सूरह 18 · जुज़ 16

Al-Kahf · 18:77

فَانْطَلَقَا حَتَّىٰ إِذَا أَتَيَا أَهْلَ قَرْيَةٍ اسْتَطْعَمَا أَهْلَهَا فَأَبَوْا أَنْ يُضَيِّفُوهُمَا فَوَجَدَا فِيهَا جِدَارًا يُرِيدُ أَنْ يَنْقَضَّ فَأَقَامَهُ ۖ قَالَ لَوْ شِئْتَ لَاتَّخَذْتَ عَلَيْهِ أَجْرًا

फिर दोनो चले, यहाँ तक कि जब एक गाँव के वासियों के पास आये, तो उनसे भोजन माँगा। उन्होंने उनका अतिथि सत्कार करने से इन्कार कर दिया। वहाँ उन्होंने एक दीवार पायी, जो गिरा चाहती थी। उसने उसे सीधा कर दिया। कहाः यदि आप चाहते, तो इसपर पारिश्रमिक ले लेते।

तफ़सीर

फिर दोनों चल पड़े, यहाँ तक कि जब वे एक गाँव वालों के पास आए, उसके रहने वालों से भोजन माँगा, तो गाँव वालों ने दोनों को भोजन कराने और उनकी मेहमानी का हक़ अदा करने से इनकार कर दिया। इसी बीच दोनों को गाँव में एक दीवार मिली, जो झुकी हुई थी और गिरने ही वाली थी। ख़ज़िर ने उसे बराबर करके सीधा कर दिया। इसपर मूसा अलैहिस्सलाम ने ख़ज़िर से कहा : यदि आप इसकी मरम्मत के लिए कुछ मज़दूरी लेना चाहते, तो ज़रूर ले लेते, जिसकी हमें उनके हमारी मेज़बानी करने से इनकार करने के बाद आवश्यकता भी थी।

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