तो सहसा वे प्रफुल्ल हो जाते हें।
तफ़सीर
महिमावान अल्लाह ही है, जो हवाओं को चलाता और भेजता है। फिर वे हवाएँ बादलों को उठाती और उन्हें स्थानांतरित करती हैं। फिर अल्लाह बादलों को आसमान में, कम या अधिक जैसे चाहता है, फैला देता है और उन्हें टुकड़े-टुकड़े बना देता है। फिर तुम (ऐ देखने वाले!) उन बादलों के बीच से बारिश को निकलते हुए देखते हो। फिर जब अल्लाह अपने बंदों में से जिसपर चाहता है, वर्षा बरसाता है, तो वे अपने ऊपर अल्लाह की उस बारिश बरसाने की दया से खुश हो जाते हैं, जिसके बाद धरती उनके और उनके जानवरों के लिए आवश्यक चीज़ें उगाती है।
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