सूरह 3 · जुज़ 3
Ali 'Imran · 3:23
أَلَمْ تَرَ إِلَى الَّذِينَ أُوتُوا نَصِيبًا مِنَ الْكِتَابِ يُدْعَوْنَ إِلَىٰ كِتَابِ اللَّهِ لِيَحْكُمَ بَيْنَهُمْ ثُمَّ يَتَوَلَّىٰ فَرِيقٌ مِنْهُمْ وَهُمْ مُعْرِضُونَ
(हे नबी!) क्या आपने उनकी[1] दशा नहीं देखी, जिन्हें पुस्तक का कुछ भाग दिया गया? वे अल्लाह की पुस्तक की ओर बुलाये जा रहे हैं, ताकि उनके बीच निर्णय[2] करे, तो उनका एक गिरोह मुँह फेर रहा है और वे हैं ही मुँह फेरने वाले।
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1. इस से अभिप्राय यहूदी विद्वान हैं। 2. अर्थात विभेद का निर्णय कर दे। इस आयत में अल्लाह की पुस्तक से अभिप्राय तौरात और इंजील हैं। और अर्थ यह है कि जब उन्हें उन की पुस्तकों की ओर बुलाया जाता है कि अपनी पुस्तकों ही को निर्णायक मान लो, तथा बताओ कि उन में अन्तिम नबी पर ईमान लाने का आदेश दिया गया है या नहीं? तो वे कतरा जाते हैं, जैसे कि उन्हें कोई ज्ञान ही न हो।
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1. इस से अभिप्राय यहूदी विद्वान हैं। 2. अर्थात विभेद का निर्णय कर दे। इस आयत में अल्लाह की पुस्तक से अभिप्राय तौरात और इंजील हैं। और अर्थ यह है कि जब उन्हें उन की पुस्तकों की ओर बुलाया जाता है कि अपनी पुस्तकों ही को निर्णायक मान लो, तथा बताओ कि उन में अन्तिम नबी पर ईमान लाने का आदेश दिया गया है या नहीं? तो वे कतरा जाते हैं, जैसे कि उन्हें कोई ज्ञान ही न हो।
तफ़सीर
ऐ नबी! क्या आपने उन यहूदियों का हाल नहीं देखा, जिन्हें अल्लाह ने तौरात तथा उसमें मौजूद आपकी नुबुव्वत (ईश्दूतत्व) की निशानियों के ज्ञान का एक हिस्सा दिया। उन्हें अल्लाह की पुस्तक तौरात की ओर बुलाया जाता है, ताकि वह उनके बीच उनके विवादों का निर्णय करे। परंतु उनके विद्वानों और प्रमुख लोगों का एक समूह मुँह फेर लेता है, इस हाल में कि वे उसके आदेश से उपेक्षा करने वाले होते हैं क्योंकि वह उनकी इच्छाओं के अनुकूल नहीं है। हालाँकि उनके लिए बेहतर यह था - जबकि वे तौरात का अनुसरण करने का दावा करते हैं - कि उससे फैसला कराने में सबसे आगे रहते।
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