सूरह 29 · जुज़ 20

Al-'Ankabut · 29:25

وَقَالَ إِنَّمَا اتَّخَذْتُمْ مِنْ دُونِ اللَّهِ أَوْثَانًا مَوَدَّةَ بَيْنِكُمْ فِي الْحَيَاةِ الدُّنْيَا ۖ ثُمَّ يَوْمَ الْقِيَامَةِ يَكْفُرُ بَعْضُكُمْ بِبَعْضٍ وَيَلْعَنُ بَعْضُكُمْ بَعْضًا وَمَأْوَاكُمُ النَّارُ وَمَا لَكُمْ مِنْ نَاصِرِينَ

और कहाः तुमने तो अल्लाह को छोड़कर मूर्तियों को प्रेम का साधन बना लिया है अपने बीच, सांसारिक जीवन में, फिर प्रलय के दिन तुम एक-दूसरे का इन्कार करोगे तथा धिक्करोगे एक-दूसरे को और तुम्हारा आवास नरक होगा और नहीं होगा तुम्हारा कोई सहायक।

तफ़सीर

और इबराहीम अलैहिस्सलाम ने अपनी जाति से कहा : तुमने मूर्तियों को पूज्य बना लिया है, जिनकी तुम पूजा करते हो, ताकि इस दुनिया के जीवन में उनकी पूजा को एक-दूसरे को जानने और आपस में प्रेम रखने का आधार बना लो। फिर क़ियामत के दिन तुम्हारे बीच का यह प्रेम समाप्त हो जाएगा, तथा यातना को देखकर तुम एक-दूसरे से अलग हो जाओगे और एक-दूसरे को धिक्कारने लगोगे। और तुम्हारा ठिकाना जहाँ तुम शरण लोगे, आग ही है और तुम्हारे लिए कोई सहायक नहीं होंगे जो तुम्हें अल्लाह की यातना से बचा सकें, न तो तुम्हारे उन पूज्यों में से जिनकी तुम अल्लाह को छोड़कर पूजा करते हो और न ही उनके अलावा अन्य लोगों में से।

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