सूरह 29 · जुज़ 21
Al-'Ankabut · 29:56
يَا عِبَادِيَ الَّذِينَ آمَنُوا إِنَّ أَرْضِي وَاسِعَةٌ فَإِيَّايَ فَاعْبُدُونِ
हे मेरे भक्तो जो ईमान लाये हो! वास्तव में, मेरी धरती विशाल है, अतः, तुम मेरी ही इबादत (वंदना)[1] करो।
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1. अर्थात किसी धरती में अल्लाह की इबादत न कर सको तो वहाँ से निकल जाओ जैसा कि आरंभिक युग में मक्का के काफ़िरों ने अल्लाह की इबादत से रोक दिया तो मुसलमान ह़ब्शा और फिर मदीना चले गये।
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1. अर्थात किसी धरती में अल्लाह की इबादत न कर सको तो वहाँ से निकल जाओ जैसा कि आरंभिक युग में मक्का के काफ़िरों ने अल्लाह की इबादत से रोक दिया तो मुसलमान ह़ब्शा और फिर मदीना चले गये।
तफ़सीर
ऐ मेरे बंदो जो मुझपर ईमान लाए हो, उस धरती से हिजरत (पलायन) कर जाओ, जहाँ तुम मेरी इबादत नहीं कर सकते। निःसंदेह मेरी धरती विशाल है। इसलिए अकेले मेरी ही इबादत करो और किसी को भी मेरा साझी न बनाओ।
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