وَالْفَجْرِ1
Al-Fajr
سورة الفجر
सूरह 89 · मक्की · 30 आयतें
وَلَيَالٍ عَشْرٍ2
وَالشَّفْعِ وَالْوَتْرِ3
وَاللَّيْلِ إِذَا يَسْرِ4
هَلْ فِي ذَٰلِكَ قَسَمٌ لِذِي حِجْرٍ5
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1. (1-5) इन आयतों में प्रथम परलोक के सुफल विष्यक चार संसारिक लक्षणों को साक्ष्य (गवाह) के रूप में परस्तुत किया गया है। जिस का अर्थ यह है कि कर्मों का फल सत्य है। रात तथा दिन का यह अनुक्रम जिस व्यवस्था के साथ चल रहा है उस से सिध्द होता है कि अल्लाह ही इसे चला रहा है। "दस रात्रियों" से अभिप्राय "ज़ुल ह़िज्जा" मास की प्रारम्भिक दस रातें हैं। सह़ीह़ ह़दीसों में इन की बड़ी प्रधानता बताई गई है।
أَلَمْ تَرَ كَيْفَ فَعَلَ رَبُّكَ بِعَادٍ6
إِرَمَ ذَاتِ الْعِمَادِ7
الَّتِي لَمْ يُخْلَقْ مِثْلُهَا فِي الْبِلَادِ8
وَثَمُودَ الَّذِينَ جَابُوا الصَّخْرَ بِالْوَادِ9
وَفِرْعَوْنَ ذِي الْأَوْتَادِ10
الَّذِينَ طَغَوْا فِي الْبِلَادِ11
فَأَكْثَرُوا فِيهَا الْفَسَادَ12
فَصَبَّ عَلَيْهِمْ رَبُّكَ سَوْطَ عَذَابٍ13
إِنَّ رَبَّكَ لَبِالْمِرْصَادِ14
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1. (6-14) इन आयतों में उन जातियों की चर्चा की गई है जिन्हों ने माया मोह में पड़ कर परलोक और प्रतिफल का इन्कार किया, और अपने नैतिक पतन के कारण धरती में उग्रवाद किया। "आद, इरम" से अभिप्रेत वह पूरानी जाती है जिसे क़ुर्आन तथा अरब में "आदे ऊला" (प्रथम आद) कहा गया है। यह वह प्राचीन जाति है जिस के पास हूद (अलैहिस्सलाम) को भेजा गया। और इन को "आदे इरम" इस लिये कहा गया है कि यह शामी वंशक्रम की उस शाखा से संबंधित थे जो इरम बिन शाम बिन नूह़ से चली आती थी। आयत संख्या 11 में इस का संकेत है कि उग्रवाद का उद्गम भौतिकवाद एवं सत्य विश्वास का इन्कार है जिसे वर्तमान युग में भी प्रत्यक्ष रूप में देखा जा सकता है।
فَأَمَّا الْإِنْسَانُ إِذَا مَا ابْتَلَاهُ رَبُّهُ فَأَكْرَمَهُ وَنَعَّمَهُ فَيَقُولُ رَبِّي أَكْرَمَنِ15
وَأَمَّا إِذَا مَا ابْتَلَاهُ فَقَدَرَ عَلَيْهِ رِزْقَهُ فَيَقُولُ رَبِّي أَهَانَنِ16
كَلَّا ۖ بَلْ لَا تُكْرِمُونَ الْيَتِيمَ17
وَلَا تَحَاضُّونَ عَلَىٰ طَعَامِ الْمِسْكِينِ18
وَتَأْكُلُونَ التُّرَاثَ أَكْلًا لَمًّا19
وَتُحِبُّونَ الْمَالَ حُبًّا جَمًّا20
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1. (15-20) इन आयतों में समाज की साधारण नैतिक स्थिति की परीक्षा (जायज़ा) ली गई, और भौतिकवादी विचार की आलोचना की गई है जो मात्र सांसारिक धन और मान मर्य़ादा को सम्मान तथा अपमान का पैमाना समझता है और यह भूल गया है कि न धनी होना कोई पुरस्कार है और न निर्धन होना कोई दण्ड है। अल्लाह दोनों स्थितियों में मानव जाति (इन्सान) की परीक्षा ले रहा है। फिर यह बात किसी के बस में हो तो दूसरे का धन भी हड़प कर जाये, क्या ऐसा करना कुकर्म नहीं जिस का ह़िसाब लिया जाये?
كَلَّا إِذَا دُكَّتِ الْأَرْضُ دَكًّا دَكًّا21
وَجَاءَ رَبُّكَ وَالْمَلَكُ صَفًّا صَفًّا22
وَجِيءَ يَوْمَئِذٍ بِجَهَنَّمَ ۚ يَوْمَئِذٍ يَتَذَكَّرُ الْإِنْسَانُ وَأَنَّىٰ لَهُ الذِّكْرَىٰ23
يَقُولُ يَا لَيْتَنِي قَدَّمْتُ لِحَيَاتِي24
فَيَوْمَئِذٍ لَا يُعَذِّبُ عَذَابَهُ أَحَدٌ25
وَلَا يُوثِقُ وَثَاقَهُ أَحَدٌ26
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1. (21-26) इन आयतों मे बताया गया है कि धन पूजने और उस से परलोक न बनाने का दुष्परिणाम नरक की घोर यातना के रूप में सामने आयेगा तब भौतिकवादी कुकर्मियों की समझ में आयेगा कि क़ुर्आन को न मान कर बड़ी भूल हुई और हाथ मलेंगे।
يَا أَيَّتُهَا النَّفْسُ الْمُطْمَئِنَّةُ27
ارْجِعِي إِلَىٰ رَبِّكِ رَاضِيَةً مَرْضِيَّةً28
فَادْخُلِي فِي عِبَادِي29
وَادْخُلِي جَنَّتِي30
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1. (27-30) इन आयतों में उन के सुख और सफलता का वर्णन किया गया है जो क़ुर्आन की शिक्षा का अनुपालन करते हुये आत्मा की शाँति के साथ जीवन व्यतीत कर रहे हैं।