सूरह 7 · जुज़ 9

Al-A'raf · 7:148

وَاتَّخَذَ قَوْمُ مُوسَىٰ مِنْ بَعْدِهِ مِنْ حُلِيِّهِمْ عِجْلًا جَسَدًا لَهُ خُوَارٌ ۚ أَلَمْ يَرَوْا أَنَّهُ لَا يُكَلِّمُهُمْ وَلَا يَهْدِيهِمْ سَبِيلًا ۘ اتَّخَذُوهُ وَكَانُوا ظَالِمِينَ

और मूसा की जाति ने उसके (पर्वत पर जाने के) पश्चात् अपने आभूषणों से एक बछड़े की मूर्ति बना ली, जिससे गाय के डकारने के समान ध्वनि निकलती थी। क्या उन्होंने ये नहीं सोचा कि न तो वह उनसे बात[1] करता है और न किसी प्रकार का मार्गदर्शन देता है? उन्होंने उसे बना लिया तथा वे अत्याचारी थे।
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1. अर्थात उस से एक ही प्रकार की ध्वनि क्यों निकलती है। बाबिल और मिस्र में भी प्राचीन युग में गाय-बैल की पूजा हो रही थी। और यदि बाबिल की सभ्यता को प्राचीन मान लिया जाये तो यह विचार दूसरे देशों में वहीं से फैला होगा।

तफ़सीर

जब मूसा अलैहिस्सलाम अपने पालनहार से बात करने के लिए गए, तो उनकी जाति के लोगों ने अपने गहनों से बछड़े की एक मूर्ति बना ली, जिसमें कोई आत्मा नहीं थी, जबकि उसकी एक आवाज़ थी। क्या उन्हें पता नहीं कि यह बछड़ा न तो उनसे बात करता है, न किसी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष भलाई का मार्ग दिखाता है और न उन्हें कोई लाभ पहुँचाता है या उनसे कोई हानि दूर करता है?! उन्होंने उसे पूज्य बना लिया तथा ऐसा करके वे अपने ऊपर अत्याचार करने वाले थे।

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