सूरह 3 · जुज़ 4

Ali 'Imran · 3:191

الَّذِينَ يَذْكُرُونَ اللَّهَ قِيَامًا وَقُعُودًا وَعَلَىٰ جُنُوبِهِمْ وَيَتَفَكَّرُونَ فِي خَلْقِ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ رَبَّنَا مَا خَلَقْتَ هَٰذَا بَاطِلًا سُبْحَانَكَ فَقِنَا عَذَابَ النَّارِ

जो खड़े, बैठे तथा सोए (प्रत्येक स्थिति में,) अल्लाह की याद करते तथ आकाशों और धरती की रचना में विचार करते रहते हैं। (कहते हैः) हे हमारे पालनहार! तूने ये सब[1] व्यर्थ नहीं रचा है। हमें अग्नि के दण्ड से बचा ले।
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1. अर्थात यह विचित्र रचना तथा व्यवस्था अकारण नहीं तथा आवश्यक है कि इस जीवन के पश्चात भी कोई जीवन हो जिस में इस जीवन के कर्मों के परिणाम सामने आयें।

तफ़सीर

ये वही लोग हैं जो खड़े, बैठे और लेटे, हर स्थिति में अल्लाह को याद करते हैं तथा आकाश और धरती की रचना में चिंतन करते हैं और कहते हैं : ऐ हमारे पालनहार! तूने इतनी बड़ी सृष्टि को व्यर्थ नहीं बनाया है। तू बिना उद्देश्य कार्य करने से पवित्र है। अतः तू हमें नेकियों की तौफ़ीक़ देकर और बुराइयों से सुरक्षितकर आग के अज़ाब से बचा ले।

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