सूरह 17 · जुज़ 15

Al-Isra · 17:110

قُلِ ادْعُوا اللَّهَ أَوِ ادْعُوا الرَّحْمَٰنَ ۖ أَيًّا مَا تَدْعُوا فَلَهُ الْأَسْمَاءُ الْحُسْنَىٰ ۚ وَلَا تَجْهَرْ بِصَلَاتِكَ وَلَا تُخَافِتْ بِهَا وَابْتَغِ بَيْنَ ذَٰلِكَ سَبِيلًا

हे नबी! आप कह दें कि (अल्लाह) कहकर पुकारो अथवा (रह़मान) कहकर पुकारो, जिस नाम से भी पुकारो, उसके सभी नाम शुभ[1] हैं और (हे नबी!) नमाज़ में स्वर न तो ऊँचा करो और न उसे नीचा करो और इन दोनों के बीच की राह[2] अपनाओ।
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1. अरब में "अल्लाह" शब्द प्रचलित था, मगर "रह़मान" प्रचलित न था। इस लिये, वह इस नाम पर आपत्ति करते थे। यह आयत इसी का उत्तर है। 2. ह़दीस में है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम (आरंभिक युग में) मक्का में छुप कर रहते थे। और जब अपने साथियों को ऊँचे स्वर में नमाज़ पढ़ाते थे तो मुश्रिक उसे सुन कर क़ुर्आन को तथा जिस ने क़ुर्आन उतारा है, और जो उसे लाया है, सब को गालियाँ देते थे। अतः अल्लाह ने अपने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को यह आदेश दिया। (सह़ीह़ बुख़ारी, ह़दीस संख्याः4722)

तफ़सीर

(ऐ रसूल!) जिसने आपके "या अल्लाह, या रहमान" कहकर पुकारने का खंडन किया है, आप उससे कह दीजिए : अल्लाह और रहमान दोनों ही उस महिमावान के नाम हैं। अतः तुम इन दोनों में से किसी नाम से या इनके अलावा उसके नामों में से किसी अन्य नाम से उसे पुकारो, उसके सभी नाम अच्छे हैं। और ये दोनों उन्हीं अच्छे नामों में से हैं। इसलिए तुम उसे इनके द्वारा अथवा इनके अलावा उसके अच्छे नामों में से किसी और से पुकारो। तथा आप अपनी नामज़ में क़ुरआन इतनी ऊँची आवाज़ से न पढ़ो कि मुश्रिक लोग सुन लें और न ही उसे इतनी धीमी आवाज़ से पढ़ो कि मोमिन लोग भी न सुन पाएँ। आप इन दोनों के बीच का रास्ता अपनाएँ।

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