सूरह 3 · जुज़ 4

Ali 'Imran · 3:112

ضُرِبَتْ عَلَيْهِمُ الذِّلَّةُ أَيْنَ مَا ثُقِفُوا إِلَّا بِحَبْلٍ مِنَ اللَّهِ وَحَبْلٍ مِنَ النَّاسِ وَبَاءُوا بِغَضَبٍ مِنَ اللَّهِ وَضُرِبَتْ عَلَيْهِمُ الْمَسْكَنَةُ ۚ ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ كَانُوا يَكْفُرُونَ بِآيَاتِ اللَّهِ وَيَقْتُلُونَ الْأَنْبِيَاءَ بِغَيْرِ حَقٍّ ۚ ذَٰلِكَ بِمَا عَصَوْا وَكَانُوا يَعْتَدُونَ

इन (यहूदियों) पर जहाँ भी रहें, अपमान थोंप दिया गया है, (ये और बात है कि) अल्लाह की शरण[1] अथवा लोगों की शरण में हों[2], ये अल्लाह के प्रकोप के अधिकारी हो गये तथा इनपर दरिद्रता थोंप दी गयी। ये इस कारण हुआ कि ये अल्लाह की आयतों के साथ कुफ़्र कर रहे थे और नबियों का अवैध वध कर रहे थे। ये इस कारण कि इन्होंने अवज्ञा की और (धर्म की) सीमा का उल्लंघन कर रहे थे।
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1. अल्लाह की शरण से अभिप्राय इस्लाम धर्म है। 2.दूसरा बचाव का तरीक़ा यह है कि किसी ग़ैर मुस्लिम शक्ति की उन्हें सहायता प्राप्त हो जाये।

तफ़सीर

यहूदी जहाँ भी रहें, अपमान और तिरस्कार उन्हें घेरे हुए और उनपर हावी है। अतः वे उसी समय सुरक्षित रह सकते हैं, जब उन्हें सर्वशक्तिमान अल्लाह की ओर से या लोगों की ओर से वचन अथवा शरण (सुरक्षा) मिल जाए। तथा वे अल्लाह के प्रकोप व क्रोध के पात्र बन गए हैं और ज़रूरत और दरिद्रता उनपर चारों ओर से घेर दी गई है। और यह सब इस कारण हुआ कि वे अल्लाह की निशानियों का इनकार करते और अल्लाह के नबियों की अन्यायपूर्वक हत्या करते थे। और ऐसा इसलिए - भी - हुआ कि वे अवज्ञा करते और अल्लाह की सीमाओं का उल्लंघन करते थे।

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