सूरह 57 · जुज़ 27

Al-Hadid · 57:8

وَمَا لَكُمْ لَا تُؤْمِنُونَ بِاللَّهِ ۙ وَالرَّسُولُ يَدْعُوكُمْ لِتُؤْمِنُوا بِرَبِّكُمْ وَقَدْ أَخَذَ مِيثَاقَكُمْ إِنْ كُنْتُمْ مُؤْمِنِينَ

और तुम्हें क्या हो गया है कि ईमान नहीं लाते अल्लाह पर, जबकि रसूल[1] तुम्हें पुकार रहा है, ताकि तुम ईमान लाओ अपने पालनहार पर, जबकि अल्लाह ले चुका है तुमसे वचन,[2] यदि तुम ईमान वाले हो।
____________________
1. अर्थात मुह़म्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम)। 2. (देखियेः सूरह आराफ़, आयतः 172)। इब्ने कसीर ने इस से अभिप्राय वह वचन लिया है जिस का वर्णन सूरह माइदा, आयतः 7 में है। जो नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के द्वारा सह़ाबा से लिया गया कि वह आप की बातें सुनेंगे तथा सुख-दुःख में अनुपालन करेंगे। और प्रिय और अप्रिय में सच बोलेंगे। तथा किसी की निन्दा से नहीं डरेंगे। (बुख़ारीः 7199, मुस्लिमः1709)

तफ़सीर

और वह कौन-सी चीज़ है जो तुम्हें अल्लाह पर ईमान लाने से रोकती है?! जबकि रसूल तुम्हें अल्लाह की ओर इस आशा में बुला रहे हैं कि तुम अपने रब पर ईमान ले आओ। तथा अल्लाह तुमसे यह वचन ले चुका है कि तुम उसपर ईमान लाओगे, जब उसने तुम्हें तुम्हारे पिताओं की पीठ से बाहर निकाला, यदि तुम ईमान वाले हो।

पाठक में खोलें - पूरी सूरह पढ़ें

आपकी भाषा में तफ़सीर

अरबी तफ़सीरें

अनुवाद

सुनें