सूरह 3 · जुज़ 4
Ali 'Imran · 3:145
وَمَا كَانَ لِنَفْسٍ أَنْ تَمُوتَ إِلَّا بِإِذْنِ اللَّهِ كِتَابًا مُؤَجَّلًا ۗ وَمَنْ يُرِدْ ثَوَابَ الدُّنْيَا نُؤْتِهِ مِنْهَا وَمَنْ يُرِدْ ثَوَابَ الْآخِرَةِ نُؤْتِهِ مِنْهَا ۚ وَسَنَجْزِي الشَّاكِرِينَ
कोई प्राणी ऐसा नहीं कि अल्लाह की अनुमति के बिना मर जाये, उसका अंकित निर्धारित समय है। जो सांसारिक प्रतिफल चाहेगा, हम उसे उसमें से कुछ देंगे तथा जो परलोक का प्रतिफल चाहेगा, हम उसे उसमें से देंगे और हम कृतज्ञों को शीघ्र ही प्रतिफल देंगे।
तफ़सीर
और कोई भी प्राणी अल्लाह के फैसले ही से मरता है, जब वह उस अवधि को पूरा कर लेता है जिसे अल्लाह ने लिखी थी और उसे उसका अंत बना दिया था, न वह उससे आगे बढ़ सकता है, न पीछे रह सकता। और जो अपने कर्म से दुनिया का बदला चाहता है, हम उसे उतना ही देते हैं जितना उसके नसीब में होता है, और आख़िरत में उसका कोई हिस्सा नहीं होगा। और जो व्यक्ति अपने कर्म से आख़िरत में अल्लाह का बदला चाहता है, हम उसे उसका बदला देंगे। और हम शीघ्र ही उन लोगों को बड़ा बदला देंगे, जो अपने पालनहार के आभारी हैं।
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