सूरह 24 · जुज़ 18

An-Nur · 24:2

الزَّانِيَةُ وَالزَّانِي فَاجْلِدُوا كُلَّ وَاحِدٍ مِنْهُمَا مِائَةَ جَلْدَةٍ ۖ وَلَا تَأْخُذْكُمْ بِهِمَا رَأْفَةٌ فِي دِينِ اللَّهِ إِنْ كُنْتُمْ تُؤْمِنُونَ بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الْآخِرِ ۖ وَلْيَشْهَدْ عَذَابَهُمَا طَائِفَةٌ مِنَ الْمُؤْمِنِينَ

व्यभिचारिणी तथा[1] व्यभिचारी, दोनों में से प्रत्येक को सौ कोड़े मारो और तुम्हें उन दोनों पर कोई तरस न आये अल्लाह के धर्म के विषय[2] में, यदि तुम अल्लाह तथा अन्तिम दिन पर ईमान (विश्वास) रखते हो और चाहिए कि उनके दण्ड के समय उपस्थित रहे ईमान वालों का एक[3] गिरोह।
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1. व्यभिचार से संबंधित आरंभिक आदेश सूरह निसा, आयत 15 में आ चुका है। अब यहाँ निश्चित रूप से उस का दण्ड नियत कर दिया गया है। आयत में वर्णित सौ कोड़े दण्ड अविवाहित व्यभिचारी तथा व्याभिचारिणी के लिये हैं। आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) अविवाहित व्यभिचारी को सौ कोड़े मारने का और एक वर्ष देश से निकाल देने का आदेश देते थे। (सह़ीह़ बुख़ारीः 6831) किन्तु यदि दोनों में कोई विवाहित है तो उस के लिये रज्म (पत्थरों से मार डालने) का दण्ड है। आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमायाः मुझ से (शिक्षा) ले लो, मुझ से (शिक्षा) ले लो। अल्लाह ने उन के लिये राह बना दी। अविवाहित के लिये सौ कोड़े और विवाहित के लिये रज्म है। (सह़ीह़ मुस्लिमः 1690, अबूदाऊदः4418) इत्यादि। आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने युग में रज्म का दण्ड दिया जिस के सह़ीह़ ह़दीसों में कई उदाहरण हैं। और ख़ुलफ़ाये राशिदीन के युग में भी यही दण्ड दिया गया। और इस पर मुस्लिम समुदाय का इज्मा (मतैक्य) है। व्यभिचार ऐसा घोर पाप है जिस से परिवारिक व्यवस्था अस्त-व्यस्त हो जाती है। पति-पत्नि को एक दूसरे पर विश्वास नहीं रह जाता। और यदि कोई शिशु जन्म ले तो उस के पालन-पोषण की भीषण समस्या सामने आती है। इसी लिये इस्लाम ने इस का घोर दण्ड रखा है ताकि समाज और समाज वालों को शान्त और सुरक्षित रखा जाये। 2. अर्थात दया भाव के कारण दण्ड देने से न रुक जाओ। 3. ताकि लोग दण्ड से शिक्षा लें।

तफ़सीर

अविवाहित व्यभिचार करने वाली महिला और व्यभिचार करने वाले पुरुष, दोनें में से प्रत्येक को सौ कोड़े लगाओ। तथा अगर तुम अल्लाह और अंतिम दिन पर ईमान रखते हो, तो उन दोनों के प्रति तुम कोई नरमी और दया न अपनाओ कि उनपर ह़द (दंड) ही लागू न करो या उसमें कमी कर दो। और उन दोनों पर ह़द (दंड) लागू करते समय ईमान वालों का एक गिरोह उपस्थित रहना चाहिए; ताकि उनकी सज़ा की खबर को खूब फैलाया जा सके और खुद उन्हें तथा अन्य लोगों को व्यभिचार से बाज़ रखा जा सके।

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