सूरह 18 · जुज़ 15
Al-Kahf · 18:34
وَكَانَ لَهُ ثَمَرٌ فَقَالَ لِصَاحِبِهِ وَهُوَ يُحَاوِرُهُ أَنَا أَكْثَرُ مِنْكَ مَالًا وَأَعَزُّ نَفَرًا
और उसे लाभ प्राप्त हुआ, तो एक दिन उसने अपने साथी से कहा जबकि वह उससे बात कर रहा थाः मैं तुझसे अधिक धनी हूँ तथा स्वजनों में भी अधिक[1] हूँ।
____________________
1. अर्थात यदि किसी का धन संतान तथा बाग़ इत्यादि अच्छा लगे तो ((मा शा अल्लाह ला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाह)) कहना चाहिये। ऐसा कहने से नज़र नहीं लगती। यह इस्लाम धर्म की शिक्षा है, जिस से आपस में द्वेष नहीं होता।
____________________
1. अर्थात यदि किसी का धन संतान तथा बाग़ इत्यादि अच्छा लगे तो ((मा शा अल्लाह ला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाह)) कहना चाहिये। ऐसा कहने से नज़र नहीं लगती। यह इस्लाम धर्म की शिक्षा है, जिस से आपस में द्वेष नहीं होता।
तफ़सीर
और इन दो बाग़ों के मालिक के पास अन्य धन और फल भी थे। चुनाँचे उसने गर्व करते हुए अपने मोमिन साथी से, जबकि वह उसे प्रभावित करने के लिए उससे संबोधित था, कहा : मैं तुमसे अधिक धनवान, तुमसे बढ़कर सम्मान वाला और तुमसे ज़्यादा शक्तिशाली बिरादरी वाला हूँ।
पाठक में खोलें - पूरी सूरह पढ़ें