सूरह 18 · जुज़ 15
Al-Kahf · 18:56
وَمَا نُرْسِلُ الْمُرْسَلِينَ إِلَّا مُبَشِّرِينَ وَمُنْذِرِينَ ۚ وَيُجَادِلُ الَّذِينَ كَفَرُوا بِالْبَاطِلِ لِيُدْحِضُوا بِهِ الْحَقَّ ۖ وَاتَّخَذُوا آيَاتِي وَمَا أُنْذِرُوا هُزُوًا
तथा हम रसूलों को नहीं भेजते, परन्तु शुभ सूचना देने वाले और सावधान करने वाले बनाकर और जो काफ़िर हैं, असत्य (अनृत) के सहारे विवाद करते हैं, ताकि उसके द्वारा वे सत्य को नीचा[1] दिखायें और उन्होंने बनाया हमारी आयतों को तथा जिस बात की उन्हें चेतावनी दी गई, परिहास।
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1. अर्थात सत्य को दबा दें।
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1. अर्थात सत्य को दबा दें।
तफ़सीर
और हम अपने जो भी रसूल भेजते हैं, उन्हें ईमान और आज्ञाकारिता के लोगों को शुभ सूचना देने वाले, तथा कुफ्र और अवज्ञा करने वालों को डराने वाले बनाकर भेजते हैं। और उनका लोगों के दिलों पर कोई अधिकार (ज़ोर) नहीं होता कि उन्हें मार्गदर्शन स्वीकारने पर उभार सकें। और जिन लोगों ने अल्लाह का इनकार किया है, वे अपने सामने प्रमाणों के स्पष्ट हो जाने के बावजूद भी रसूलों के साथ झगड़ा (बहस) करते हैं; ताकि वे अपने असत्य के द्वारा मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर उतरने वाले सत्य को निराकृत कर दें। तथा उन्होंने क़ुरआन को और उस चीज़ को जिससे उन्हें डराया गया था, हँसी और मज़ाक बना लिया।
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