सूरह 59 · जुज़ 28
Al-Hashr · 59:21
لَوْ أَنْزَلْنَا هَٰذَا الْقُرْآنَ عَلَىٰ جَبَلٍ لَرَأَيْتَهُ خَاشِعًا مُتَصَدِّعًا مِنْ خَشْيَةِ اللَّهِ ۚ وَتِلْكَ الْأَمْثَالُ نَضْرِبُهَا لِلنَّاسِ لَعَلَّهُمْ يَتَفَكَّرُونَ
यदि हम अवतरित करते इस क़ुर्आन को किसी पर्वत पर, तो आप उसे देखते कि झुका जा रहा है तथा कण-कण होता जा रहा है, अल्लाह के भय से और इन उदाहरणों का वर्णन हम लोगों के लिए कर रहे हैं, ताकि वे सोच-विचार करें। वह खुले तथा छुपे का जानने वाला है। वही अत्यंत कृपाशील, दयावान् है।
तफ़सीर
अगर हमने इस क़ुरआन को किसी पहाड़ पर उतारा होता, तो (ऐ रसूल!) आप देखते कि वह पहाड़ अपनी कठोरता के बावजूद, अल्लाह के भय की गंभीरता से दब कर टूट जाता; क्योंकि उसमें निरोधात्मक उपदेश और कड़ी चेतावनियाँ हैं। ये उदाहरण हम लोगों के लिए इसलिए बयान करते हैं, ताकि वे अपनी बुद्धियों से काम लें और इस क़ुरआन की आयतों में जो उपदेश और शिक्षाएँ हैं, उनसे सीख प्राप्त करें।
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