सूरह 13 · जुज़ 13
Ar-Ra'd · 13:36
وَالَّذِينَ آتَيْنَاهُمُ الْكِتَابَ يَفْرَحُونَ بِمَا أُنْزِلَ إِلَيْكَ ۖ وَمِنَ الْأَحْزَابِ مَنْ يُنْكِرُ بَعْضَهُ ۚ قُلْ إِنَّمَا أُمِرْتُ أَنْ أَعْبُدَ اللَّهَ وَلَا أُشْرِكَ بِهِ ۚ إِلَيْهِ أَدْعُو وَإِلَيْهِ مَآبِ
(हे नबी!) जिन्हें हमने पुस्तक दी है, वे उस (क़ुर्आन) से प्रसन्न हो रहे हैं[1], जो आपकी ओर उतारा गया है और सम्प्रदायों में कुछ ऐसे भी हैं, जो नहीं मानते[2]। आप कह दें कि मुझे आदेश दिया गया है कि अल्लाह की ईबादत (वंदना) करूँ और उसका साझी न बनाऊँ। मैं उसी की ओर बुलाता हूँ और उसी की ओर मुझे जाना है[3]।
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1. अर्थात वह यहूदी, ईसाई और मुर्तिपूजक जो इस्लाम लाये। 2. अर्थात जो अब तक मुसलान नहीं हुये। 3. अर्थात कोई ईमान लाये या न लाये, मैं तो कदापि किसी को उस का साझी नहीं बना सकता।
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1. अर्थात वह यहूदी, ईसाई और मुर्तिपूजक जो इस्लाम लाये। 2. अर्थात जो अब तक मुसलान नहीं हुये। 3. अर्थात कोई ईमान लाये या न लाये, मैं तो कदापि किसी को उस का साझी नहीं बना सकता।
तफ़सीर
जिन यहूदियों को हमने तौरात दी और जिन ईसाइयों को हमने इंजील दी, वे उस (क़ुरआन) से प्रसन्न होते हैं, जो (ऐ रसूल!) आपपर उतारा गया है; क्योंकि वह उनकी पुस्तकों की कुछ बातों से सहमति रखता है। तथा यहूदियों और ईसाइयों के संप्रदायों में से कुछ लोग आपकी ओर अवतिरत पुस्तक के कुछ भाग का इनकार करते हैं, जो उनकी इच्छाओं से मेल नहीं खाता, या जो उनके परिवर्तन और विकृति को उजागर करता है। (ऐ रसूल!) आप उनसे कह दें : अल्लाह ने मुझे आदेश दिया है कि मैं केवल उसी की इबादत करूँ और उसके साथ उसके अलावा को साझी न बनाऊँ। मैं केवल उसी की ओर बुलाता हूँ और उसके अलावा किसी और की ओर नहीं बुलाता। और केवल उसी की ओर मेरा लौटना है। तौरात और इंजील ने भी यही शिक्षा दी है।
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