सूरह 17 · जुज़ 15
Al-Isra · 17:59
وَمَا مَنَعَنَا أَنْ نُرْسِلَ بِالْآيَاتِ إِلَّا أَنْ كَذَّبَ بِهَا الْأَوَّلُونَ ۚ وَآتَيْنَا ثَمُودَ النَّاقَةَ مُبْصِرَةً فَظَلَمُوا بِهَا ۚ وَمَا نُرْسِلُ بِالْآيَاتِ إِلَّا تَخْوِيفًا
और हमें नहीं रोका इससे कि हम निशानियाँ भेजें, किन्तु इस बात ने कि विगत लोगों ने उन्हें झुठला[1] दिया और हमने समूद को ऊँटनी का खुला चमत्कार दिया, तो उन्होंने उसपर अत्याचार किया और हम चमत्कार डराने के लिए ही भेजते हैं।
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1. अर्थात चमत्कार की माँग करने पर चमत्कार इस नहीं भेजा जाता कि उस के पश्चात् न मानने पर यातना का आना अनिवार्य हो जाता है, जैसा कि भाष्यकारों ने लिखा है।
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1. अर्थात चमत्कार की माँग करने पर चमत्कार इस नहीं भेजा जाता कि उस के पश्चात् न मानने पर यातना का आना अनिवार्य हो जाता है, जैसा कि भाष्यकारों ने लिखा है।
तफ़सीर
और हमने रसूल की सच्चाई को इंगित करने वाली संवेदी निशानियाँ, जिनकी माँग मुश्रिकों ने की थी, जैसे कि मृतकों को जीवित करना आदि, इसलिए उतारना छोड़ दिया, क्योंकि हमने उन्हें पिछले समुदायों पर उतारा था, परन्तु उन्होंने उन्हें झुठला दिया था। चुनाँचे हमने समूद समुदाय को एक महान और स्पष्ट निशानी ऊँटनी के रूप में दी थी। लेकिन उन्होंने उसका इनकार कर दिया। इसलिए हमने उन्हें जल्द ही यातना से ग्रस्त कर दिया। और हम रसूलों के हाथों निशानियाँ केवल उनके समुदायों को डराने के लिए भेजते हैं, ताकि वे इस्लाम ग्रहण कर लें।
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