सूरह 30 · जुज़ 21
Ar-Rum · 30:52
فَإِنَّكَ لَا تُسْمِعُ الْمَوْتَىٰ وَلَا تُسْمِعُ الصُّمَّ الدُّعَاءَ إِذَا وَلَّوْا مُدْبِرِينَ
तो (हे नबी!) आप नहीं सुना सकेंगे मुर्दों[1] को और नहीं सुना सकेंगे बहरों को पुकार, जब वे भाग रहे हों, पीठ फेरकर।
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1. अर्थात जिन की अन्तरात्मा मर चुकी हो और सत्य सुनने के लिये तैयार न हों।
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1. अर्थात जिन की अन्तरात्मा मर चुकी हो और सत्य सुनने के लिये तैयार न हों।
तफ़सीर
जिस तरह आप मरे हुए लोगों को नहीं सुना सकते और न ही बहरों को सुना सकते हैं, जबकि वे आपसे यह सुनिश्चित करने के लिए दूर चले गए हैं कि उन्हें सुनाई न दे, तो उसी तरह आप उन लोगों का मार्गदर्शन नहीं कर सकते, जो मुँह फेरने और लाभ न उठाने के कारण, इन लोगों के समान हैं।
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