सूरह 3 · जुज़ 4

Ali 'Imran · 3:117

مَثَلُ مَا يُنْفِقُونَ فِي هَٰذِهِ الْحَيَاةِ الدُّنْيَا كَمَثَلِ رِيحٍ فِيهَا صِرٌّ أَصَابَتْ حَرْثَ قَوْمٍ ظَلَمُوا أَنْفُسَهُمْ فَأَهْلَكَتْهُ ۚ وَمَا ظَلَمَهُمُ اللَّهُ وَلَٰكِنْ أَنْفُسَهُمْ يَظْلِمُونَ

जो दान, वे इस सांसारिक जीवन में करते हैं, वो उस वायु के समान है, जिसमें पाला हो, जो किसी क़ौम की खेती को लग जाये, जिन्होंने अपने ऊपर अत्याचार[1] किया हो और उसका नाश कर दे तथा अल्लाह ने उनपर अत्याचार नहीं किया, परन्तु वे स्वयं अपने ऊपर अत्याचार कर रहे थे।
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1. अवैज्ञा तथा अस्वीकार करते रहे थे। इस में यह संकेत है कि अल्लाह पर ईमान के बिना दानों का प्रतिफल परलोक में नहीं मिलेगा।

तफ़सीर

ये काफ़िर (नास्तिक) लोग पुण्य के रास्तों में जो कुछ खर्च करते हैं और वे उसके प्रतिफल की जो प्रतीक्षा करते हैं, उसका उदाहरण उस हवा की तरह है जिसमें अत्यधिक ठंड हो, जो किसी ऐसी क़ौम की खेती को लग जाए जिन्होंने पापों आदि के द्वारा अपने आप पर अत्याचार किया हो, और वह उसे बर्बाद कर दे, हालाँकि उन्हें उससे अच्छी पैदावार की आशा थी। तो जिस तरह इस हवा ने खेती को नष्ट कर दिया और उससे लाभ नहीं उठाया जा सका, उसी प्रकार कुफ्र उनके उन कार्यों के प्रतिफल को व्यर्थ (अमान्य) कर देगा जिसकी वे आशा रखते हैं। अल्लाह ने उनपर अत्याचार नहीं किया - अल्लाह ऐसा करने से सर्वोच्च है -, बल्कि उन्होंने अल्लाह का इनकार करके तथा उसके रसूलों को झुठलाकर स्वयं अपने आप पर अत्याचार किया।

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