Al-Hijr

سورة الحجر

सूरह 15 · मक्की · 99 आयतें

15:1जुज़ 14 · पृ. 262

الر ۚ تِلْكَ آيَاتُ الْكِتَابِ وَقُرْآنٍ مُبِينٍ1

अलिफ़, लाम, रा। वो इस पुस्कत तथा खुले क़ुर्आन की आयतें हैं।
15:2जुज़ 14 · पृ. 262

رُبَمَا يَوَدُّ الَّذِينَ كَفَرُوا لَوْ كَانُوا مُسْلِمِينَ2

(एक समय आयेगा) जब काफ़िर ये कामना करेंगे कि क्या ही अच्छा होता, यदि वे मुसलामन[1] होते?
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1. ऐसा उस समय होगा जब फ़रिश्ते उन की आत्मा निकालने आयेंगे, और उन को उन का नरक का स्थान दिखा देंगे। और क़्यामत के दिन तो ऐसी दुर्दशा होगी कि धूल हो जाने की कामना करेंगे। (देखियेः सूरह नबा, आयतः40)
15:3जुज़ 14 · पृ. 262

ذَرْهُمْ يَأْكُلُوا وَيَتَمَتَّعُوا وَيُلْهِهِمُ الْأَمَلُ ۖ فَسَوْفَ يَعْلَمُونَ3

(हे नबी!)आप उन्हें छोड़ दें, वे खाते तथा आनन्द लेते रहें और उन्हें आशा निश्चेत किये रहे, फिर शीघ्र ही वे जान लेंगे[1]।
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1. अपने दुष्परिणाम का।
15:4जुज़ 14 · पृ. 262

وَمَا أَهْلَكْنَا مِنْ قَرْيَةٍ إِلَّا وَلَهَا كِتَابٌ مَعْلُومٌ4

और हमने जिस बस्ती को भी ध्वस्त किया, उसके लिए एक निश्चित अवधि अंत थी।
15:5जुज़ 14 · पृ. 262

مَا تَسْبِقُ مِنْ أُمَّةٍ أَجَلَهَا وَمَا يَسْتَأْخِرُونَ5

कोई जाति न अपनी निश्चित अवधि से आगे जा सकती है और न पीछे रह सकती है।
15:6जुज़ 14 · पृ. 262

وَقَالُوا يَا أَيُّهَا الَّذِي نُزِّلَ عَلَيْهِ الذِّكْرُ إِنَّكَ لَمَجْنُونٌ6

तथा उन (काफ़िरों) ने कहाः हे वह व्यक्ति जिसपर ये शिक्षा (क़ुर्आन) उतारी गयी है! वास्तव में, तू पागल है।
15:7जुज़ 14 · पृ. 262

لَوْ مَا تَأْتِينَا بِالْمَلَائِكَةِ إِنْ كُنْتَ مِنَ الصَّادِقِينَ7

क्यों हमारे पास फ़रिश्तों को नहीं लाता, यदि तू सचों में से है?
15:8जुज़ 14 · पृ. 262

مَا نُنَزِّلُ الْمَلَائِكَةَ إِلَّا بِالْحَقِّ وَمَا كَانُوا إِذًا مُنْظَرِينَ8

जबकि हम फ़रिश्तों को सत्य निर्णय के साथ ही[1] उतारते हैं और उन्हें उस समय कोई अवसर नहीं दिया जाता।
15:9जुज़ 14 · पृ. 262

إِنَّا نَحْنُ نَزَّلْنَا الذِّكْرَ وَإِنَّا لَهُ لَحَافِظُونَ9

वास्तव में, हमने ही ये शिक्षा (क़ुर्आन) उतारी है और हम ही इसके रक्षक[1] हैं।
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1. यह ऐतिहासिक सत्य है। इस विश्व के धर्म ग्रंथों में क़ुर्आन ही एक ऐसा धर्म ग्रंथ है जिस में उस के अवतरित होने के समय से अब तक एक अक्षर तो क्या एक मात्रा का भी परिवर्तन नहीं हुआ। और न हो सकता है। यह विशेषता इस विश्व के किसी भी धर्म ग्रंथ को प्राप्त नहीं है। तौरात हो अथवा इंजील या इस विश्व के अन्य धर्म शास्त्र हों, सब में इतने परिवर्तन किये गये हैं कि सत्य मूल धर्म की पहचान असंभव हो गय है। इसी प्रकार इस (क़ुर्आन) की व्याख्या जिसे ह़दीस कहा जाता है, वह भी सुरक्षित है। और उस का पालन किये बिना किसी का जीवन इस्लामी नहीं हो सकता। क्यों कि क़ुर्आन का आदेश है कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) तुम्हें जो दें उस को ले लो। और जिस से रोक दें उस से रुक जाओ। (देखियेः सूरह ह़श्र, आयतः 7) क़ुर्आन कहता है कि हे नबी! अल्लाह ने आप पर क़ुर्आन इस लिये उतारा है कि आप लोगों के लिये उस की व्याख्या कर दें। क़ुर्आन कहता है कि हे नबी! (सूरह नह़्ल, आयतः 44) जिस व्याख्या से नमाज़, व्रत आदि इस्लामी अनिवार्य कर्तव्यों की विधि का ज्ञान होता है। इसी लिये उस को सुरक्षित किया गाय है। और हम ह़दीस के एक-एक रावी के जन्म और मौत का समय और उस की पूरी दशा को जानते हैं। और यह भी जानते हैं कि वह विश्वसनीय है या नहीं? इस प्रकार हम यह कह सकते हैं कि इस संसार में इस्लाम के सिवा कोई धर्म ऐसा नहीं है, जिस की मूल पुस्तकें तथा उस के नबी की सारी बातें सुरक्षित हों।
15:10जुज़ 14 · पृ. 262

وَلَقَدْ أَرْسَلْنَا مِنْ قَبْلِكَ فِي شِيَعِ الْأَوَّلِينَ10

और हमने आपसे पहले भी प्राचीन (विगत) जातियों में रसूल भेजे।
15:11जुज़ 14 · पृ. 262

وَمَا يَأْتِيهِمْ مِنْ رَسُولٍ إِلَّا كَانُوا بِهِ يَسْتَهْزِئُونَ11

और उनके पास जो भी रसूल आया, वे उसके साथ परिहास करते रहे।
15:12जुज़ 14 · पृ. 262

كَذَٰلِكَ نَسْلُكُهُ فِي قُلُوبِ الْمُجْرِمِينَ12

इसी प्रकार, हम इसे[1] अपराधियों के दिलों में पिरो देते हैं।
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1. अर्थात रसूलों के साथ परिहास को, अर्थात उसे इस का दण्ड देंगे।
15:13जुज़ 14 · पृ. 262

لَا يُؤْمِنُونَ بِهِ ۖ وَقَدْ خَلَتْ سُنَّةُ الْأَوَّلِينَ13

वे उसपर ईमान नहीं लाते और प्रथम जातियों से यही रीति चली आ रही है।
15:14जुज़ 14 · पृ. 262

وَلَوْ فَتَحْنَا عَلَيْهِمْ بَابًا مِنَ السَّمَاءِ فَظَلُّوا فِيهِ يَعْرُجُونَ14

और यदि हम उनपर आकाश का कोई द्वार खोल देते, फिर वे उसमें चढ़ने लगते।
15:15जुज़ 14 · पृ. 262

لَقَالُوا إِنَّمَا سُكِّرَتْ أَبْصَارُنَا بَلْ نَحْنُ قَوْمٌ مَسْحُورُونَ15

तबभी वे यही कहते कि हमारी आँखें धोखा खा रही हैं, बल्कि हमपर जादू कर दिया गया है।
15:16जुज़ 14 · पृ. 263

وَلَقَدْ جَعَلْنَا فِي السَّمَاءِ بُرُوجًا وَزَيَّنَّاهَا لِلنَّاظِرِينَ16

हमने आकाश में राशि-चक्र बनाये हैं और उसे देखने वालों के लिए सुसज्जित किया है।
15:17जुज़ 14 · पृ. 263

وَحَفِظْنَاهَا مِنْ كُلِّ شَيْطَانٍ رَجِيمٍ17

और उसे प्रत्येक धिक्कारे हुए शैतान से सुरक्षित किया है।
15:18जुज़ 14 · पृ. 263

إِلَّا مَنِ اسْتَرَقَ السَّمْعَ فَأَتْبَعَهُ شِهَابٌ مُبِينٌ18

परन्तु जो (शैतान) चोरी से सुनना चाहे, तो एक खुली ज्वाला उसका पीछा करती[1] है।
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1. शैतान चोरी से फ़रिश्तों की बात सुनने का प्रयास करते हैं। तो ज्वलंत उल्का उन्हें मारता है। अधिक विवरण के लिये देखियेः (सूरह मुल्क, आयतः5)
15:19जुज़ 14 · पृ. 263

وَالْأَرْضَ مَدَدْنَاهَا وَأَلْقَيْنَا فِيهَا رَوَاسِيَ وَأَنْبَتْنَا فِيهَا مِنْ كُلِّ شَيْءٍ مَوْزُونٍ19

और हमने धरती को फैलाया और उसमें पर्वत बना दिये और उसमें हमने प्रत्येक उचित चीज़ें उगायीं।
15:20जुज़ 14 · पृ. 263

وَجَعَلْنَا لَكُمْ فِيهَا مَعَايِشَ وَمَنْ لَسْتُمْ لَهُ بِرَازِقِينَ20

और हमने उसमें तुम्हारे लिए जीवन के संसाधन बना दिये तथा उनके लिए जिनके जीविका दाता तुम नहीं हो।
15:21जुज़ 14 · पृ. 263

وَإِنْ مِنْ شَيْءٍ إِلَّا عِنْدَنَا خَزَائِنُهُ وَمَا نُنَزِّلُهُ إِلَّا بِقَدَرٍ مَعْلُومٍ21

और कोई चीज़ ऐसी नहीं है, जिसके कोष हमारे पास न हों और हम उसे एक निश्चित मात्रा ही में उतारते हैं।
15:22जुज़ 14 · पृ. 263

وَأَرْسَلْنَا الرِّيَاحَ لَوَاقِحَ فَأَنْزَلْنَا مِنَ السَّمَاءِ مَاءً فَأَسْقَيْنَاكُمُوهُ وَمَا أَنْتُمْ لَهُ بِخَازِنِينَ22

और हमने जलभरी वायुओं को भेजा, फिर आकाश से जल बरसाया और उसे तुम्हें पिलाया तथा तुम उसके कोषाधिकारी नहीं हो।
15:23जुज़ 14 · पृ. 263

وَإِنَّا لَنَحْنُ نُحْيِي وَنُمِيتُ وَنَحْنُ الْوَارِثُونَ23

तथा हम ही जीवन देते तथा मारते हैं और हम ही सबके उत्तराधिकारी हैं।
15:24जुज़ 14 · पृ. 263

وَلَقَدْ عَلِمْنَا الْمُسْتَقْدِمِينَ مِنْكُمْ وَلَقَدْ عَلِمْنَا الْمُسْتَأْخِرِينَ24

तथा तुममें से विगत लोगों को जानते हैं और भविष्य के लोगों को भी जानते हैं।
15:25जुज़ 14 · पृ. 263

وَإِنَّ رَبَّكَ هُوَ يَحْشُرُهُمْ ۚ إِنَّهُ حَكِيمٌ عَلِيمٌ25

और वास्तव, में आपका पालनहार ही उन्हें एकत्र करेगा[1], निश्चय वह सब गुण और सब कुछ जानने वाला है।
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1. अर्थात प्रलय के दिन ह़िसाब के लिये।
15:26जुज़ 14 · पृ. 263

وَلَقَدْ خَلَقْنَا الْإِنْسَانَ مِنْ صَلْصَالٍ مِنْ حَمَإٍ مَسْنُونٍ26

और हमने मनुष्य को सड़े हुए कीचड़ के सूखे गारे बनाया।
15:27जुज़ 14 · पृ. 263

وَالْجَانَّ خَلَقْنَاهُ مِنْ قَبْلُ مِنْ نَارِ السَّمُومِ27

और इससे पहले जिन्नों को हमने अग्नि की ज्वाला से पैदा किया।
15:28जुज़ 14 · पृ. 263

وَإِذْ قَالَ رَبُّكَ لِلْمَلَائِكَةِ إِنِّي خَالِقٌ بَشَرًا مِنْ صَلْصَالٍ مِنْ حَمَإٍ مَسْنُونٍ28

और (याद करो) जब आपके पालनहार ने फ़रिश्तों से कहाः मैं एक मनुष्य उत्पन्न करने वाला हूँ, सड़े हुए कीचड़ के सूखे गारे से।
15:29जुज़ 14 · पृ. 263

فَإِذَا سَوَّيْتُهُ وَنَفَخْتُ فِيهِ مِنْ رُوحِي فَقَعُوا لَهُ سَاجِدِينَ29

तो जब मैं उसे पूरा बना लूँ और उसमें अपनी आत्मा फूँक दूँ, तो उसके लिए सज्दे में गिर जाना[1]।
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1. फ़रिश्तों के लिये आदम का सज्दा अल्लाह के आदेश से उन की परीक्षा के लिये था, किन्तु इस्लाम में मनुष्य के लिये किसी मनुष्य या वस्तु को सज्दा करना शिर्क और अक्षम्य पाप है। (सूरह ह़ा-मीम-सज्दा, आयत संख्याः37)
15:30जुज़ 14 · पृ. 263

فَسَجَدَ الْمَلَائِكَةُ كُلُّهُمْ أَجْمَعُونَ30

अतः उनसब फ़रिश्तों ने सज्दा किया।
15:31जुज़ 14 · पृ. 263

إِلَّا إِبْلِيسَ أَبَىٰ أَنْ يَكُونَ مَعَ السَّاجِدِينَ31

इब्लीस के सिवा। उसने सज्दा करने वालों का साथ देने से इन्कार कर दिया।
15:32जुज़ 14 · पृ. 264

قَالَ يَا إِبْلِيسُ مَا لَكَ أَلَّا تَكُونَ مَعَ السَّاجِدِينَ32

अल्लाह ने पूछाः हे इब्लीस! तुझे क्या हुआ कि सज्दा करने वालों का साथ नहीं दिया?
15:33जुज़ 14 · पृ. 264

قَالَ لَمْ أَكُنْ لِأَسْجُدَ لِبَشَرٍ خَلَقْتَهُ مِنْ صَلْصَالٍ مِنْ حَمَإٍ مَسْنُونٍ33

उसने कहाः मैं ऐसा नहीं हूँ कि एक मनुष्य को सज्दा करूँ, जिसे तूने सड़े हुए कीचड़ के सूखे गारे से पैदा किया है।
15:34जुज़ 14 · पृ. 264

قَالَ فَاخْرُجْ مِنْهَا فَإِنَّكَ رَجِيمٌ34

अल्लाह ने कहाः यहाँ से निकल जा, वास्तव में, तू धिक्कारा हुआ है।
15:35जुज़ 14 · पृ. 264

وَإِنَّ عَلَيْكَ اللَّعْنَةَ إِلَىٰ يَوْمِ الدِّينِ35

और तुझपर धिक्कार है, प्रतिकार (प्रलय) के दिन तक।
15:36जुज़ 14 · पृ. 264

قَالَ رَبِّ فَأَنْظِرْنِي إِلَىٰ يَوْمِ يُبْعَثُونَ36

(इब्लीस) ने कहाः[1] मेरे पालनहार! तू फिर मुझे उस दिन तक अवसर दे, जब सभी पुनः जीवित किये जायेंगे।
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1. अर्थात फ़रिश्ते परीक्षा में सफल हुये और इब्लीस असफल रहा। क्यों कि उस ने आदेश का पालन न कर के अपनी मनमानी की। इसी प्रकार वह भी हैं जो अल्लाह की बात न मान कर मनमानी करते हैं।
15:37जुज़ 14 · पृ. 264

قَالَ فَإِنَّكَ مِنَ الْمُنْظَرِينَ37

अल्लाह ने कहाः तुझे अवसर दे दिया गया है।
15:38जुज़ 14 · पृ. 264

إِلَىٰ يَوْمِ الْوَقْتِ الْمَعْلُومِ38

विध्दित समय के दिन तक के लिए।
15:39जुज़ 14 · पृ. 264

قَالَ رَبِّ بِمَا أَغْوَيْتَنِي لَأُزَيِّنَنَّ لَهُمْ فِي الْأَرْضِ وَلَأُغْوِيَنَّهُمْ أَجْمَعِينَ39

वह बोलाः मेरे पालनहार! तेरे, मुझको कुपथ कर देने के कारण, मैं अवश्य उनके लिए धरती में (तेरी अवज्ञा को) मनोरम बना दूँगा और उनसभी को कुपथ कर दूँगा।
15:40जुज़ 14 · पृ. 264

إِلَّا عِبَادَكَ مِنْهُمُ الْمُخْلَصِينَ40

उनमें से तेरे शुध्द भक्तों के सिवा।
15:41जुज़ 14 · पृ. 264

قَالَ هَٰذَا صِرَاطٌ عَلَيَّ مُسْتَقِيمٌ41

अल्लाह ने कहाः यही मुझतक (पहुँचने की) सीधी राह है।
15:42जुज़ 14 · पृ. 264

إِنَّ عِبَادِي لَيْسَ لَكَ عَلَيْهِمْ سُلْطَانٌ إِلَّا مَنِ اتَّبَعَكَ مِنَ الْغَاوِينَ42

वस्तुतः, मेरे भक्तों पर तेरा कोई अधिकार नहीं[1] चलेगा, सिवाय उसके जो कुपथों में से तेरा अनुसरण करे।
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1. अर्थात जो बन्दे क़ुर्आन तथा ह़दीस (नबी का तरीक़ा) का ज्ञान रखेंगे, उन पर शैतान का प्रभाव नहीं होगा। और जो इन दोनों के ज्ञान से जाहिल होंगे वही उस के झाँसे में आयेंगे। किन्तु जो तौबा कर लें तो उन को क्षमा कर दिया जायेगा।
15:43जुज़ 14 · पृ. 264

وَإِنَّ جَهَنَّمَ لَمَوْعِدُهُمْ أَجْمَعِينَ43

और वास्तव में, उनसबके लिए नरक का वचन है।
15:44जुज़ 14 · पृ. 264

لَهَا سَبْعَةُ أَبْوَابٍ لِكُلِّ بَابٍ مِنْهُمْ جُزْءٌ مَقْسُومٌ44

उस (नरक) के सात द्वार हैं और उनमें से प्रत्येक द्वार के लिए एक विभाजित भाग[1] है।
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1. अर्थात इब्लीस के अनुयायी अपने कुकर्मों के अनुसार नरक के द्वार में प्रवेश करेंगे।
15:45जुज़ 14 · पृ. 264

إِنَّ الْمُتَّقِينَ فِي جَنَّاتٍ وَعُيُونٍ45

वास्तव में, आज्ञाकारी लोग स्वर्गों तथा स्रोतों में होंगे।
15:46जुज़ 14 · पृ. 264

ادْخُلُوهَا بِسَلَامٍ آمِنِينَ46

(उनसे कहा जायेगा) इसमें प्रवेश कर जाओ, शान्ति के साथ निर्भय होकर।
15:47जुज़ 14 · पृ. 264

وَنَزَعْنَا مَا فِي صُدُورِهِمْ مِنْ غِلٍّ إِخْوَانًا عَلَىٰ سُرُرٍ مُتَقَابِلِينَ47

और हम निकाल देंगे उनके दिलों में जो कुछ बैर होगा। वे भाई-भाई होकर एक-दूसरे के सम्मुख तख़्तों के ऊपर रहेंगे।
15:48जुज़ 14 · पृ. 264

لَا يَمَسُّهُمْ فِيهَا نَصَبٌ وَمَا هُمْ مِنْهَا بِمُخْرَجِينَ48

न उसमें उन्हें कोई थकान होगी और न वहाँ से निकाले जायेंगे।
15:49जुज़ 14 · पृ. 264

۞ نَبِّئْ عِبَادِي أَنِّي أَنَا الْغَفُورُ الرَّحِيمُ49

(हे नबी!) आप मेरे भक्तों को सूचित कर दें कि वास्तव में, मैं बड़ा क्षमाशील दयावान्[1] हूँ।
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1. ह़दीस में है कि अल्लाह ने सौ दया पैदा की, निन्नानवे अपने पास रख लीं। और एक को पूरे संसार के लिये भेज दिया। तो यदि काफ़िर उस की पूरी दया जान जाये तो स्वर्ग से निराश नहीं होगा। और ईमान वाला उस की पूरी यातना जान जाये तो नरक से निर्भय नहीं होगा। (सह़ीह़ बुख़ारीः6469)
15:50जुज़ 14 · पृ. 264

وَأَنَّ عَذَابِي هُوَ الْعَذَابُ الْأَلِيمُ50

और मेरी यातना ही दुःखदायी यातना है।
15:51जुज़ 14 · पृ. 264

وَنَبِّئْهُمْ عَنْ ضَيْفِ إِبْرَاهِيمَ51

और आप उन्हें इब्राहीम के अतिथियों के बारे में सूचित कर दें।
15:52जुज़ 14 · पृ. 265

إِذْ دَخَلُوا عَلَيْهِ فَقَالُوا سَلَامًا قَالَ إِنَّا مِنْكُمْ وَجِلُونَ52

जब वे इब्राहीम के पास आये, तो सलाम किया। उसने कहाः वास्तव में, हम तुमसे डर रहे हैं।
15:53जुज़ 14 · पृ. 265

قَالُوا لَا تَوْجَلْ إِنَّا نُبَشِّرُكَ بِغُلَامٍ عَلِيمٍ53

उन्होंने कहाः डरो नहीं, हम तुम्हें एक ज्ञानी बालक की शुभ सूचना दे रहे हैं।
15:54जुज़ 14 · पृ. 265

قَالَ أَبَشَّرْتُمُونِي عَلَىٰ أَنْ مَسَّنِيَ الْكِبَرُ فَبِمَ تُبَشِّرُونَ54

उसने कहाः क्या तुमने मुझे इस बुढ़ापे में शुभ सूचना दी है, तुम मुझे ये शुभ सूचना कैसे दे रहे हो?
15:55जुज़ 14 · पृ. 265

قَالُوا بَشَّرْنَاكَ بِالْحَقِّ فَلَا تَكُنْ مِنَ الْقَانِطِينَ55

उन्होंने कहाः हमने तुम्हें सत्य शुभ सूचना दी है, अतः तुम निराश न हो।
15:56जुज़ 14 · पृ. 265

قَالَ وَمَنْ يَقْنَطُ مِنْ رَحْمَةِ رَبِّهِ إِلَّا الضَّالُّونَ56

(इब्राहीम) ने कहाः अपने पालनहार की दया से निराश, केवल कुपथ लोग ही हुआ करते हैं।
15:57जुज़ 14 · पृ. 265

قَالَ فَمَا خَطْبُكُمْ أَيُّهَا الْمُرْسَلُونَ57

उसने कहाः हे अल्लाह के भेजे हुए फ़रिश्तो! तुम्हारा अभियान क्या है?
15:58जुज़ 14 · पृ. 265

قَالُوا إِنَّا أُرْسِلْنَا إِلَىٰ قَوْمٍ مُجْرِمِينَ58

उन्होंने उत्तर दिया कि हम एक अपराधी जाति के पास भेजे गये हैं।
15:59जुज़ 14 · पृ. 265

إِلَّا آلَ لُوطٍ إِنَّا لَمُنَجُّوهُمْ أَجْمَعِينَ59

लूत के घराने के सिवा, उनसभी को हम बचाने वाले हैं।
15:60जुज़ 14 · पृ. 265

إِلَّا امْرَأَتَهُ قَدَّرْنَا ۙ إِنَّهَا لَمِنَ الْغَابِرِينَ60

परन्तु लूत की पत्नि के लिए हमने निर्णय किया है कि वह पीछे रह जाने वालों में होगी।
15:61जुज़ 14 · पृ. 265

فَلَمَّا جَاءَ آلَ لُوطٍ الْمُرْسَلُونَ61

फिर जब लूत के घर भेजे हुए (फ़रिश्ते) आये।
15:62जुज़ 14 · पृ. 265

قَالَ إِنَّكُمْ قَوْمٌ مُنْكَرُونَ62

तो लूत ने कहाः तुम (मेरे लिए) अपरिचित हो।
15:63जुज़ 14 · पृ. 265

قَالُوا بَلْ جِئْنَاكَ بِمَا كَانُوا فِيهِ يَمْتَرُونَ63

उन्होंने कहाः डरो नहीं, बल्कि हम तुम्हारे पास वो (यातना) लाये हैं, जिसके बारे में वे संदेह कर रहे थे।
15:64जुज़ 14 · पृ. 265

وَأَتَيْنَاكَ بِالْحَقِّ وَإِنَّا لَصَادِقُونَ64

हम तुम्हारे पास सत्य लाये हैं और वास्तव में, हम सत्यवादी हैं।
15:65जुज़ 14 · पृ. 265

فَأَسْرِ بِأَهْلِكَ بِقِطْعٍ مِنَ اللَّيْلِ وَاتَّبِعْ أَدْبَارَهُمْ وَلَا يَلْتَفِتْ مِنْكُمْ أَحَدٌ وَامْضُوا حَيْثُ تُؤْمَرُونَ65

अतः कुछ रात रह जाये, तो अपने घराने को लेकर निकल जाओ और तुम उनके पीछे रहो और तुममें से कोई फिरकर न देखे तथा चले जाओ, जहाँ आदेश दिया जा रहा है।
15:66जुज़ 14 · पृ. 265

وَقَضَيْنَا إِلَيْهِ ذَٰلِكَ الْأَمْرَ أَنَّ دَابِرَ هَٰؤُلَاءِ مَقْطُوعٌ مُصْبِحِينَ66

और हमने लूत को निर्णय सुना दिया कि भोर होते ही इनका उन्मूलन कर दिया जायेगा।
15:67जुज़ 14 · पृ. 265

وَجَاءَ أَهْلُ الْمَدِينَةِ يَسْتَبْشِرُونَ67

और नगर वासी प्रसन्न होकर आ गये[1]।
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1. अर्थात जब फ़रिश्तों को नवयुवकों के रूप में देखा तो लूत अलैहिस्सलाम के यहाँ आ गये ताकि उन के साथ अश्लील कर्म करें।
15:68जुज़ 14 · पृ. 265

قَالَ إِنَّ هَٰؤُلَاءِ ضَيْفِي فَلَا تَفْضَحُونِ68

लूत ने कहाः ये मेरे अतिथि हैं, अतः मेरा अपमान न करो।
15:69जुज़ 14 · पृ. 265

وَاتَّقُوا اللَّهَ وَلَا تُخْزُونِ69

तथा अल्लाह से डरो और मेरा अनादर न करो।
15:70जुज़ 14 · पृ. 265

قَالُوا أَوَلَمْ نَنْهَكَ عَنِ الْعَالَمِينَ70

उन्होंने कहाः क्या हमने तुम्हें विश्व वासियों से नहीं रोका[1] था?
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1. सब के समर्थक न बनो।
15:71जुज़ 14 · पृ. 266

قَالَ هَٰؤُلَاءِ بَنَاتِي إِنْ كُنْتُمْ فَاعِلِينَ71

लूत ने कहाः ये मेरी पुत्रियाँ हैं, यदि तुम कुछ करने वाले[1] हो।
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1. अरथात् इन से विवाह कर लो, और अपनी कामवासना पूरी करो, और कुकर्म न करो।
15:72जुज़ 14 · पृ. 266

لَعَمْرُكَ إِنَّهُمْ لَفِي سَكْرَتِهِمْ يَعْمَهُونَ72

हे नबी! आपकी आयु की शपथ[1]! वास्तव में, वे अपने उन्माद में बहक रहे थे।
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1. अल्लाह के सिवा किसी मनुष्य के लिये उचित नहीं है कि वह अल्लाह के सिवा किसी और चीज़ की शपथ ले।
15:73जुज़ 14 · पृ. 266

فَأَخَذَتْهُمُ الصَّيْحَةُ مُشْرِقِينَ73

अंततः, सूर्योदय के समय उन्हें एक कड़ी ध्वनि ने पकड़ लिया।
15:74जुज़ 14 · पृ. 266

فَجَعَلْنَا عَالِيَهَا سَافِلَهَا وَأَمْطَرْنَا عَلَيْهِمْ حِجَارَةً مِنْ سِجِّيلٍ74

फिर हमने उस बस्ती के ऊपरी भाग को नीचे कर दिया और उनपर कंकरीले पत्थर बरसा दिये।
15:75जुज़ 14 · पृ. 266

إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَآيَاتٍ لِلْمُتَوَسِّمِينَ75

वास्तव में, इसमें कई निशानियाँ हैं, प्रतिभाशालियों[1] के लिए।
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1. अर्थात जो लक्षणों से तथ्य को समझ जाते हैं।
15:76जुज़ 14 · पृ. 266

وَإِنَّهَا لَبِسَبِيلٍ مُقِيمٍ76

और वह (बस्ती) साधारण[1] मार्ग पर स्थित है।
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1. अर्थात जो साधारण मार्ग ह़िजाज़ (मक्का) से शाम को जाता है। यह शिक्षा प्रद बस्ती उसी मार्ग में आती है, जिस से तुम गुज़रते हुये शाम जाते हो।
15:77जुज़ 14 · पृ. 266

إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَآيَةً لِلْمُؤْمِنِينَ77

निःसंदेह इसमें बड़ी निशानी है, ईमान वलों के लिए।
15:78जुज़ 14 · पृ. 266

وَإِنْ كَانَ أَصْحَابُ الْأَيْكَةِ لَظَالِمِينَ78

और वास्तव में, (ऐय्का) के[1] वासी अत्याचारी थे।
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1. इस से अभिप्रेत शोऐब अलैहिस्सलाम की जाति है, ऐय्का का अर्थ वन तथा झाड़ी है।
15:79जुज़ 14 · पृ. 266

فَانْتَقَمْنَا مِنْهُمْ وَإِنَّهُمَا لَبِإِمَامٍ مُبِينٍ79

तो हमने उनसे बदला ले लिया और वे दोनों[1] ही साधारण मार्ग पर हैं।
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1. अर्थात मद्यन और ऐय्का का क्षेत्र भी ह़िजाज़ से फ़िलस्तीन और सीरिया जाते हुये, राह में पड़ता है।
15:80जुज़ 14 · पृ. 266

وَلَقَدْ كَذَّبَ أَصْحَابُ الْحِجْرِ الْمُرْسَلِينَ80

और ह़िज्र के[1] लोगों ने रसूलों को झुठलाया।
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1. ह़िज्र समूद जाति की बस्ती थी, जो सालेह (अलैहिस्सलाम) की जाति थी, यह बस्ती मदीना और तबूक के बीच में स्थित थी।
15:81जुज़ 14 · पृ. 266

وَآتَيْنَاهُمْ آيَاتِنَا فَكَانُوا عَنْهَا مُعْرِضِينَ81

और उन्हें हमने अपनी आयतें (निशानियाँ) दीं, तो वे उनसे विमुख ही रहे।
15:82जुज़ 14 · पृ. 266

وَكَانُوا يَنْحِتُونَ مِنَ الْجِبَالِ بُيُوتًا آمِنِينَ82

वे शिलाकारी करके पर्वतों से घर बनाते और निर्भय होकर रहते थे।
15:83जुज़ 14 · पृ. 266

فَأَخَذَتْهُمُ الصَّيْحَةُ مُصْبِحِينَ83

अन्ततः, उन्हें कड़ी ध्वनि ने भोर के समय पकड़ लिया।
15:84जुज़ 14 · पृ. 266

فَمَا أَغْنَىٰ عَنْهُمْ مَا كَانُوا يَكْسِبُونَ84

और उनकी कमाई उनके कुछ काम न आयी।
15:85जुज़ 14 · पृ. 266

وَمَا خَلَقْنَا السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ وَمَا بَيْنَهُمَا إِلَّا بِالْحَقِّ ۗ وَإِنَّ السَّاعَةَ لَآتِيَةٌ ۖ فَاصْفَحِ الصَّفْحَ الْجَمِيلَ85

और हमने आकाशों तथा धरती को और जो कुछ उन दोनों के बीच है, सत्य के आधार पर ही उत्पन्न किया है और निश्चय प्रलय आनी है। अतः (हे नबी!) आप (उन्हें) भले तौर पर क्षमा कर दें।
15:86जुज़ 14 · पृ. 266

إِنَّ رَبَّكَ هُوَ الْخَلَّاقُ الْعَلِيمُ86

वास्तव में, आपका पालनहार ही सबका स्रेष्टा, सर्वज्ञ है।
15:87जुज़ 14 · पृ. 266

وَلَقَدْ آتَيْنَاكَ سَبْعًا مِنَ الْمَثَانِي وَالْقُرْآنَ الْعَظِيمَ87

तथा (हे नबी!) हमने आपको सात ऐसी आयतें, जो बार-बार दुहराई जाती हैं और महा क़ुर्आन[1] प्रदान किया है।
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1. अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु ने कहा कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का कथन है कि उम्मुल क़ुर्आन (सूरह फ़ातिह़ा) ही वह सात आयतें हैं जो दुहराई जाती हैं, तथा महाक़ुर्आन हैं। (सह़ीह़ बुख़ारीः4704) एक दूसरी ह़दीस में है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमायाः "अल्ह़म्दु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन" ही वह सात आयतें हैं जो बाब-बार दुहराई जाती हैं, और महा क़ुर्आन हैं, जो मुझे प्रदान किया गया है। (संक्षिप अऩुवाद, सह़ीह़ बुख़ारीः4702) यही कारण है कि इस के पढ़े बिना नमाज़ नहीं होती। ( सह़ीह़ बुख़ारीः756, मुस्लिमः 394)
15:88जुज़ 14 · पृ. 266

لَا تَمُدَّنَّ عَيْنَيْكَ إِلَىٰ مَا مَتَّعْنَا بِهِ أَزْوَاجًا مِنْهُمْ وَلَا تَحْزَنْ عَلَيْهِمْ وَاخْفِضْ جَنَاحَكَ لِلْمُؤْمِنِينَ88

और आप, उसकी ओर न देखें, जो सांसारिक लाभ का संसाधन हमने उनमें से विभिन्न प्रकार के लोगों को दे रखा है और न उनपर शोक करें और ईमान वालों के लिए सुशील रहें।
15:89जुज़ 14 · पृ. 266

وَقُلْ إِنِّي أَنَا النَّذِيرُ الْمُبِينُ89

और कह दें कि मैं प्रत्यक्ष (खुली) चेतावनी[1] देने वाला हूँ।
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1. अर्थात अवैज्ञा पर यातना की।
15:90जुज़ 14 · पृ. 266

كَمَا أَنْزَلْنَا عَلَى الْمُقْتَسِمِينَ90

जैसे हमने खण्डन कारियों[1] पर (यातना) उतारी।
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1. खण्डन कारियों से अभिप्राय यहूद और ईसाई हैं। जिन्हों ने अपनी पुस्तकों तौरात तथा इंजील को खण्ड खण्ड कर दिया। अर्थात उन के कुछ भाग पर ईमान लाये और कुछ को नकार दिया। (सह़ीह़ बुख़ारीः4705-4706)
15:91जुज़ 14 · पृ. 267

الَّذِينَ جَعَلُوا الْقُرْآنَ عِضِينَ91

जिन्होंने क़ुर्आन को खण्ड-खण्ड कर दिया[1]।
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1. इसी प्रकार इन्हों ने भी क़ुर्आन के कुछ भाग को मान लिया और कुछ का अगलों की कहानियाँ बता कर इन्कार कर दिया। तो ऐसे सभी लोगों से प्रलय के दिन पूछ होगी कि मेरी पुस्तकों के साथ ऐसा व्यवहार क्यों किया?
15:92जुज़ 14 · पृ. 267

فَوَرَبِّكَ لَنَسْأَلَنَّهُمْ أَجْمَعِينَ92

तो शपथ है आपके पालनहार की। हम उनसे अवश्य पूछेंगे।
15:93जुज़ 14 · पृ. 267

عَمَّا كَانُوا يَعْمَلُونَ93

तुम क्या करते रहे?
15:94जुज़ 14 · पृ. 267

فَاصْدَعْ بِمَا تُؤْمَرُ وَأَعْرِضْ عَنِ الْمُشْرِكِينَ94

अतः आपको, जो आदेश दिया जा रहा है, उसे खोलकर सुना दें और मुश्रिकों (मिश्रमवादियों) की चिन्ता न करें।
15:95जुज़ 14 · पृ. 267

إِنَّا كَفَيْنَاكَ الْمُسْتَهْزِئِينَ95

हम आपके लिए परिहास करने वालों को काफ़ी हैं।
15:96जुज़ 14 · पृ. 267

الَّذِينَ يَجْعَلُونَ مَعَ اللَّهِ إِلَٰهًا آخَرَ ۚ فَسَوْفَ يَعْلَمُونَ96

जो अल्लाह के साथ दूसरे पूज्य बना लेते हैं, तो उन्हें शीघ्र ज्ञान हो जायेगा।
15:97जुज़ 14 · पृ. 267

وَلَقَدْ نَعْلَمُ أَنَّكَ يَضِيقُ صَدْرُكَ بِمَا يَقُولُونَ97

और हम जानते हैं कि उनकी बातों से आपका दिल संकुचित हो रहा है।
15:98जुज़ 14 · पृ. 267

فَسَبِّحْ بِحَمْدِ رَبِّكَ وَكُنْ مِنَ السَّاجِدِينَ98

अतः आप अपने पालनहार की प्रशंसा के साथ उसकी पवित्रता का वर्णन करें तथा सज्दा करने वालों में रहें।
15:99जुज़ 14 · पृ. 267

وَاعْبُدْ رَبَّكَ حَتَّىٰ يَأْتِيَكَ الْيَقِينُ99

और अपने पालनहार की इबादत (वंदना) करते रहें, यहाँ तक कि आपके पास विश्वास आ जाये[1]।
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1. अर्थात मरण का समय जिस का विश्वास सभी को है। (क़ुर्तुबी)

सूरह के आरंभ से चलाएँ