सूरह 3 · जुज़ 3

Ali 'Imran · 3:79

مَا كَانَ لِبَشَرٍ أَنْ يُؤْتِيَهُ اللَّهُ الْكِتَابَ وَالْحُكْمَ وَالنُّبُوَّةَ ثُمَّ يَقُولَ لِلنَّاسِ كُونُوا عِبَادًا لِي مِنْ دُونِ اللَّهِ وَلَٰكِنْ كُونُوا رَبَّانِيِّينَ بِمَا كُنْتُمْ تُعَلِّمُونَ الْكِتَابَ وَبِمَا كُنْتُمْ تَدْرُسُونَ

किसी पुरुष जिसे अल्लाह ने पुस्तक, निर्णय शक्ति और नुबुव्वत दी हो, उसके लिए योग्य नहीं कि लोगों से कहे कि अल्लाह को छोड़कर मेरे दास बन जाओ[1], अपितु (वह तो यही कहेगा कि) तुम अल्लाह वाले बन जाओ। इस कारण कि तुम पुस्तक की शिक्षा देते हो तथा इस कारण कि उसका अध्ययन स्वयं भी करते रहते हो।
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1. भावार्थ यह है कि जब नबी के लिये योग्य नहीं कि लोगों से कहे कि मेरी इबादत करो, तो किसी अन्य के लिये कैसे योग्य हो सकता है?

तफ़सीर

किसी मनुष्य के लिए यह उचित नहीं कि अल्लाह उसे अपनी ओर से उतारी हुई एक पुस्तक दे, उसे ज्ञान और समझ प्रदान करे और उसे नबी के रूप में चुन ले; फिर वह लोगों से कहे : तुम अल्लाह को छोड़कर मेरे बंदे बन जाओ। परंतु वह उनसे यह कहता है : तुम सत्कर्म करने वाले, लोगों का प्रशिक्षण करने वाले, उनके मामलों का सुधार करने वाले विद्वान बनो। क्योंकि तुम लोगों को अल्लाह की उतारी हुई किताब की शिक्षा देते हो, तथा इस कारण कि तुम उसे पढ़कर याद करते और समझते हो।

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