Hindi

Luqman · 31:15

وَإِنْ جَاهَدَاكَ عَلَىٰ أَنْ تُشْرِكَ بِي مَا لَيْسَ لَكَ بِهِ عِلْمٌ فَلَا تُطِعْهُمَا ۖ وَصَاحِبْهُمَا فِي الدُّنْيَا مَعْرُوفًا ۖ وَاتَّبِعْ سَبِيلَ مَنْ أَنَابَ إِلَيَّ ۚ ثُمَّ إِلَيَّ مَرْجِعُكُمْ فَأُنَبِّئُكُمْ بِمَا كُنْتُمْ تَعْمَلُونَ

और यदि वे दोनों दबाव डालें तुमपर कि तुम साझी बनाओ मेरा उसे, जिसका तुम्हें कोई ज्ञान नहीं, तो न[1] मानो उन दोनों की बात और उनके साथ रहो संसार[2] में सुचारु रूप से तथा राह चलो उसकी, जो ध्यानमग्न हो मेरी ओर, फिर मेरी ही ओर तुम्हें फिरकर आना है, तो मैं तुम्हें सूचित कर दूँगा उससे, जो तुम कर रहे थे।
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1. ह़दीस में है कि पाप में किसी की बात नहीं माननी है, पुण्य में माननी है। (सह़ीह़ बुख़ारीः 7257) 2. अर्थात माता-पिता यदि मिश्रणवादी और काफ़िर हों तब भी उन की संसार में सहायता करो।

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