सूरह 30 · जुज़ 21

Ar-Rum · 30:39

وَمَا آتَيْتُمْ مِنْ رِبًا لِيَرْبُوَ فِي أَمْوَالِ النَّاسِ فَلَا يَرْبُو عِنْدَ اللَّهِ ۖ وَمَا آتَيْتُمْ مِنْ زَكَاةٍ تُرِيدُونَ وَجْهَ اللَّهِ فَأُولَٰئِكَ هُمُ الْمُضْعِفُونَ

और जो तुम व्याज देते हो, ताकि अधिक हो जाये लोगों के धनों[1] में मिलकर, तो वह अधिक नहीं होता अल्लाह के यहाँ तथा तुम जो ज़कात देते हो, चाहते हुए अल्लाह की प्रसन्नता, तो वही लोग सफल होने वाले हैं।
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1. इस आयत में सामाजिक अधिकारों की ओर ध्यान दिलाया गया है कि जब सब कुछ अल्लाह ही का दिया हुआ है तो तुम्हें अल्लाह की प्रसन्नता के लिये सब का अधिकार देना चाहिये। ह़दीस में है कि जो व्याज खाता-खिलाता है और उसे लिखता तथा उस पर गवाही देता है उस पर नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने धिक्कार किया है।

तफ़सीर

जो धन तुम किसी आदमी को इस उद्देश्य से देते हो कि वह तुम्हें उसमें कुछ वृद्धि के साथ वापस करे, तो उसका सवाब अल्लाह के यहाँ नहीं बढ़ेगा। और जो कुछ तुम अपने माल में से किसी ऐसे व्यक्ति को देते हो, जो उससे अपनी ज़रूरत पूरी करता है, जिससे तुम अल्लाह का चेहरा चाहते हो, तुम्हारा इरादा कोई पद (सामाजिक स्थिति) या लोगों से प्रतिफल प्राप्त करना नहीं है, तो ऐसे ही लोग हैं जिनके प्रतिफल को अल्लाह के यहाँ कई गुना कर दिया जाएगा।

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