सूरह 24 · जुज़ 18
An-Nur · 24:47
وَيَقُولُونَ آمَنَّا بِاللَّهِ وَبِالرَّسُولِ وَأَطَعْنَا ثُمَّ يَتَوَلَّىٰ فَرِيقٌ مِنْهُمْ مِنْ بَعْدِ ذَٰلِكَ ۚ وَمَا أُولَٰئِكَ بِالْمُؤْمِنِينَ
और[1] वे कहते हैं कि हम अल्लाह तथा रसूल पर ईमान लाये और हम आज्ञाकारी हो गये, फिर मुँह फेर लेता है उनमें से एक गिरोह इसके पश्चात्। वास्तव में, वे ईमान वाले हैं ही नहीं।
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1. यहाँ से मुनाफ़िक़ों (द्विधावादियों) की दशा का वर्णन किया जा रहा है, तथा यह बताया जा रहा है कि ईमान के लिये अल्लाह के सभी आदेशों तथा नियमों का पालन आश्यक है। और क़ुर्आन तथा सुन्नत के निर्णय का पालन करना ही ईमान है।
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1. यहाँ से मुनाफ़िक़ों (द्विधावादियों) की दशा का वर्णन किया जा रहा है, तथा यह बताया जा रहा है कि ईमान के लिये अल्लाह के सभी आदेशों तथा नियमों का पालन आश्यक है। और क़ुर्आन तथा सुन्नत के निर्णय का पालन करना ही ईमान है।
तफ़सीर
मुनाफ़िक़ लोग कहते हैं : हम अल्लाह पर ईमान लाए और रसूल पर ईमान लाए, तथा हमने अल्लाह का आज्ञापालन किया और रसूल का आज्ञापालन किया। फिर उनमें से एक समूह मुँह फेर लेता है। चुनाँचे अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान लाने और उनकी बात मानने का दावा करने के बाद, वे अल्लाह के मार्ग में जिहाद करने के आदेश में अल्लाह और उसके रसूल का पालन नहीं करते हैं। और ये अल्लाह और उसके रसूल के आज्ञापालन से मुँह फेरने वाले, मोमिन नहीं हैं, भले ही वे दावा करें कि वे मोमिन हैं।
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