An-Nahl

سورة النحل

सूरह 16 · मक्की · 128 आयतें

16:1जुज़ 14 · पृ. 267

أَتَىٰ أَمْرُ اللَّهِ فَلَا تَسْتَعْجِلُوهُ ۚ سُبْحَانَهُ وَتَعَالَىٰ عَمَّا يُشْرِكُونَ1

अल्लाह का आदेश आ गया है। अतः (हे काफ़िरो!) उसके शीघ्र आने की माँग न करो। वह (अल्लाह) पवित्र तथा उस शिर्क (मिश्रणवाद) से ऊँचा है, जो वे कर रहे हैं।
16:2जुज़ 14 · पृ. 267

يُنَزِّلُ الْمَلَائِكَةَ بِالرُّوحِ مِنْ أَمْرِهِ عَلَىٰ مَنْ يَشَاءُ مِنْ عِبَادِهِ أَنْ أَنْذِرُوا أَنَّهُ لَا إِلَٰهَ إِلَّا أَنَا فَاتَّقُونِ2

वह फ़रिश्तों को वह़्यी के साथ, अपने आदेश से, अपने जिस भक्त पर चाहता है, उतारता है कि (लोगों को) सावधान करो कि मेरे सिवा कोई पूज्य नहीं है, अतः मुझसे ही डरो।
16:3जुज़ 14 · पृ. 267

خَلَقَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ بِالْحَقِّ ۚ تَعَالَىٰ عَمَّا يُشْرِكُونَ3

उसने आकाशों तथा धरती की उत्पत्ति सत्य के साथ की है, वह उनके शिर्क से बहुत ऊँचा है।
16:4जुज़ 14 · पृ. 267

خَلَقَ الْإِنْسَانَ مِنْ نُطْفَةٍ فَإِذَا هُوَ خَصِيمٌ مُبِينٌ4

उसने मनुष्य की उत्पत्ति वीर्य से की है, फिर वह अकस्मात् खुला झगड़ालू बन गया।
16:5जुज़ 14 · पृ. 267

وَالْأَنْعَامَ خَلَقَهَا ۗ لَكُمْ فِيهَا دِفْءٌ وَمَنَافِعُ وَمِنْهَا تَأْكُلُونَ5

तथा चौपायों की उत्पत्ति की, जिनमें तुम्हारे लिए गर्मी[1] और बहुत-से लाभ हैं और उनमें से कुछको खाते हो।
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1. अर्थात उन की ऊन तथा खाल से गर्म वस्त्र बनाते हो।
16:6जुज़ 14 · पृ. 267

وَلَكُمْ فِيهَا جَمَالٌ حِينَ تُرِيحُونَ وَحِينَ تَسْرَحُونَ6

तथा उनमें तुम्हारे लिए एक शोभा है, जिस समय संध्या को चराकर लाते हो और जब प्रातः चराने ले जाते हो।
16:7जुज़ 14 · पृ. 268

وَتَحْمِلُ أَثْقَالَكُمْ إِلَىٰ بَلَدٍ لَمْ تَكُونُوا بَالِغِيهِ إِلَّا بِشِقِّ الْأَنْفُسِ ۚ إِنَّ رَبَّكُمْ لَرَءُوفٌ رَحِيمٌ7

और वे तुम्हारे बोझ, उन नगरों तक लादकर ले जाते हैं, जिनतक तुम बिना कड़े परिश्रम के नहीं पहुँच सकते। वास्तव में, तुम्हारा पालनहार अति करुणामय, दयावान् है।
16:8जुज़ 14 · पृ. 268

وَالْخَيْلَ وَالْبِغَالَ وَالْحَمِيرَ لِتَرْكَبُوهَا وَزِينَةً ۚ وَيَخْلُقُ مَا لَا تَعْلَمُونَ8

तथा घोड़े, खच्चर और गधे पैदा किये, ताकि उनपर सवारी करो और (वे) शोभा (बनें) और (अल्लाह) ऐसी चीज़ों की उत्पत्ति करेगा, जिन्हें (अभी) तुम नहीं जानते हो[1]।
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1. अर्थात सवारी के साधन इत्यादि। और आज हम उन में से बहुत सी चीज़ों को अपनी आँखों से देख रहे हैं, जिन की ओर अल्लाह ने आज से चौदह सौ वर्ष पहले इस आयत के अन्दर संकेत किया था। जैसे कार, रेल और विमान आदि।
16:9जुज़ 14 · पृ. 268

وَعَلَى اللَّهِ قَصْدُ السَّبِيلِ وَمِنْهَا جَائِرٌ ۚ وَلَوْ شَاءَ لَهَدَاكُمْ أَجْمَعِينَ9

और अल्लाह पर, सीधी राह बताना है और उनमें से कुछ[1] टेढ़े हैं तथा यदि अल्लाह चाहता, तो तुमसभी को सीधी राह दिखा देता।
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1. अर्थात जो इस्लाम के विरुध्द हैं।
16:10जुज़ 14 · पृ. 268

هُوَ الَّذِي أَنْزَلَ مِنَ السَّمَاءِ مَاءً ۖ لَكُمْ مِنْهُ شَرَابٌ وَمِنْهُ شَجَرٌ فِيهِ تُسِيمُونَ10

वही है, जिसने आकाश से जल बरसाया, जिसमें से कुछ तुम पीते हो तथा कुछसे वृक्ष उपजते हैं, जिसमें तुम (पशुओं को) चराते हो।
16:11जुज़ 14 · पृ. 268

يُنْبِتُ لَكُمْ بِهِ الزَّرْعَ وَالزَّيْتُونَ وَالنَّخِيلَ وَالْأَعْنَابَ وَمِنْ كُلِّ الثَّمَرَاتِ ۗ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَآيَةً لِقَوْمٍ يَتَفَكَّرُونَ11

और तुम्हारे लिए उससे खेती उपजाता है और ज़ैतून, खजूर, अंगूर और प्रत्येक प्रकार के फल। वास्तव में इस, में एक बड़ी निशानी है, उन लोगों के लिए, जो सोच-विचार करते हैं।
16:12जुज़ 14 · पृ. 268

وَسَخَّرَ لَكُمُ اللَّيْلَ وَالنَّهَارَ وَالشَّمْسَ وَالْقَمَرَ ۖ وَالنُّجُومُ مُسَخَّرَاتٌ بِأَمْرِهِ ۗ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَآيَاتٍ لِقَوْمٍ يَعْقِلُونَ12

और उसने तुम्हारे लिए रात्रि तथा दिवस को सेवा में लगा रखा है तथा सूर्य और चाँद को और (हाँ!) सितारे उसके आदेश के अधीन हैं। वास्तव में, इसमें कई निशानियाँ (लक्षण) हैं, उन लोगों के लिए, जो समझ-बूझ रखते हैं।
16:13जुज़ 14 · पृ. 268

وَمَا ذَرَأَ لَكُمْ فِي الْأَرْضِ مُخْتَلِفًا أَلْوَانُهُ ۗ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَآيَةً لِقَوْمٍ يَذَّكَّرُونَ13

तथा जो तुम्हारे लिए धरती में विभिन्न रंगों की चीजें उत्पन्न की हैं, वास्तव में, इसमें एक बड़ी निशानी लक्षण) है, उन लोगों के लिए, जो शिक्षा ग्रहण करते हैं।
16:14जुज़ 14 · पृ. 268

وَهُوَ الَّذِي سَخَّرَ الْبَحْرَ لِتَأْكُلُوا مِنْهُ لَحْمًا طَرِيًّا وَتَسْتَخْرِجُوا مِنْهُ حِلْيَةً تَلْبَسُونَهَا وَتَرَى الْفُلْكَ مَوَاخِرَ فِيهِ وَلِتَبْتَغُوا مِنْ فَضْلِهِ وَلَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ14

और वही है, जिसने सागर को वश में कर रखा है, ताकि तुम उससे ताज़ा[1] मांस खाओ और उससे अलंकार[2] निकालो, जिसे पहनते हो तथा तुम नौकाओं को देखते हो कि सागर में (जल को) फाड़ती हुई चलती हैं और इसलिए ताकि तुम उस अल्लाह के अनुग्रह[3] की खोज करो और ताकि कृतज्ञ बनो।
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1. अर्थात मछलियाँ। 2. अलंकार अर्थात मोती और मूँगा निकालो। 3. अर्थात सागरों में व्यापारिक यात्रा कर के अपनी जीविका की खोज करो।
16:15जुज़ 14 · पृ. 269

وَأَلْقَىٰ فِي الْأَرْضِ رَوَاسِيَ أَنْ تَمِيدَ بِكُمْ وَأَنْهَارًا وَسُبُلًا لَعَلَّكُمْ تَهْتَدُونَ15

और उसने धरती में पर्वत गाड़ दिये, ताकि तुम्हें लेकर डोलने न लगे तथा नदियाँ और राहें, ताकि तुम राह पाओ।
16:16जुज़ 14 · पृ. 269

وَعَلَامَاتٍ ۚ وَبِالنَّجْمِ هُمْ يَهْتَدُونَ16

तथा बहुत-से चिन्ह (बना दिये) और वे सितारों से (भी) राह[1] पाते हैं।
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1. अर्थात रात्रि में।
16:17जुज़ 14 · पृ. 269

أَفَمَنْ يَخْلُقُ كَمَنْ لَا يَخْلُقُ ۗ أَفَلَا تَذَكَّرُونَ17

तो क्या, जो उत्पत्ति करता है, उसके समान है, जो उत्पत्ति नहीं करता? क्या तुम शिक्षा ग्रहण नहीं करते[1]?
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1. और उस की उत्पत्ति को उस का साझी और पूज्य बनाते हो।
16:18जुज़ 14 · पृ. 269

وَإِنْ تَعُدُّوا نِعْمَةَ اللَّهِ لَا تُحْصُوهَا ۗ إِنَّ اللَّهَ لَغَفُورٌ رَحِيمٌ18

और यदि तुम अल्लाह के पुरस्कारों की गणना करना चाहो, तो कभी नहीं कर सकते। वास्तव में, अल्लाह बड़ा क्षमा तथा दया करने वाला है।
16:19जुज़ 14 · पृ. 269

وَاللَّهُ يَعْلَمُ مَا تُسِرُّونَ وَمَا تُعْلِنُونَ19

तथा अल्लाह जानता है, जो तुम छुपाते हो और जो तुम व्यक्त करते हो।
16:20जुज़ 14 · पृ. 269

وَالَّذِينَ يَدْعُونَ مِنْ دُونِ اللَّهِ لَا يَخْلُقُونَ شَيْئًا وَهُمْ يُخْلَقُونَ20

और जिन्हें वे अल्लाह के सिवा पुकारते हैं, वे किसी चीज़ की उत्पत्ति नहीं कर सकते। जबकि वे स्वयं उत्पन्न किये जाते हैं।
16:21जुज़ 14 · पृ. 269

أَمْوَاتٌ غَيْرُ أَحْيَاءٍ ۖ وَمَا يَشْعُرُونَ أَيَّانَ يُبْعَثُونَ21

वे निर्जीव प्राणहीन हैं और (ये भी) नहीं जानते कि कब पुनः जीवित किये जायेंगे।
16:22जुज़ 14 · पृ. 269

إِلَٰهُكُمْ إِلَٰهٌ وَاحِدٌ ۚ فَالَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِالْآخِرَةِ قُلُوبُهُمْ مُنْكِرَةٌ وَهُمْ مُسْتَكْبِرُونَ22

तुम्हारा पूज्य बस एक है, फिर जो लोग परलोक पर ईमान नहीं लाते, उनके दिल निवर्ती (विरोधी) हैं और वे अभिमानी हैं।
16:23जुज़ 14 · पृ. 269

لَا جَرَمَ أَنَّ اللَّهَ يَعْلَمُ مَا يُسِرُّونَ وَمَا يُعْلِنُونَ ۚ إِنَّهُ لَا يُحِبُّ الْمُسْتَكْبِرِينَ23

जो कुछ वे छुपाते तथा व्यक्त करते हैं, निश्चय अल्लाह उसे जानता है। वास्तव में, वह अभिमानियों से प्रेम नहीं करता।
16:24जुज़ 14 · पृ. 269

وَإِذَا قِيلَ لَهُمْ مَاذَا أَنْزَلَ رَبُّكُمْ ۙ قَالُوا أَسَاطِيرُ الْأَوَّلِينَ24

और जब उनसे पूछा जाये कि तुम्हारे पालनहार ने क्या उतारा है[1]? तो कहते हैं कि पूर्वजों की कल्पित कथाएँ हैं।
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1. अर्थात मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर। तो यह जानते हुये कि अल्लाह ने क़ुर्आन उतारा है, झूठ बोलते हैं और स्वयं को तथा दूसरों को धोखा देते हैं।
16:25जुज़ 14 · पृ. 269

لِيَحْمِلُوا أَوْزَارَهُمْ كَامِلَةً يَوْمَ الْقِيَامَةِ ۙ وَمِنْ أَوْزَارِ الَّذِينَ يُضِلُّونَهُمْ بِغَيْرِ عِلْمٍ ۗ أَلَا سَاءَ مَا يَزِرُونَ25

ताकि वे अपने (पापों का) पूरा बोझ प्रलय के दिन उठायें तथा कुछ उन लोगों का बोझ (भी), जिन्हें बिना ज्ञान के कुपथ कर रहे थे, सावधान! वे कितना बुरा बोझ उठायेंगे!
16:26जुज़ 14 · पृ. 269

قَدْ مَكَرَ الَّذِينَ مِنْ قَبْلِهِمْ فَأَتَى اللَّهُ بُنْيَانَهُمْ مِنَ الْقَوَاعِدِ فَخَرَّ عَلَيْهِمُ السَّقْفُ مِنْ فَوْقِهِمْ وَأَتَاهُمُ الْعَذَابُ مِنْ حَيْثُ لَا يَشْعُرُونَ26

इनसे पहले के लोग भी षड्यंत्र रचते रहे, तो अल्लाह ने उनके षड्यंत्र के भवन का उनमूलन कर दिया, फिर ऊपर से उनपर छत गिर पड़ी और उनपर ऐसी दिशा से यातना आ गई, जिसे वे सोच भी नहीं रहे थे।
16:27जुज़ 14 · पृ. 270

ثُمَّ يَوْمَ الْقِيَامَةِ يُخْزِيهِمْ وَيَقُولُ أَيْنَ شُرَكَائِيَ الَّذِينَ كُنْتُمْ تُشَاقُّونَ فِيهِمْ ۚ قَالَ الَّذِينَ أُوتُوا الْعِلْمَ إِنَّ الْخِزْيَ الْيَوْمَ وَالسُّوءَ عَلَى الْكَافِرِينَ27

फिर प्रलय के दिन उन्हें अपमानित करेगा और कहेगा कि मेरे वह साझी कहाँ हैं, जिनके लिए तुम झगड़ रहे थे? वे कहेंगेः जिन्हें ज्ञान दिया गया है कि वास्तव में, आज अपमान तथा बुराई (यातना) काफ़िरों के लिए है।
16:28जुज़ 14 · पृ. 270

الَّذِينَ تَتَوَفَّاهُمُ الْمَلَائِكَةُ ظَالِمِي أَنْفُسِهِمْ ۖ فَأَلْقَوُا السَّلَمَ مَا كُنَّا نَعْمَلُ مِنْ سُوءٍ ۚ بَلَىٰ إِنَّ اللَّهَ عَلِيمٌ بِمَا كُنْتُمْ تَعْمَلُونَ28

जिनके प्राण फ़रिश्ते निकालते हैं, इस दशा में कि वे अपने ऊपर अत्याचार करने वाले हैं, तो वे आज्ञाकारी बन जाते[1] हैं, (कहते हैं कि) हम कोई बुराई (शिर्क) नहीं कर रहे थे। क्यों नहीं? वास्तव में, अल्लाह तुम्हारे कर्मों से भली-भाँति अवगत है।
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1. अर्थात मरण का समय अल्लाह को मान लेते हैं।
16:29जुज़ 14 · पृ. 270

فَادْخُلُوا أَبْوَابَ جَهَنَّمَ خَالِدِينَ فِيهَا ۖ فَلَبِئْسَ مَثْوَى الْمُتَكَبِّرِينَ29

तो नरक के द्वारों में प्रवेश कर जाओ, उसमें सदावासी रहोगे, अतः क्या ही बुरा है अभिमानों का निवास स्थान!
16:30जुज़ 14 · पृ. 270

۞ وَقِيلَ لِلَّذِينَ اتَّقَوْا مَاذَا أَنْزَلَ رَبُّكُمْ ۚ قَالُوا خَيْرًا ۗ لِلَّذِينَ أَحْسَنُوا فِي هَٰذِهِ الدُّنْيَا حَسَنَةٌ ۚ وَلَدَارُ الْآخِرَةِ خَيْرٌ ۚ وَلَنِعْمَ دَارُ الْمُتَّقِينَ30

और उनसे पूछा गया, जो अपने पालनहार से डरे कि तुम्हारे पालनहार ने क्या उतारा है? तो उन्होंने कहाः अच्छी चीज़ उतारी है। उनके लिए जिन्होंने इस लोक में सदाचार किये, बड़ी भलाई है और वास्तव में, परलोक का घर (स्वर्ग) अति उत्तम है और आज्ञाकारियों का आवास कितना अच्छा है!
16:31जुज़ 14 · पृ. 270

جَنَّاتُ عَدْنٍ يَدْخُلُونَهَا تَجْرِي مِنْ تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ ۖ لَهُمْ فِيهَا مَا يَشَاءُونَ ۚ كَذَٰلِكَ يَجْزِي اللَّهُ الْمُتَّقِينَ31

सदा रहने के स्वर्ग जिसमें प्रवेश करेंगे, जिनमें नहरें बहती होंगी, उनके लिए उसमें जो चाहेंगे (मिलेगा)। इसी प्रकार, अल्लाह आज्ञाकारियों को प्रतिफल (बदला) देता है।
16:32जुज़ 14 · पृ. 270

الَّذِينَ تَتَوَفَّاهُمُ الْمَلَائِكَةُ طَيِّبِينَ ۙ يَقُولُونَ سَلَامٌ عَلَيْكُمُ ادْخُلُوا الْجَنَّةَ بِمَا كُنْتُمْ تَعْمَلُونَ32

जिनके प्राण फ़रिश्ते इस दशा में निकालते हैं कि वे स्वच्छ-पवित्र हैं, तो कहते हैं: "तुमपर शान्ति हो।" तुम अपने सुकर्मों के बदले स्वर्ग में प्रवेश कर जाओ।
16:33जुज़ 14 · पृ. 270

هَلْ يَنْظُرُونَ إِلَّا أَنْ تَأْتِيَهُمُ الْمَلَائِكَةُ أَوْ يَأْتِيَ أَمْرُ رَبِّكَ ۚ كَذَٰلِكَ فَعَلَ الَّذِينَ مِنْ قَبْلِهِمْ ۚ وَمَا ظَلَمَهُمُ اللَّهُ وَلَٰكِنْ كَانُوا أَنْفُسَهُمْ يَظْلِمُونَ33

क्या वे इसकी प्रतीक्षा कर रहे हैं कि उनके पास फ़रिश्ते[1] आ जायें अथवा आपके पालनहार का आदेश[2] आ पहुँचे? ऐसे ही, उनसे पूर्व के लोगों ने किया और अल्लाह ने उनपर अत्याचार नहीं किया, परन्तु वे स्वयं अपने ऊपर अत्याचार कर रहे थे।
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1. अर्थात प्राण निकालने के लिये। 2. अर्थात अल्लाह की यातना या प्रलय।
16:34जुज़ 14 · पृ. 270

فَأَصَابَهُمْ سَيِّئَاتُ مَا عَمِلُوا وَحَاقَ بِهِمْ مَا كَانُوا بِهِ يَسْتَهْزِئُونَ34

तो उनके कुकर्मों की बुराईयाँ[1] उनपर आ पड़ीं और उन्हें उसी (यातना) ने घेर लिया, जिसका वे परिहास कर रहे थे।
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1. अर्थात दुष्परिणाम।
16:35जुज़ 14 · पृ. 271

وَقَالَ الَّذِينَ أَشْرَكُوا لَوْ شَاءَ اللَّهُ مَا عَبَدْنَا مِنْ دُونِهِ مِنْ شَيْءٍ نَحْنُ وَلَا آبَاؤُنَا وَلَا حَرَّمْنَا مِنْ دُونِهِ مِنْ شَيْءٍ ۚ كَذَٰلِكَ فَعَلَ الَّذِينَ مِنْ قَبْلِهِمْ ۚ فَهَلْ عَلَى الرُّسُلِ إِلَّا الْبَلَاغُ الْمُبِينُ35

और कहा, जिन लोगों ने शिर्क (मिश्रणवाद) कियाः यदि अल्लाह चाहता, तो हम उसके सिवा किसी चीज़ की इबादत (वंदना) न करते, न हम और न हमारे बाप-दादा और न उसके आदेश के बिना किसी चीज़ को ह़राम (वर्जित) करते। ऐसे ही, इनसे पूर्व वाले लोगों ने किया। तो रसूलों पर केवल खुले रूप से उपदेश पहुँचा देना है।
16:36जुज़ 14 · पृ. 271

وَلَقَدْ بَعَثْنَا فِي كُلِّ أُمَّةٍ رَسُولًا أَنِ اعْبُدُوا اللَّهَ وَاجْتَنِبُوا الطَّاغُوتَ ۖ فَمِنْهُمْ مَنْ هَدَى اللَّهُ وَمِنْهُمْ مَنْ حَقَّتْ عَلَيْهِ الضَّلَالَةُ ۚ فَسِيرُوا فِي الْأَرْضِ فَانْظُرُوا كَيْفَ كَانَ عَاقِبَةُ الْمُكَذِّبِينَ36

और हमने प्रत्येक समुदाय में एक रसूल भेजा कि अल्लाह की इबादत (वंदना) करो और ताग़ूत (असुर- अल्लाह के सिवा पूज्यों) से बचो, तो उनमें से कुछ को, अल्लाह ने सुपथ दिखा दिया और कुछ पर कुपथ सिध्द हो गया। तो धरती में चलो-फिरो, फिर देखो कि झुठलाने वालों का अन्त कैसा रहा?
16:37जुज़ 14 · पृ. 271

إِنْ تَحْرِصْ عَلَىٰ هُدَاهُمْ فَإِنَّ اللَّهَ لَا يَهْدِي مَنْ يُضِلُّ ۖ وَمَا لَهُمْ مِنْ نَاصِرِينَ37

(हे नबी!) आप ऐसे लोगों को सुपथ दिखाने पर लोलुप हों, तो भी अल्लाह उसे सुपथ नहीं दिखायेगा, जिसे कुपथ कर दे और न उनका कोई सहायक होगा।
16:38जुज़ 14 · पृ. 271

وَأَقْسَمُوا بِاللَّهِ جَهْدَ أَيْمَانِهِمْ ۙ لَا يَبْعَثُ اللَّهُ مَنْ يَمُوتُ ۚ بَلَىٰ وَعْدًا عَلَيْهِ حَقًّا وَلَٰكِنَّ أَكْثَرَ النَّاسِ لَا يَعْلَمُونَ38

और उन (काफ़िरों) ने अल्लाह की भरपूर शपथ ली कि अल्लाह उसे पुनः जीवित नहीं करेगा, जो मर जाता है। क्यों नहीं? ये तो अल्लाह का अपने ऊपर सत्य वचन है, परन्तु अधिक्तर लोग नहीं जानते।
16:39जुज़ 14 · पृ. 271

لِيُبَيِّنَ لَهُمُ الَّذِي يَخْتَلِفُونَ فِيهِ وَلِيَعْلَمَ الَّذِينَ كَفَرُوا أَنَّهُمْ كَانُوا كَاذِبِينَ39

(ऐसा करना इसलिए आवश्यक है) ताकि अल्लाह उस तथ्य को उजागर कर दे, जिसमें[1] वे विभेद कर रहे थे और ताकि काफ़िर जान लें कि वही झूठे थे।
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1. अर्थात पुनरोज्जीन आदि के विषय में।
16:40जुज़ 14 · पृ. 271

إِنَّمَا قَوْلُنَا لِشَيْءٍ إِذَا أَرَدْنَاهُ أَنْ نَقُولَ لَهُ كُنْ فَيَكُونُ40

हमारा कथन, जब हम किसी चीज़ को अस्तित्व प्रदान करने का निश्चय करें, तो इसके सिवा कुछ नहीं होता कि उसे आदेश दें कि "हो जा" और वह हो जाती है।
16:41जुज़ 14 · पृ. 271

وَالَّذِينَ هَاجَرُوا فِي اللَّهِ مِنْ بَعْدِ مَا ظُلِمُوا لَنُبَوِّئَنَّهُمْ فِي الدُّنْيَا حَسَنَةً ۖ وَلَأَجْرُ الْآخِرَةِ أَكْبَرُ ۚ لَوْ كَانُوا يَعْلَمُونَ41

तथा जो लोग अल्लाह के लिए हिजरत (प्रस्थान) कर गये, अत्याचार सहने के पश्चात्, तो हम उन्हें संसार में अच्छा निवास्-स्थान देंगे और परलोक का प्रतिफल तो बहुत बड़ा है, यदि वे[1] जानते।
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1. इन से अभिप्रेत नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के वह अनुयायी हैं, जिन को मक्का के मुश्रिकों ने अत्याचार कर के निकाल दिया। और ह़ब्शा और फिर मदीना हिजरत कर गये।
16:42जुज़ 14 · पृ. 271

الَّذِينَ صَبَرُوا وَعَلَىٰ رَبِّهِمْ يَتَوَكَّلُونَ42

जिन लोगों ने धैर्य धारण किया तथा अपने पालनहार पर ही वे भरोसा करते हैं।
16:43जुज़ 14 · पृ. 272

وَمَا أَرْسَلْنَا مِنْ قَبْلِكَ إِلَّا رِجَالًا نُوحِي إِلَيْهِمْ ۚ فَاسْأَلُوا أَهْلَ الذِّكْرِ إِنْ كُنْتُمْ لَا تَعْلَمُونَ43

और (हे नबी!) हमने आपसे पहले जो भी रसूल भेजे, वे सभी मानव-पुरुष थे। जिनकी ओर हम वह़्यी (प्रकाशना) करते रहे। तो तुम ज्ञानियों से पूछ लो, यदि (स्वयं) नहीं[1] जानते।
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1. मक्का के मुश्रिकों ने कहा कि यदि अल्लाह को कोई रसूल भेजना होता तो किसी फ़रिश्ते को भेजता। उसी पर यह आयत उतरी। ज्ञानियों से अभिप्राय वह अह्ले किताब हैं जिन्हें आकाशीय पुस्तकों का ज्ञान हो।
16:44जुज़ 14 · पृ. 272

بِالْبَيِّنَاتِ وَالزُّبُرِ ۗ وَأَنْزَلْنَا إِلَيْكَ الذِّكْرَ لِتُبَيِّنَ لِلنَّاسِ مَا نُزِّلَ إِلَيْهِمْ وَلَعَلَّهُمْ يَتَفَكَّرُونَ44

प्रत्यक्ष (खुले) प्रमाणों तथा पुस्तकों के साथ (उन्हें भेजा) और आपकी ओर ये शिक्षा (क़ुर्आन) अवतरित की, ताकि आप उसे सर्वमानव के लिए उजागर कर दें, जो कुछ उनकी ओर उतारा गया है, ताकि वे सोच-विचार करें।
16:45जुज़ 14 · पृ. 272

أَفَأَمِنَ الَّذِينَ مَكَرُوا السَّيِّئَاتِ أَنْ يَخْسِفَ اللَّهُ بِهِمُ الْأَرْضَ أَوْ يَأْتِيَهُمُ الْعَذَابُ مِنْ حَيْثُ لَا يَشْعُرُونَ45

तो क्या वे निर्भय हो गये हैं, जिन्होंने बुरे षड्यंत्र रचे हैं कि अल्लाह उन्हें धरती में धंसा दे? अथवा उनपर यातना ऐसी दिशा से आ जाये, जिसे वे सोचते भी न हों?
16:46जुज़ 14 · पृ. 272

أَوْ يَأْخُذَهُمْ فِي تَقَلُّبِهِمْ فَمَا هُمْ بِمُعْجِزِينَ46

या उन्हें चलते-फिरते पकड़ ले, तो वे (अल्लाह को) विवश करने वाले नहीं हैं।
16:47जुज़ 14 · पृ. 272

أَوْ يَأْخُذَهُمْ عَلَىٰ تَخَوُّفٍ فَإِنَّ رَبَّكُمْ لَرَءُوفٌ رَحِيمٌ47

अथवा उन्हें भय की दशा में पकड़[1] ले? निश्चय तुम्हारा पालनहार अति करुणामय दयावान् है।
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1. अर्थात जब कि पहले से उन्हें आपदा का भय हो।
16:48जुज़ 14 · पृ. 272

أَوَلَمْ يَرَوْا إِلَىٰ مَا خَلَقَ اللَّهُ مِنْ شَيْءٍ يَتَفَيَّأُ ظِلَالُهُ عَنِ الْيَمِينِ وَالشَّمَائِلِ سُجَّدًا لِلَّهِ وَهُمْ دَاخِرُونَ48

क्या अल्लाह की उत्पन्न की हुई किसी चीज़ को उन्होंने नहीं देखा? जिसकी छाया दायें तथा बायें झुकती है, अल्लाह को सज्दा करते हुए? और वे सर्व विनयशील हैं।
16:49जुज़ 14 · पृ. 272

وَلِلَّهِ يَسْجُدُ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ مِنْ دَابَّةٍ وَالْمَلَائِكَةُ وَهُمْ لَا يَسْتَكْبِرُونَ49

तथा अल्लाह ही को सज्दा करते हैं, जो आकाशों में तथा धरती में चर (जीव) तथा फ़रिश्ते हैं और वे अहंकार नहीं करते।
16:50जुज़ 14 · पृ. 272

يَخَافُونَ رَبَّهُمْ مِنْ فَوْقِهِمْ وَيَفْعَلُونَ مَا يُؤْمَرُونَ ۩50

वे[1] अपने पालनहार से डरते हैं, जो उनके ऊपर है और वही करते हैं, जो आदेश दिये जाते हैं।
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1. अर्थात फ़रिश्ते।
16:51जुज़ 14 · पृ. 272

۞ وَقَالَ اللَّهُ لَا تَتَّخِذُوا إِلَٰهَيْنِ اثْنَيْنِ ۖ إِنَّمَا هُوَ إِلَٰهٌ وَاحِدٌ ۖ فَإِيَّايَ فَارْهَبُونِ51

और अल्लाह ने कहाः दो पूज्य न बनाओ, वही अकेला पूज्य है। अतः तुम मुझी से डरो।
16:52जुज़ 14 · पृ. 272

وَلَهُ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَلَهُ الدِّينُ وَاصِبًا ۚ أَفَغَيْرَ اللَّهِ تَتَّقُونَ52

और उसी का है, जो कुछ आकाशों तथा धरती में है और उसी की वंदना स्थायी है, तो क्या तुम अल्लाह के सिवा दूसरे से डरते हो?
16:53जुज़ 14 · पृ. 272

وَمَا بِكُمْ مِنْ نِعْمَةٍ فَمِنَ اللَّهِ ۖ ثُمَّ إِذَا مَسَّكُمُ الضُّرُّ فَإِلَيْهِ تَجْأَرُونَ53

तुम्हें, जोभी सुख-सुविधा प्राप्त है, वह अल्लाह ही की ओर से है। फिर जब तुम्हें दुःख पहुँचता है, तो उसी को पुकारते हो।
16:54जुज़ 14 · पृ. 272

ثُمَّ إِذَا كَشَفَ الضُّرَّ عَنْكُمْ إِذَا فَرِيقٌ مِنْكُمْ بِرَبِّهِمْ يُشْرِكُونَ54

फिर जब तुमसे दुःख दूर कर देता है, तो तुम्हारा एक समुदाय अपने पालनहार का साझी बनाने लगता है।
16:55जुज़ 14 · पृ. 273

لِيَكْفُرُوا بِمَا آتَيْنَاهُمْ ۚ فَتَمَتَّعُوا ۖ فَسَوْفَ تَعْلَمُونَ55

ताकि हमने उन्हें, जो कुछ प्रदान किया है, उसके प्रति कृतघ्न हों, तो आनन्द ले लो, तुम्हें शीघ्र ही ज्ञान हो जायेगा।
16:56जुज़ 14 · पृ. 273

وَيَجْعَلُونَ لِمَا لَا يَعْلَمُونَ نَصِيبًا مِمَّا رَزَقْنَاهُمْ ۗ تَاللَّهِ لَتُسْأَلُنَّ عَمَّا كُنْتُمْ تَفْتَرُونَ56

और वे जिन्हें जानते[1] तक नहीं, उनका एक भाग, उसमें से बनाते हैं, जो जीविका हमने उन्हें दी है। तो अल्लाह की शपथ! तुमसे अवश्य पूछा जायेगा, उसके विषय में, जो तुम झूठी बातें बना रहे थे?
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1. अर्थात अपने देवी-देवताओं की वास्तविक्ता को नहीं जानते।
16:57जुज़ 14 · पृ. 273

وَيَجْعَلُونَ لِلَّهِ الْبَنَاتِ سُبْحَانَهُ ۙ وَلَهُمْ مَا يَشْتَهُونَ57

और वे अल्लाह के लिए पुत्रियाँ बनाते[1] हैं, वह पवित्र है! और उनके लिए वह[2] है, जो वे स्वयं चाहते हों?
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1. अरब के मुश्रिकों के पूज्यों में देवताओं से अधिक देवियाँ थीं। जिन के संबन्ध में उन का विचार था कि यह अल्लाह की पुत्रियाँ हैं। इसी प्रकार फ़रिश्तों को भी वे अल्लाह की पुत्रियाँ कहते थे, जिस का यहाँ खण्डन किया गया है। 2. अर्थात पुत्र।
16:58जुज़ 14 · पृ. 273

وَإِذَا بُشِّرَ أَحَدُهُمْ بِالْأُنْثَىٰ ظَلَّ وَجْهُهُ مُسْوَدًّا وَهُوَ كَظِيمٌ58

और जब उनमें से किसी को पुत्री (के जन्म) की शुभसूचना दी जाये, तो उसका मुख काला हो जाता है और वह शोकपूर्ण हो जाता है।
16:59जुज़ 14 · पृ. 273

يَتَوَارَىٰ مِنَ الْقَوْمِ مِنْ سُوءِ مَا بُشِّرَ بِهِ ۚ أَيُمْسِكُهُ عَلَىٰ هُونٍ أَمْ يَدُسُّهُ فِي التُّرَابِ ۗ أَلَا سَاءَ مَا يَحْكُمُونَ59

और लोगों से छुपा फिरता है, उस बुरी सूचना के कारण, जो उसे दी गयी है। (सोचता है कि) क्या[1] उसे अपमान के साथ रोक ले अथवा भूमि में गाड़ दे? देखो! वे कितना बुरा निर्णय करते हैं।
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1. अर्थात जीवित रहने दे। इस्लाम से पूर्व अरब समाज के कुछ क़बीलों में पुत्रियों के जन्म को लज्जा की चीज़ समझा जाता था। जिस का चित्रण इस आयत में किया गया है।
16:60जुज़ 14 · पृ. 273

لِلَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِالْآخِرَةِ مَثَلُ السَّوْءِ ۖ وَلِلَّهِ الْمَثَلُ الْأَعْلَىٰ ۚ وَهُوَ الْعَزِيزُ الْحَكِيمُ60

उन्हीं के लिए जो आख़िरत (परलोक) पर ईमान नहीं रखते अपगुण है और अल्लाह के लिए सदगुण हैं तथा वह प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है।
16:61जुज़ 14 · पृ. 273

وَلَوْ يُؤَاخِذُ اللَّهُ النَّاسَ بِظُلْمِهِمْ مَا تَرَكَ عَلَيْهَا مِنْ دَابَّةٍ وَلَٰكِنْ يُؤَخِّرُهُمْ إِلَىٰ أَجَلٍ مُسَمًّى ۖ فَإِذَا جَاءَ أَجَلُهُمْ لَا يَسْتَأْخِرُونَ سَاعَةً ۖ وَلَا يَسْتَقْدِمُونَ61

और यदि अल्लाह, लोगों को उनके अत्याचार[1] पर (तत्क्षण) धरने लगे, तो धरती में किसी जीव को न छोड़े। परन्तु वह एक निर्धारित अवधि तक निलम्बित करता[2] है और जब उनकी अवधि आ जायेगी, तो एक क्षण न पीछे होंगे, न पहले।
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1. अर्थात शिर्क और पापाचारों पर। 2. अर्थात अवसर देता है।
16:62जुज़ 14 · पृ. 273

وَيَجْعَلُونَ لِلَّهِ مَا يَكْرَهُونَ وَتَصِفُ أَلْسِنَتُهُمُ الْكَذِبَ أَنَّ لَهُمُ الْحُسْنَىٰ ۖ لَا جَرَمَ أَنَّ لَهُمُ النَّارَ وَأَنَّهُمْ مُفْرَطُونَ62

वह अल्लाह के लिए उसे[1] बनाते हैं, जिसे स्वयं अप्रिय समझते हैं तथा उनकी ज़ुबानें झूठ बोलती हैं कि उन्हीं के लिए भलाई है। निश्चय उन्हीं के लिए नरक है और वही सबसे पहले (नरक में) झोंके जायेंगे।
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1. अर्थात पुत्रियाँ।
16:63जुज़ 14 · पृ. 273

تَاللَّهِ لَقَدْ أَرْسَلْنَا إِلَىٰ أُمَمٍ مِنْ قَبْلِكَ فَزَيَّنَ لَهُمُ الشَّيْطَانُ أَعْمَالَهُمْ فَهُوَ وَلِيُّهُمُ الْيَوْمَ وَلَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ63

अल्लाह की शपथ! (हे नबी!) आपसे पहले हमने बहुत-से समुदायों की ओर रसूल भेजे। तो उनके लिए शैतान ने उनके कुकर्मों को सुसज्जित बना दिया। अतः वही आज उनका सहायक है और उन्हीं के लिए दुःखदायी यातना है।
16:64जुज़ 14 · पृ. 273

وَمَا أَنْزَلْنَا عَلَيْكَ الْكِتَابَ إِلَّا لِتُبَيِّنَ لَهُمُ الَّذِي اخْتَلَفُوا فِيهِ ۙ وَهُدًى وَرَحْمَةً لِقَوْمٍ يُؤْمِنُونَ64

और हमने आपपर ये पुस्तक (क़ुर्आन) इसी लिए उतारी है, ताकि आप उनके लिए उसे उजागर कर दें, जिसमें वे विभेद कर रहे हैं तथा मार्गदर्शन और दया है, उन लोगों के लिए, जो ईमान (विश्वास) रखते हैं।
16:65जुज़ 14 · पृ. 274

وَاللَّهُ أَنْزَلَ مِنَ السَّمَاءِ مَاءً فَأَحْيَا بِهِ الْأَرْضَ بَعْدَ مَوْتِهَا ۚ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَآيَةً لِقَوْمٍ يَسْمَعُونَ65

और अल्लाह ने ही आकाश से जल बरसाया, फिर उसने निर्जीव धरती को जीवित कर दिया। निश्चय इसमें उन लोगों के लिए एक निशानी है, जो सुनते हैं।
16:66जुज़ 14 · पृ. 274

وَإِنَّ لَكُمْ فِي الْأَنْعَامِ لَعِبْرَةً ۖ نُسْقِيكُمْ مِمَّا فِي بُطُونِهِ مِنْ بَيْنِ فَرْثٍ وَدَمٍ لَبَنًا خَالِصًا سَائِغًا لِلشَّارِبِينَ66

तथा वास्तव में, तुम्हारे लिए पशुओं में एक शिक्षा है। हम तुम्हें उससे, जो उसके भीतर है, गोबर तथा रक्त के बीच से शुध्द दूध पिलाते हैं, जो पीने वालों के लिए रुचिकर होता है।
16:67जुज़ 14 · पृ. 274

وَمِنْ ثَمَرَاتِ النَّخِيلِ وَالْأَعْنَابِ تَتَّخِذُونَ مِنْهُ سَكَرًا وَرِزْقًا حَسَنًا ۗ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَآيَةً لِقَوْمٍ يَعْقِلُونَ67

तथा खजूरों और अंगूरों के फलों से, जिससे तुम मदिरा बना लेते हो तथा उत्तम जीविका भी, वास्तव में, इसमें एक निशानी (लक्षण) है, उन लोगों के लिए, जो समझ-बूझ रखते हैं।
16:68जुज़ 14 · पृ. 274

وَأَوْحَىٰ رَبُّكَ إِلَى النَّحْلِ أَنِ اتَّخِذِي مِنَ الْجِبَالِ بُيُوتًا وَمِنَ الشَّجَرِ وَمِمَّا يَعْرِشُونَ68

और हमने मधुमक्खी को प्रेरणा दी कि पर्वतों में घर (छत्ते) बना तथा वृक्षों में और लोगों की बनायी छतों में।
16:69जुज़ 14 · पृ. 274

ثُمَّ كُلِي مِنْ كُلِّ الثَّمَرَاتِ فَاسْلُكِي سُبُلَ رَبِّكِ ذُلُلًا ۚ يَخْرُجُ مِنْ بُطُونِهَا شَرَابٌ مُخْتَلِفٌ أَلْوَانُهُ فِيهِ شِفَاءٌ لِلنَّاسِ ۗ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَآيَةً لِقَوْمٍ يَتَفَكَّرُونَ69

फिर प्रत्येक फलों का रस चूस और अपने पालनहार की सरल राहों पर चलती रह। उसके भीतर से एक पेय निकलता है, जो विभिन्न रंगों का होता है, जिसमें लोगों के लिए आरोग्य है। वास्तव में, इसमें एक निशानी (लक्षण) है, उन लोगों के लिए, जो सोच-विचार करते हैं।
16:70जुज़ 14 · पृ. 274

وَاللَّهُ خَلَقَكُمْ ثُمَّ يَتَوَفَّاكُمْ ۚ وَمِنْكُمْ مَنْ يُرَدُّ إِلَىٰ أَرْذَلِ الْعُمُرِ لِكَيْ لَا يَعْلَمَ بَعْدَ عِلْمٍ شَيْئًا ۚ إِنَّ اللَّهَ عَلِيمٌ قَدِيرٌ70

और अल्लाह ही ने तुम्हारी उत्पत्ति की है, फिर तुम्हें मौत देता है और तुममें से कुछको अबोध आयु तक पहुँचा दिया जाता है, ताकि जानने के पश्चात् कुछ न जाने। वास्तव में, अल्लाह सर्वज्ञ, सर्व सामर्थ्यवान्[1] है।
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1. अर्थात वह पुनः जीवित भी कर सकता है।
16:71जुज़ 14 · पृ. 274

وَاللَّهُ فَضَّلَ بَعْضَكُمْ عَلَىٰ بَعْضٍ فِي الرِّزْقِ ۚ فَمَا الَّذِينَ فُضِّلُوا بِرَادِّي رِزْقِهِمْ عَلَىٰ مَا مَلَكَتْ أَيْمَانُهُمْ فَهُمْ فِيهِ سَوَاءٌ ۚ أَفَبِنِعْمَةِ اللَّهِ يَجْحَدُونَ71

और अल्लाह ने तुममें से कुछ को, कुछ पर जीविका में प्रधानता दी है, तो जिन्हें प्रधानता दी गयी है, वे अपनी जीविका अपने दासों की ओर फेरने वाले नहीं कि वे उसमें बराबर हो जायें, तो क्या वे अल्लाह के उपकारों को नहीं मानते हैं[1]?
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1. आयत का भावार्थ यह है कि जब वह स्वयं अपने दासों को अपने बराबर करने के लिये तैयार नहीं हैं तो फिर अल्लाह की उत्पत्ति और उस के दासों को कैसे पूजा-अर्चना में उस के बराबर करते हैं? क्या यह अल्लाह के उपकारों का इन्कार नहीं है?
16:72जुज़ 14 · पृ. 274

وَاللَّهُ جَعَلَ لَكُمْ مِنْ أَنْفُسِكُمْ أَزْوَاجًا وَجَعَلَ لَكُمْ مِنْ أَزْوَاجِكُمْ بَنِينَ وَحَفَدَةً وَرَزَقَكُمْ مِنَ الطَّيِّبَاتِ ۚ أَفَبِالْبَاطِلِ يُؤْمِنُونَ وَبِنِعْمَتِ اللَّهِ هُمْ يَكْفُرُونَ72

और अल्लाह ने तुम्हारे लिए तुम्हीं में से पत्नियाँ बनायीं और तुम्हारे लिए तुम्हारी पत्नियों से पुत्र तथा पौत्र बनाये और तुम्हें स्वच्छ चीज़ों से जीविका प्रदान की। तो क्या वे असत्य पर विश्वास रखते हैं और अल्लाह के पुरस्कारों के प्रति अविश्वास रखते हैं?
16:73जुज़ 14 · पृ. 275

وَيَعْبُدُونَ مِنْ دُونِ اللَّهِ مَا لَا يَمْلِكُ لَهُمْ رِزْقًا مِنَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ شَيْئًا وَلَا يَسْتَطِيعُونَ73

और अल्लाह के सिवा उनकी वंदना करते हैं, जो उनके लिए आकाशों तथा धरती से कुछ भी जीविका देने का अधिकार नहीं रखते और न इसका सामर्थ्य रखते हैं।
16:74जुज़ 14 · पृ. 275

فَلَا تَضْرِبُوا لِلَّهِ الْأَمْثَالَ ۚ إِنَّ اللَّهَ يَعْلَمُ وَأَنْتُمْ لَا تَعْلَمُونَ74

और अल्लाह के लिए उदाहरण न दो। वास्तव में, अल्लाह जानता है और तुम नहीं जानते[1]।
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1. क्यों कि उस के समान कोई नहीं।
16:75जुज़ 14 · पृ. 275

۞ ضَرَبَ اللَّهُ مَثَلًا عَبْدًا مَمْلُوكًا لَا يَقْدِرُ عَلَىٰ شَيْءٍ وَمَنْ رَزَقْنَاهُ مِنَّا رِزْقًا حَسَنًا فَهُوَ يُنْفِقُ مِنْهُ سِرًّا وَجَهْرًا ۖ هَلْ يَسْتَوُونَ ۚ الْحَمْدُ لِلَّهِ ۚ بَلْ أَكْثَرُهُمْ لَا يَعْلَمُونَ75

अल्लाह ने एक उदाहरण[1] दिया है; एक प्राधीन दास है, जो किसी चीज़ का अधिकार नहीं रखता और दूसरा (स्वाधीन) व्यक्ति है, जिसे हमने अपनी ओर से उत्तम जीविका प्रदान की है और वह उसमें छुपे और खुले व्यय करता है। क्या वे दोनों समान हो जायेंगे? सब प्रशंसा अल्लाह[2] के लिए है। बल्कि अधिक्तर लोग (ये बात) नहीं जानते।
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1. आयत का भावार्थ यह है कि जैसे पराधीन दास और धनी स्वतंत्र व्यक्ति को तुम बराबर नहीं समझते, ऐसे मुझे और इन मूर्तियों को कैसे बराबर समझ रहे हो जो एक मक्खी भी पैदा नहीं कर सकतीं। और यदि मक्खी उन का चढ़ावा ले भागे तो वह छीन भी नहीं सकतीं? इस से बड़ा अत्याचार क्या हो सकता है? 2. अर्थात अल्लाह के सिवा तुम्हारे पूज्यों में से कोई प्रशंसा के लायक़ नहीं है।
16:76जुज़ 14 · पृ. 275

وَضَرَبَ اللَّهُ مَثَلًا رَجُلَيْنِ أَحَدُهُمَا أَبْكَمُ لَا يَقْدِرُ عَلَىٰ شَيْءٍ وَهُوَ كَلٌّ عَلَىٰ مَوْلَاهُ أَيْنَمَا يُوَجِّهْهُ لَا يَأْتِ بِخَيْرٍ ۖ هَلْ يَسْتَوِي هُوَ وَمَنْ يَأْمُرُ بِالْعَدْلِ ۙ وَهُوَ عَلَىٰ صِرَاطٍ مُسْتَقِيمٍ76

तथा अल्लाह ने दो व्यक्तियों का उदाहरण दिया है; दोनों में से एक गूँगा है, वह किसी चीज़ का अधिकार नहीं रखता, वह अपने स्वामी पर बोझ है, वह उसे जहाँ भेजता है, कोई भलाई नहीं लाता। तो क्या वह और जो न्याय का आदेश देता हो और स्वयं सीधी[1] राह पर हो, बराबर हो जायेंगे?
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1. यह दूसरा उदाहरण है जो मूर्तियों का दिया है। जो गूँगी-बहरी होती हैं।
16:77जुज़ 14 · पृ. 275

وَلِلَّهِ غَيْبُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ ۚ وَمَا أَمْرُ السَّاعَةِ إِلَّا كَلَمْحِ الْبَصَرِ أَوْ هُوَ أَقْرَبُ ۚ إِنَّ اللَّهَ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ77

और अल्लाह ही को आकाशों तथा धरती के परोक्ष[1] का ज्ञान है और प्रलय (क़्यामत) का विषय तो बस पलक झपकने जैसा[2] होगा अथवा उससे भी अधिक शीघ्र। वास्तव में, अल्लाह जो चाहे, कर सकता है।
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1. अर्थात गुप्त तथ्यों का। 2. अर्थात पल भर में आयेगी
16:78जुज़ 14 · पृ. 275

وَاللَّهُ أَخْرَجَكُمْ مِنْ بُطُونِ أُمَّهَاتِكُمْ لَا تَعْلَمُونَ شَيْئًا وَجَعَلَ لَكُمُ السَّمْعَ وَالْأَبْصَارَ وَالْأَفْئِدَةَ ۙ لَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ78

और अल्लाह ही ने तुम्हें तुम्हारी माताओं के गर्भों से निकाला, इस दशा में कि तुम कुछ नहीं जानते थे और तुम्हारे कान और आँख तथा दिल बनाये, ताकि तुम (उसका) उपकार मानो।
16:79जुज़ 14 · पृ. 275

أَلَمْ يَرَوْا إِلَى الطَّيْرِ مُسَخَّرَاتٍ فِي جَوِّ السَّمَاءِ مَا يُمْسِكُهُنَّ إِلَّا اللَّهُ ۗ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَآيَاتٍ لِقَوْمٍ يُؤْمِنُونَ79

क्या वे पक्षियों को नहीं देखते कि वे अंतरिक्ष में कैसे वशीभूत हैं? उन्हें अल्लाह ही थामता[1] है। वास्तव में, इसमें बहुत-सी निशानियाँ हैं, उन लोगों के लिए, जो ईमान लाते हैं।
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1. अर्थात पक्षियों को यह क्षमता अल्लाह ही ने दी है।
16:80जुज़ 14 · पृ. 276

وَاللَّهُ جَعَلَ لَكُمْ مِنْ بُيُوتِكُمْ سَكَنًا وَجَعَلَ لَكُمْ مِنْ جُلُودِ الْأَنْعَامِ بُيُوتًا تَسْتَخِفُّونَهَا يَوْمَ ظَعْنِكُمْ وَيَوْمَ إِقَامَتِكُمْ ۙ وَمِنْ أَصْوَافِهَا وَأَوْبَارِهَا وَأَشْعَارِهَا أَثَاثًا وَمَتَاعًا إِلَىٰ حِينٍ80

और अल्लाह ही ने तुम्हारे घरों को निवास स्थान बनाया और पशुओं की खालों से तुम्हारे लिए ऐसे घर[1] बनाये, जिन्हें तुम अपनी यात्रा तथा अपने विराम के दिन हल्का (अल्पभार) पाते हो और उनकी ऊन और रोम तथा बालों से उपक्रण और लाभ के सामान, जीवन की निश्चित अवधि तक के लिए (बनाये)।
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1. अर्थात चमड़ों के खेमे।
16:81जुज़ 14 · पृ. 276

وَاللَّهُ جَعَلَ لَكُمْ مِمَّا خَلَقَ ظِلَالًا وَجَعَلَ لَكُمْ مِنَ الْجِبَالِ أَكْنَانًا وَجَعَلَ لَكُمْ سَرَابِيلَ تَقِيكُمُ الْحَرَّ وَسَرَابِيلَ تَقِيكُمْ بَأْسَكُمْ ۚ كَذَٰلِكَ يُتِمُّ نِعْمَتَهُ عَلَيْكُمْ لَعَلَّكُمْ تُسْلِمُونَ81

और अल्लाह ही ने तुम्हार लिए उस चीज़ में से, जो उत्पन्न की है, छाया बनायी है और तुम्हारे लिए पर्वतों में गुफाएँ बनायी हैं और तुम्हारे लिए ऐसे वस्त्र बनाये हैं, जो तुम्हे धूप से बचायें[1]। इसी प्रकार, वह तुमपर अपना उपकार पूरा करता है, ताकि तुम आज्ञाकारी बनो।
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1. अर्थात कवच आदि।
16:82जुज़ 14 · पृ. 276

فَإِنْ تَوَلَّوْا فَإِنَّمَا عَلَيْكَ الْبَلَاغُ الْمُبِينُ82

फिर यदि वे विमुख हों, तो आपपर बस प्रत्यक्ष (खुला) उपदेश पहुँचा देना है।
16:83जुज़ 14 · पृ. 276

يَعْرِفُونَ نِعْمَتَ اللَّهِ ثُمَّ يُنْكِرُونَهَا وَأَكْثَرُهُمُ الْكَافِرُونَ83

वे अल्लाह के उपकार पहचानते हैं, फिर उसका इन्कार करते हैं और उनमें अधिक्तर कृतघ्न हैं।
16:84जुज़ 14 · पृ. 276

وَيَوْمَ نَبْعَثُ مِنْ كُلِّ أُمَّةٍ شَهِيدًا ثُمَّ لَا يُؤْذَنُ لِلَّذِينَ كَفَرُوا وَلَا هُمْ يُسْتَعْتَبُونَ84

और जिस[1] दिन, हम प्रत्येक समुदाय से एक साक्षी (गवाह) खड़ा[2] करेंगे, फिर काफ़िरों को बात करने की अनुमति नहीं दी जायेगी और न उनसे क्षमा याचना की माँग की जायेगी।
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1. अर्थात प्रलय के दिन। 2. (देखियेः सूरह निसा, आयतः41)
16:85जुज़ 14 · पृ. 276

وَإِذَا رَأَى الَّذِينَ ظَلَمُوا الْعَذَابَ فَلَا يُخَفَّفُ عَنْهُمْ وَلَا هُمْ يُنْظَرُونَ85

और जब अत्याचारी यातना देखेंगे, उनकी यातना कुछ कम नहीं की जायेगी और न उन्हें अवकाश दिया[1] जायेगा।
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1. अर्थात तौबा करने का।
16:86जुज़ 14 · पृ. 276

وَإِذَا رَأَى الَّذِينَ أَشْرَكُوا شُرَكَاءَهُمْ قَالُوا رَبَّنَا هَٰؤُلَاءِ شُرَكَاؤُنَا الَّذِينَ كُنَّا نَدْعُو مِنْ دُونِكَ ۖ فَأَلْقَوْا إِلَيْهِمُ الْقَوْلَ إِنَّكُمْ لَكَاذِبُونَ86

और जब मुश्रिक अपने (बनाये हुए) साझियों को देखेंगे, तो कहेंगेः हे हमारे पालनहार! यही हमारे साझी हैं, जिन्हें हम, तुझे छोड़कर पुकार रहे थे। तो वे (पूज्य) बोलेंगे कि निश्चय तुम सब मिथ्यावादी (झूठे) हो।
16:87जुज़ 14 · पृ. 276

وَأَلْقَوْا إِلَى اللَّهِ يَوْمَئِذٍ السَّلَمَ ۖ وَضَلَّ عَنْهُمْ مَا كَانُوا يَفْتَرُونَ87

उस दिन, वे अल्लाह के आगे झुक जायेंगे और उनसे खो जायेँगी, जो मिथ्या बातें वे बनाते थे।
16:88जुज़ 14 · पृ. 277

الَّذِينَ كَفَرُوا وَصَدُّوا عَنْ سَبِيلِ اللَّهِ زِدْنَاهُمْ عَذَابًا فَوْقَ الْعَذَابِ بِمَا كَانُوا يُفْسِدُونَ88

जो लोग काफिर हो गये और (दूसरों को भी) अल्लाह की डगर (इस्लाम) से रोक दिये, उन्हें हम यातना पर यातना देंगे, उस उपद्रव के बदले, जो वे कर रहे थे।
16:89जुज़ 14 · पृ. 277

وَيَوْمَ نَبْعَثُ فِي كُلِّ أُمَّةٍ شَهِيدًا عَلَيْهِمْ مِنْ أَنْفُسِهِمْ ۖ وَجِئْنَا بِكَ شَهِيدًا عَلَىٰ هَٰؤُلَاءِ ۚ وَنَزَّلْنَا عَلَيْكَ الْكِتَابَ تِبْيَانًا لِكُلِّ شَيْءٍ وَهُدًى وَرَحْمَةً وَبُشْرَىٰ لِلْمُسْلِمِينَ89

और जिस दिन, हम प्रत्येक समुदाय से एक साक्षी उनके विरुध्द उन्हीं में से खड़ा कर देंगे और (हे नबी!) हम आपको उनपर साक्षी (गवाह) बनायेंगे[1] और हमने आपपर ये पुस्तक (क़ुर्आन) अवतरित की है, जो प्रत्येक विषय का खुला विवरण है, मार्गदर्शन दया तथा शुभ सूचना है आज्ञाकारियों के लिए।
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1. (देखियेः सूरह बक़रा, आयतः143)
16:90 · Allah commands justiceजुज़ 14 · पृ. 277

۞ إِنَّ اللَّهَ يَأْمُرُ بِالْعَدْلِ وَالْإِحْسَانِ وَإِيتَاءِ ذِي الْقُرْبَىٰ وَيَنْهَىٰ عَنِ الْفَحْشَاءِ وَالْمُنْكَرِ وَالْبَغْيِ ۚ يَعِظُكُمْ لَعَلَّكُمْ تَذَكَّرُونَ90

वस्तुतः, अल्लाह तुम्हें न्याय, उपकार और समीपवर्तियों को देने का आदेश दे रहा है और निर्लज्जा, बुराई और विद्रोह से रोक रहा है और तुम्हें सिखा रहा है, ताकि तुम शिक्षा ग्रहण करो।
16:91जुज़ 14 · पृ. 277

وَأَوْفُوا بِعَهْدِ اللَّهِ إِذَا عَاهَدْتُمْ وَلَا تَنْقُضُوا الْأَيْمَانَ بَعْدَ تَوْكِيدِهَا وَقَدْ جَعَلْتُمُ اللَّهَ عَلَيْكُمْ كَفِيلًا ۚ إِنَّ اللَّهَ يَعْلَمُ مَا تَفْعَلُونَ91

और जब अल्लाह से कोई वचन करो, तो उसे पूरा करो और अपनी शपथों को सुदृढ़ करने के पश्चात् भंग न करो, जब तुमने अल्लाह को अपने ऊपर गवाह बनाया है। निश्चय अल्लाह जो कुछ तुम करते हो, उसे जानता है।
16:92जुज़ 14 · पृ. 277

وَلَا تَكُونُوا كَالَّتِي نَقَضَتْ غَزْلَهَا مِنْ بَعْدِ قُوَّةٍ أَنْكَاثًا تَتَّخِذُونَ أَيْمَانَكُمْ دَخَلًا بَيْنَكُمْ أَنْ تَكُونَ أُمَّةٌ هِيَ أَرْبَىٰ مِنْ أُمَّةٍ ۚ إِنَّمَا يَبْلُوكُمُ اللَّهُ بِهِ ۚ وَلَيُبَيِّنَنَّ لَكُمْ يَوْمَ الْقِيَامَةِ مَا كُنْتُمْ فِيهِ تَخْتَلِفُونَ92

और तुम्हारी दशा उस स्त्री जैसी न हो जाये, जिसने अपना सूत कातने के पश्चात् उधेड़ दिया। तुम अपनी शपथों को आपस में विश्वासघात का साधन बनाते हो, ताकि एक समुदाय दूसरे समुदाय से अधिक लाभ प्राप्त करे। अल्लाह इस[1] (वचन) के द्वारा तुम्हारी परीक्षा ले रहा है और प्रलय के दिन तुम्हारे लिए अवश्य उसे उजागर कर देगा, जिसमें तुम विभेद कर रहे थे।
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1. अर्थात किसी समुदाय से समझौता कर के विश्वासघात न किया जाये कि दूसरे समुदाय से अधिक लाभ मिलने पर समझौता तोड़ दिया जाये।
16:93जुज़ 14 · पृ. 277

وَلَوْ شَاءَ اللَّهُ لَجَعَلَكُمْ أُمَّةً وَاحِدَةً وَلَٰكِنْ يُضِلُّ مَنْ يَشَاءُ وَيَهْدِي مَنْ يَشَاءُ ۚ وَلَتُسْأَلُنَّ عَمَّا كُنْتُمْ تَعْمَلُونَ93

और यदि अल्लाह चाहता, तो तुम्हें एक समुदाय बना देता। परन्तु वह जिसे चाहता है, कुपथ कर देता है और जिसे चाहता है, सुपथ दर्शा देता है और तुमसे उसके बारे में अवश्य पूछा जायेगा, जो तुम कर रहे थे।
16:94जुज़ 14 · पृ. 278

وَلَا تَتَّخِذُوا أَيْمَانَكُمْ دَخَلًا بَيْنَكُمْ فَتَزِلَّ قَدَمٌ بَعْدَ ثُبُوتِهَا وَتَذُوقُوا السُّوءَ بِمَا صَدَدْتُمْ عَنْ سَبِيلِ اللَّهِ ۖ وَلَكُمْ عَذَابٌ عَظِيمٌ94

और अपनी शपथों को आपस में विश्वासघात का साधन न बनाओ, ऐसा न हो कि कोई पग अपने स्थिर (दृढ़) होने के पश्चात् (ईमान से) फिसल[1] जाये और तुम उसके बदले बुरा परिणाम चखो कि तुमने अल्लाह की राह से रोका है और तुम्हारे लिए बड़ी यातना हो।
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1. अर्थात ऐसा न हो कि कोई व्यक्ति इस्लाम की सत्यता को स्वीकार करने के पश्चात् केवल तुम्हारे दुराचार को देख कर इस्लाम से फिर जाये। और तुम्हारे समुदाय में सम्मिलित होने से रुक जाये। अन्यथा तुम्हारा व्यवहार भी दूसरों से कुछ भिन्न नहीं है।
16:95जुज़ 14 · पृ. 278

وَلَا تَشْتَرُوا بِعَهْدِ اللَّهِ ثَمَنًا قَلِيلًا ۚ إِنَّمَا عِنْدَ اللَّهِ هُوَ خَيْرٌ لَكُمْ إِنْ كُنْتُمْ تَعْلَمُونَ95

और अल्लाह से किये हुए वचन को तनिक मूल्य के बदले न बेचो[1]। वास्तव में, जो अल्लाह के पास है, वही तुम्हारे लिए उत्तम है, यदि तुम जानो।
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1. अर्थात संसारिक लाभ के लिये वचन भंग न करो। (देखियेः सूरह आराफ़, आयतः172)
16:96जुज़ 14 · पृ. 278

مَا عِنْدَكُمْ يَنْفَدُ ۖ وَمَا عِنْدَ اللَّهِ بَاقٍ ۗ وَلَنَجْزِيَنَّ الَّذِينَ صَبَرُوا أَجْرَهُمْ بِأَحْسَنِ مَا كَانُوا يَعْمَلُونَ96

जो तुम्हारे पास है, वह व्यय (ख़र्च) हो जायेगा और जो अल्लाह के पास है, वह शेष रह जाने वाला है और हम, जो धैर्य धारण करते हैं, उन्हें अवश्य उनका पारिश्रमिक (बदला) उनके उत्तम कर्मों के अनुसार प्रदान करेंगे।
16:97जुज़ 14 · पृ. 278

مَنْ عَمِلَ صَالِحًا مِنْ ذَكَرٍ أَوْ أُنْثَىٰ وَهُوَ مُؤْمِنٌ فَلَنُحْيِيَنَّهُ حَيَاةً طَيِّبَةً ۖ وَلَنَجْزِيَنَّهُمْ أَجْرَهُمْ بِأَحْسَنِ مَا كَانُوا يَعْمَلُونَ97

जो भी सदाचार करेगा, वह नर हो अथवा नारी और ईमान वाला हो, तो हम उसे स्वच्छ जीवन व्यतीत करायेंगे और उन्हें उनका पारिश्रमिक उनके उत्तम कर्मों के अनुसार अवश्य प्रदान करेंगे।
16:98जुज़ 14 · पृ. 278

فَإِذَا قَرَأْتَ الْقُرْآنَ فَاسْتَعِذْ بِاللَّهِ مِنَ الشَّيْطَانِ الرَّجِيمِ98

तो (हे नबी!) जब आप क़ुर्आन का अध्ययन करें, तो धिक्कारे हुए शैतान से अललाह की शरण[1] माँग लिया करें।
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1. अर्थात "अऊज़ुबिल्लाहि मिनश्शैतानिर्रजीम" पढ़ लिया करें।
16:99जुज़ 14 · पृ. 278

إِنَّهُ لَيْسَ لَهُ سُلْطَانٌ عَلَى الَّذِينَ آمَنُوا وَعَلَىٰ رَبِّهِمْ يَتَوَكَّلُونَ99

वस्तुतः, उसका वश उनपर नहीं है, जो ईमान लाये हैं और अपने पालनहार ही पर भरोसा करते हैं।
16:100जुज़ 14 · पृ. 278

إِنَّمَا سُلْطَانُهُ عَلَى الَّذِينَ يَتَوَلَّوْنَهُ وَالَّذِينَ هُمْ بِهِ مُشْرِكُونَ100

उसका वश तो केवल उनपर चलता है, जो उसे अपना संरक्षक बनाते हैं और जो मिश्रणवादी (मुश्रिक) हैं।
16:101जुज़ 14 · पृ. 278

وَإِذَا بَدَّلْنَا آيَةً مَكَانَ آيَةٍ ۙ وَاللَّهُ أَعْلَمُ بِمَا يُنَزِّلُ قَالُوا إِنَّمَا أَنْتَ مُفْتَرٍ ۚ بَلْ أَكْثَرُهُمْ لَا يَعْلَمُونَ101

और जब हम किसी आयत (विधान) के स्थान पर कोई आयत बदल देते हैं और अल्लाह ही अधिक जानता है उसे, जिसे वह उतारता है, तो कहते हैं कि आप तो केवल घड़ लेते हैं, बल्कि उनमें अधिक्तर जानते ही नहीं।
16:102जुज़ 14 · पृ. 278

قُلْ نَزَّلَهُ رُوحُ الْقُدُسِ مِنْ رَبِّكَ بِالْحَقِّ لِيُثَبِّتَ الَّذِينَ آمَنُوا وَهُدًى وَبُشْرَىٰ لِلْمُسْلِمِينَ102

आप कह दें कि इसे (रूह़ुल कुदुस)[1] ने आपके पालनहार की ओर से सत्य के साथ क्रमशः उतारा है, ताकि उन्हें सुदृढ़ कर दे, जो ईमान लाये हैं तथा मार्गदर्शन और शुभ सूचना है, आज्ञाकारियों के लिए।
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2. इस का अर्थ पवित्रात्मा है। जो जिब्रील अलैहिस्सलाम की उपाधि है। यही वह फ़रिश्ता है जो वह़्यी लाता था।
16:103जुज़ 14 · पृ. 279

وَلَقَدْ نَعْلَمُ أَنَّهُمْ يَقُولُونَ إِنَّمَا يُعَلِّمُهُ بَشَرٌ ۗ لِسَانُ الَّذِي يُلْحِدُونَ إِلَيْهِ أَعْجَمِيٌّ وَهَٰذَا لِسَانٌ عَرَبِيٌّ مُبِينٌ103

तथा हम जानते हैं कि वे (काफ़िर) कहते हैं कि उसे (नबी को) कोई मनुष्य सिखा रहा[1] है। जबकी उसकी भाषा जिसकी ओर संकेत करते हैं, विदेशी है और ये[2] स्पष्ट अरबी भाषा है।
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1. इस आयत में मक्का के मिश्रणवादियों के इस आरोप का खण्डन किया गया है कि क़ुर्आन आप को एक विदेशी सिखा रहा है। 2. अर्थात मक्के वाले जिसे कहते हैं कि वह मुह़म्मद को क़ुर्आन सिखाता है उस की भाषा तो अर्बी है ही नहीं, तो वह आप को क़ुर्आन कैसे सिखा सकता है जो बहुत उत्तम तथा श्रेष्ठ अर्बी भाषा में है। क्या वे इतना भी नहीं समझते?
16:104जुज़ 14 · पृ. 279

إِنَّ الَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِآيَاتِ اللَّهِ لَا يَهْدِيهِمُ اللَّهُ وَلَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ104

वास्तव में, जो अल्लाह की आयतों पर ईमान नहीं लाते, उन्हें अल्लाह सुपथ नहीं दर्शाता और उन्हीं के लिए दुःखदायी यातना है।
16:105जुज़ 14 · पृ. 279

إِنَّمَا يَفْتَرِي الْكَذِبَ الَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِآيَاتِ اللَّهِ ۖ وَأُولَٰئِكَ هُمُ الْكَاذِبُونَ105

झूठ केवल वही घड़ते हैं, जो अल्लाह की आयतों पर ईमान नहीं लाते और वही मिथ्यावादी (झूठे) हैं।
16:106जुज़ 14 · पृ. 279

مَنْ كَفَرَ بِاللَّهِ مِنْ بَعْدِ إِيمَانِهِ إِلَّا مَنْ أُكْرِهَ وَقَلْبُهُ مُطْمَئِنٌّ بِالْإِيمَانِ وَلَٰكِنْ مَنْ شَرَحَ بِالْكُفْرِ صَدْرًا فَعَلَيْهِمْ غَضَبٌ مِنَ اللَّهِ وَلَهُمْ عَذَابٌ عَظِيمٌ106

जिसने अल्लाह के साथ कुफ़्र किया, अपने ईमान लाने के पश्चात्, परन्तु जो बाध्य कर दिया गया हो, इस दशा में कि उसका दिल ईमान से संतुष्ट हो, (उसके लिए क्षमा है)। परन्तु जिसने कुफ़्र के साथ सीना खोल दिया[1] हो, तो उन्हीं पर अल्लाह का प्रकोप है और उन्हीं के लिए महा यातना है।
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1. अर्थात स्वेच्छा कुफ़्र किया हो।
16:107जुज़ 14 · पृ. 279

ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمُ اسْتَحَبُّوا الْحَيَاةَ الدُّنْيَا عَلَى الْآخِرَةِ وَأَنَّ اللَّهَ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الْكَافِرِينَ107

ये इसलिए कि उन्होंने सांसारिक जीवन को प्रलोक पर प्राथमिकता दी है और वास्तव में अल्लाह, काफ़िरों को सुपथ नहीं दिखाता।
16:108जुज़ 14 · पृ. 279

أُولَٰئِكَ الَّذِينَ طَبَعَ اللَّهُ عَلَىٰ قُلُوبِهِمْ وَسَمْعِهِمْ وَأَبْصَارِهِمْ ۖ وَأُولَٰئِكَ هُمُ الْغَافِلُونَ108

वही लोग हैं, जिनके दिलों, कानों और आँखों पर अल्लाह ने मुहर लगा दी है तथा यही लोग अचेत हैं।
16:109जुज़ 14 · पृ. 279

لَا جَرَمَ أَنَّهُمْ فِي الْآخِرَةِ هُمُ الْخَاسِرُونَ109

निश्चय वही लोग, प्रलोक में क्षतिग्रस्त होने वाले हैं।
16:110जुज़ 14 · पृ. 279

ثُمَّ إِنَّ رَبَّكَ لِلَّذِينَ هَاجَرُوا مِنْ بَعْدِ مَا فُتِنُوا ثُمَّ جَاهَدُوا وَصَبَرُوا إِنَّ رَبَّكَ مِنْ بَعْدِهَا لَغَفُورٌ رَحِيمٌ110

फिर वास्तव में, आपका पालनहार उन लोगों[1] के लिए जिन्होंने हिजरत (प्रस्थान) की और उसके पश्चात् परीक्षा में डाले गये, फिर जिहाद किया और सहनशील रहे, वास्तव में, आपका पालनहार इस (परीक्षा) के पश्चात् बड़ा क्षमाशील, दयावान् है।
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1. इन से अभिप्रेत नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के वह अनुयायी हैं, जो मक्कासे मदीना हिजरत कर गये।
16:111जुज़ 14 · पृ. 280

۞ يَوْمَ تَأْتِي كُلُّ نَفْسٍ تُجَادِلُ عَنْ نَفْسِهَا وَتُوَفَّىٰ كُلُّ نَفْسٍ مَا عَمِلَتْ وَهُمْ لَا يُظْلَمُونَ111

जिस दिन प्रत्येक प्राणी को अपने बचाव की चिन्ता होगी और प्रत्येक प्राणी को उसके कर्मों का पूरा बदला दिया जायेगा और उनपर अत्याचार नहीं किया जायेगा।
16:112जुज़ 14 · पृ. 280

وَضَرَبَ اللَّهُ مَثَلًا قَرْيَةً كَانَتْ آمِنَةً مُطْمَئِنَّةً يَأْتِيهَا رِزْقُهَا رَغَدًا مِنْ كُلِّ مَكَانٍ فَكَفَرَتْ بِأَنْعُمِ اللَّهِ فَأَذَاقَهَا اللَّهُ لِبَاسَ الْجُوعِ وَالْخَوْفِ بِمَا كَانُوا يَصْنَعُونَ112

अल्लाह ने एक बस्ती का उदाहरण दिया है, जो शान्त संतुष्ट थी, उसकी जीविका प्रत्येक स्थान से प्राचूर्य के साथ पहुँच रही थी, तो उसने अल्लाह के उपकारों के साथ कुफ़्र किया। तब अल्ल्लाह ने उसे भूख और भय का वस्त्र चखा[1] दिया, उसके बदले जो वह[2] कर रहे थे।
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1. अर्थात उन पर भूख और भय की आपदायें छा गईं। 2. अर्थात उस बस्ती के निवासी। और इस बस्ती से अभिप्रेत मक्का है, जिन पर उन के कुफ़्र के कारण अकाल पड़ा।
16:113जुज़ 14 · पृ. 280

وَلَقَدْ جَاءَهُمْ رَسُولٌ مِنْهُمْ فَكَذَّبُوهُ فَأَخَذَهُمُ الْعَذَابُ وَهُمْ ظَالِمُونَ113

और उनके पास एक[1] रसूल उन्हीं में से आया, तो उन्होंने उसे झुठला दिया। अतः उन्हें यातना ने पकड़ लिया और वे अत्याचारी थे।
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1. अर्थात मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम मक्का के क़ुरैशी वंश से ही थे, फिर भी उन्हों ने आप की बात को नहीं माना।
16:114जुज़ 14 · पृ. 280

فَكُلُوا مِمَّا رَزَقَكُمُ اللَّهُ حَلَالًا طَيِّبًا وَاشْكُرُوا نِعْمَتَ اللَّهِ إِنْ كُنْتُمْ إِيَّاهُ تَعْبُدُونَ114

अतः उसमें से खाओ, जो अल्लाह ने तुम्हें ह़लाल (वैध) स्वच्छ जीविका प्रदान की है और अल्लाह का उपकार मानो, यदि तुम उसी की इबादत (वंदना) करते हो।
16:115जुज़ 14 · पृ. 280

إِنَّمَا حَرَّمَ عَلَيْكُمُ الْمَيْتَةَ وَالدَّمَ وَلَحْمَ الْخِنْزِيرِ وَمَا أُهِلَّ لِغَيْرِ اللَّهِ بِهِ ۖ فَمَنِ اضْطُرَّ غَيْرَ بَاغٍ وَلَا عَادٍ فَإِنَّ اللَّهَ غَفُورٌ رَحِيمٌ115

जो कुछ उसने तुमपर ह़राम (अवैध) किया है, वह मुर्दार, रक्त और सुअर का मांस है और जिसपर अल्लाह के सिवा दूसरे का नाम लिया गया[1] हो, फिर जो भूख से आतुर हो जाये, इस दशा में कि वह नियम न तोड़ रहा[2] हो और न आवश्यक्ता से अधिक खाये, तो वास्तव में, अल्लाह अति क्षमाशील, दयावान् है।
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1. अर्थात अल्लाह के सिवा अन्य के नाम से बलि दिया गया पशु। ह़दीस में है कि जो अल्लाह के सिवा दूसरे के नाम से बलि दे उस पर अल्लाह की धिक्कार है। (सह़ीह़ बुख़ारीः1978) 2. (देखियेः सूरह बक़रा, आयतः173, सूरह माइदा, आयतः3, तथा सूरह अन्आम, आयतः145)
16:116जुज़ 14 · पृ. 280

وَلَا تَقُولُوا لِمَا تَصِفُ أَلْسِنَتُكُمُ الْكَذِبَ هَٰذَا حَلَالٌ وَهَٰذَا حَرَامٌ لِتَفْتَرُوا عَلَى اللَّهِ الْكَذِبَ ۚ إِنَّ الَّذِينَ يَفْتَرُونَ عَلَى اللَّهِ الْكَذِبَ لَا يُفْلِحُونَ116

और मत कहो -उस झूठ के कारण, जो तुम्हारी ज़ुबानों पर आ जाये- कि ये ह़लाल (वैध) है और ये ह़राम (अवैध) है, ताकि अल्लाह पर मिथ्यारोप[1] करो। वास्तव में, जो लोग अल्लाह पर मिथ्यारोप करते हैं, वे (कभी) सफल नहीं होते।
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1. क्यों कि ह़लाल और ह़राम करने का अधिकार केवल अल्लाह को है।
16:117जुज़ 14 · पृ. 280

مَتَاعٌ قَلِيلٌ وَلَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ117

(इस मिथ्यारोपन का) लाभ तो थोड़ा है और उन्हीं के लिए (परलोक में) दुःखदायी यातना है।
16:118जुज़ 14 · पृ. 280

وَعَلَى الَّذِينَ هَادُوا حَرَّمْنَا مَا قَصَصْنَا عَلَيْكَ مِنْ قَبْلُ ۖ وَمَا ظَلَمْنَاهُمْ وَلَٰكِنْ كَانُوا أَنْفُسَهُمْ يَظْلِمُونَ118

और उनपर, जो यहूदी हो गये, हमने उसे ह़राम (अवैध) कर दिया, जिसका वर्णन हमने इस[1] से पहले आपसे कर दिया है और हमने उनपर अत्याचार नहीं किया, परन्तु वे स्वयं अपने ऊपर अत्याचार कर रहे थे।
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1. इस से संकेत सूरह अन्आम, आयतः26 की ओर है।
16:119जुज़ 14 · पृ. 281

ثُمَّ إِنَّ رَبَّكَ لِلَّذِينَ عَمِلُوا السُّوءَ بِجَهَالَةٍ ثُمَّ تَابُوا مِنْ بَعْدِ ذَٰلِكَ وَأَصْلَحُوا إِنَّ رَبَّكَ مِنْ بَعْدِهَا لَغَفُورٌ رَحِيمٌ119

फिर वास्तव में, आपका पालनहार उन्हें, जो अज्ञानता के कारण बुराई कर बैठे, फिर उसके पश्चात् क्षमा याचना कर ली और अपना सुधार कर लिया, वास्तव में, आपका पालनहार इसके पश्चात् अति क्षमी, दयावान् है।
16:120जुज़ 14 · पृ. 281

إِنَّ إِبْرَاهِيمَ كَانَ أُمَّةً قَانِتًا لِلَّهِ حَنِيفًا وَلَمْ يَكُ مِنَ الْمُشْرِكِينَ120

वास्तव में, इब्राहीम एक समुदाय[1] था, अल्लाह का आज्ञाकारी एकेश्वरवादी था और मिश्रणवादियों (मुश्रिकों) में से नहीं था।
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1. अर्थात वह अकेला सम्पूर्ण समुदाय था। क्यों कि उस के वंश से दो बड़ी उम्मतें बनीं: एक बनी इस्राईल, और दूसरी बनी इस्माईल जो बाद में अरब कहलाये। इस का एक दूसरा अर्थ मुखिया भी होता है।
16:121जुज़ 14 · पृ. 281

شَاكِرًا لِأَنْعُمِهِ ۚ اجْتَبَاهُ وَهَدَاهُ إِلَىٰ صِرَاطٍ مُسْتَقِيمٍ121

उसके उपकारों को मानता था, उसने उसे चुन लिया और उसे सीधी राह दिखा दी।
16:122जुज़ 14 · पृ. 281

وَآتَيْنَاهُ فِي الدُّنْيَا حَسَنَةً ۖ وَإِنَّهُ فِي الْآخِرَةِ لَمِنَ الصَّالِحِينَ122

और हमने उसे संसार में भलाई दी और वास्तव में वह परलोक में सदाचारियों में से होगा।
16:123जुज़ 14 · पृ. 281

ثُمَّ أَوْحَيْنَا إِلَيْكَ أَنِ اتَّبِعْ مِلَّةَ إِبْرَاهِيمَ حَنِيفًا ۖ وَمَا كَانَ مِنَ الْمُشْرِكِينَ123

फिर हमने (हे नबी!) आपकी और वह़्यी की कि एकेश्वरवादी इब्राहीम के धर्म का अनुसरण करो और वह मिश्रणवादियों में से नहीं था।
16:124जुज़ 14 · पृ. 281

إِنَّمَا جُعِلَ السَّبْتُ عَلَى الَّذِينَ اخْتَلَفُوا فِيهِ ۚ وَإِنَّ رَبَّكَ لَيَحْكُمُ بَيْنَهُمْ يَوْمَ الْقِيَامَةِ فِيمَا كَانُوا فِيهِ يَخْتَلِفُونَ124

सब्त[1] (शनिवार का दिन) तो उन्हीं पर, निर्धारित किया गया, जिन्होंने उसमें विभेद किया। और वस्तुतः, आपका पालनहार उनके बीच उसमें निर्णय कर देगा, जिसमें वे विभेद कर रहे थे।
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1. अर्थात सब्त का सम्मान जैसे इस्लाम में नहीं है, इसी प्रकार इब्राहीम अलैहिस्स्लाम के धर्म में भी नहीं है। यह तो केवल उन के लिये निर्धारित किया गया जिन्हों ने विभेद कर के जुमुआ के दिन की जगह सब्त का दिन निर्धारित कर लिया। तो अल्लाह ने उन के लिये उसी का सम्मान अनिवार्य कर दिया कि इस में शिकार न करो। (देखियेः सूरहा आराफ, आयतः163)
16:125जुज़ 14 · पृ. 281

ادْعُ إِلَىٰ سَبِيلِ رَبِّكَ بِالْحِكْمَةِ وَالْمَوْعِظَةِ الْحَسَنَةِ ۖ وَجَادِلْهُمْ بِالَّتِي هِيَ أَحْسَنُ ۚ إِنَّ رَبَّكَ هُوَ أَعْلَمُ بِمَنْ ضَلَّ عَنْ سَبِيلِهِ ۖ وَهُوَ أَعْلَمُ بِالْمُهْتَدِينَ125

(हे नबी!) आप उन्हें अपने पालनहार की राह (इस्लाम) की ओर तत्वदर्शिता तथा सदुपदेश के साथ बुलाएँ और उनसे ऐसे अंदाज़ में शास्त्रार्थ करें, जो उत्तम हो। वास्तव में, अल्लाह उसे अधिक जानता है, जो उसकी राह से विचलित हो गया और वही सुपथों को भी अधिक जानता है।
16:126जुज़ 14 · पृ. 281

وَإِنْ عَاقَبْتُمْ فَعَاقِبُوا بِمِثْلِ مَا عُوقِبْتُمْ بِهِ ۖ وَلَئِنْ صَبَرْتُمْ لَهُوَ خَيْرٌ لِلصَّابِرِينَ126

और यदि तुम लोग बदला लो, तो उतना ही लो, जितना तुम्हें सताया गया हो और यदि सहन कर जाओ, तो सहनशीलों के लिए यही उत्त्म है।
16:127जुज़ 14 · पृ. 281

وَاصْبِرْ وَمَا صَبْرُكَ إِلَّا بِاللَّهِ ۚ وَلَا تَحْزَنْ عَلَيْهِمْ وَلَا تَكُ فِي ضَيْقٍ مِمَّا يَمْكُرُونَ127

और (हे नबी!) आप सहन करें और आपका सहन करना अल्लाह ही की सहायता से है और उनके (दुर्व्यवहार) पर शोक न करें और न उनके षड्यंत्र से तनिक भी संकुचित हों।
16:128जुज़ 14 · पृ. 281

إِنَّ اللَّهَ مَعَ الَّذِينَ اتَّقَوْا وَالَّذِينَ هُمْ مُحْسِنُونَ128

वास्तव में, अल्लाह उन लोगों के साथ है, जो सदाचारी हैं और जो उपकार करने वाले हैं।

सूरह के आरंभ से चलाएँ