सूरह 17 · जुज़ 15

Al-Isra · 17:29

وَلَا تَجْعَلْ يَدَكَ مَغْلُولَةً إِلَىٰ عُنُقِكَ وَلَا تَبْسُطْهَا كُلَّ الْبَسْطِ فَتَقْعُدَ مَلُومًا مَحْسُورًا

और अपना हाथ अपनी गर्दन से न बाँध[1] लो और न उसे पूरा खोल दो कि निन्दित, विवश होकर रह जाओ।
____________________
1. हाथ बाँधने और खोलने का अर्थ है, कृपण तथा अपव्यय करना। इस में व्यय और दान में संतुलन रखने की शिक्षा दी गयी है।

तफ़सीर

अपने हाथ को खर्च करने से मत रोको और न ही खर्च करने में अपव्ययता से काम लो। क्योंकि अगर तुमने अपने हाथ को खर्च करने से रोक लिया, तो तुम निंदित हो जाओगे, तुम्हारी कंजूसी पर लोग तुम्हारी निंदा करेंगे। तथा तुम अपने अपव्यय के कारण खर्च करने से रुक जाओगे, तुम्हारे पास खर्च करने के लिए कुछ न रहेगा।

पाठक में खोलें - पूरी सूरह पढ़ें

आपकी भाषा में तफ़सीर

अरबी तफ़सीरें

अनुवाद

सुनें