सूरह 17 · जुज़ 15
Al-Isra · 17:33
وَلَا تَقْتُلُوا النَّفْسَ الَّتِي حَرَّمَ اللَّهُ إِلَّا بِالْحَقِّ ۗ وَمَنْ قُتِلَ مَظْلُومًا فَقَدْ جَعَلْنَا لِوَلِيِّهِ سُلْطَانًا فَلَا يُسْرِفْ فِي الْقَتْلِ ۖ إِنَّهُ كَانَ مَنْصُورًا
और किसी प्राण को जिसे अल्लाह ने ह़राम (अवैध) किया है, वध न करो, परन्तु धर्म विधान[1] के अनुसार और जो अत्याचार से वध (निहत) किया गया, हमने उसके उत्तराधिकारी को अधिकार[2] प्रदान किया है। अतः वह वध करने में अतिक्रमण[3] न करे, वास्तव में, उसे सहायता दी गयी है।
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1. अर्थात प्रतिहत्या में अथवा विवाहित होते हुये व्यभिचार के कारण, अथवा इस्लाम से फिर जाने के कारण। 2. अधिकार का अर्थ यह है कि वह इस के आधार पर हत्दण्ड की माँग कर सकता है, अथवा वध या अर्थदण्ड लेने या क्षमा कर देने का अधिकारी है। 3. अर्थात एक के बदले दो को या दूसरे की हत्या न करे।
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1. अर्थात प्रतिहत्या में अथवा विवाहित होते हुये व्यभिचार के कारण, अथवा इस्लाम से फिर जाने के कारण। 2. अधिकार का अर्थ यह है कि वह इस के आधार पर हत्दण्ड की माँग कर सकता है, अथवा वध या अर्थदण्ड लेने या क्षमा कर देने का अधिकारी है। 3. अर्थात एक के बदले दो को या दूसरे की हत्या न करे।
तफ़सीर
और उस प्राणी की हत्या न करो, जिसका खून अल्लाह ने ईमान अथवा 'अमान' (सुरक्षा) के कारण संरक्षित कर दिया है, जब तक कि वह मुर्तद्द होने (इस्लाम धर्म त्यागने), या शादीशुदा होने के पश्चात व्यभिचार करने के कारण, या 'क़िसास' (बदले) के तौर पर क़त्ल किए जाने का हक़दार न हो जाए। तथा जिसकी हत्या बिना किसी वैध कारण के अत्याचारपूर्ण ढंग से कर दी जाए, तो हमने उसके उत्तराधिकारियों में से उसके अभिभावक को उसके हत्यारे के ऊपर आधिपत्य प्रदान किया है। चुनाँचे उसे यह अधिकार है कि वह 'क़िसास' के तौर पर हत्यारे को क़त्ल करने का मुतालबा करे, या मुआवज़े के बिना क्षमा कर दे, या दियत (खून की क़ीमत) लेकर क्षमा करे। परंतु वह उस सीमा से आगे न बढ़े, जो अल्लाह ने उसके लिए वैध ठहराया है, जैसे कि हत्यारे के अंगों को काटना, या उसने जिस (हथियार) से हत्या की है, उसके सिवा किसी अन्य चीज़ से हत्या करना, या हत्यारे के अलावा किसी और व्यक्ति की हत्या करना। निश्चित रूप से वह समर्थित और मदद किया हुआ है।
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