सूरह 35 · जुज़ 22
Fatir · 35:29
إِنَّ الَّذِينَ يَتْلُونَ كِتَابَ اللَّهِ وَأَقَامُوا الصَّلَاةَ وَأَنْفَقُوا مِمَّا رَزَقْنَاهُمْ سِرًّا وَعَلَانِيَةً يَرْجُونَ تِجَارَةً لَنْ تَبُورَ
वास्तव में, जो पढ़ते हैं अल्लाह की पुस्तक (क़ुर्आन), उन्होंने स्थापना की नमाज़ की एवं दान किया उसमें से, जो हमने उन्हें प्रदान किया है, खुले तथा छुपे, तो वही आशा रखते हैं ऐसे व्यापार की, जो कदापि हानिकर नहीं होगा।
तफ़सीर
निःसंदेह जो लोग अल्लाह की उस पुस्तक का पाठ करते हैं, जिसे हमने अपने रसूल पर उतारा है और उसकी शिक्षाओं का पालन करते हैं, और नमाज़ को सर्वोत्तम तरीक़े से पूरा करते हैं, तथा हमने उन्हें जो कुछ प्रदान किया है, उसमें से ज़कात के रूप में एवं अन्य तरीकों से छिपे और खुले खर्च करते हैं, वे इन कार्यों से अल्लाह के निकट ऐसे व्यापार की आशा रखते हैं, जिसमें कभी घाटा नहीं होगा।
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