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Yunus · 10:16

قُلْ لَوْ شَاءَ اللَّهُ مَا تَلَوْتُهُ عَلَيْكُمْ وَلَا أَدْرَاكُمْ بِهِ ۖ فَقَدْ لَبِثْتُ فِيكُمْ عُمُرًا مِنْ قَبْلِهِ ۚ أَفَلَا تَعْقِلُونَ

आप कह दें: यदि अल्लाह चाहता, तो मैं क़ुर्आन तुम्हें सुनाता ही नहीं और न वह तुम्हें इससे सूचित करता। फिर मैं इससे पहले तुम्हारे बीच एक आयु व्यतीत कर चुका हूँ। तो क्या तुम समझ बूझ नहीं रखते हो[1]?
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1. आयत का भावार्थ यह है कि यदि तुम एक इसी बात पर विचार करो कि मैं तुम्हारे लिये कोई अपरिचित अज्ञात नहीं हूँ। मैं तुम्ही में से हूँ। यहीं मक्का में पैदा हुआ, और चालीस वर्ष की आयु तुम्हारे बीच व्यतीत की। मेरा पूरा जीवन चरित्र तुम्हारे सामने है, इस अवधि में तुमने सत्य और अमानत के विरुध्द मुझ में कोई बात नहीं देखी तो अब चालीस वर्ष के पश्चात् यह कैसे हो सकता है कि अल्लाह पर यह मिथ्या आरोप लगा दूँ कि उस ने यह क़ुर्आन मुझ पर उतारा है? मेरा पवित्र जीवन स्वयं इस बात का प्रमाण है कि यह क़ुर्आन अल्लाह की वाणी है। और मैं उस का नबी हूँ। और उसी की अनुमति से यह क़ुर्आन तुम्हें सुना रहा हूँ।

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