सूरह 103 · जुज़ 30

Al-Asr · 103:2

إِنَّ الْإِنْسَانَ لَفِي خُسْرٍ

निःसंदेह, इन्सान क्षति में है।[1]
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1. (1-2) 'अस्र' का अर्थ निचोड़ना है। युग तथा संध्या के समय के भाग के लिये भी इस का प्रयोग होता है। और यहाँ इस का अर्थ युग और दिन निचड़ने का समय दोनों लिया जा सकता है। इस युग की गवाही इस बात पर पेश की गई है कि इन्सान जब तक ईमान (सत्य विश्वास) के गुणों को नहीं अपनाता विनाश से सुरक्षित नहीं रह सकता। इस लिये कि इन्सान के पास सब से मूल्यवान पूँजी समय है जो तेज़ी से गुज़रता है। इस लिये यदि वह परलोक का सामान न करे तो अवश्य क्षति में पड़ जायेगा।

तफ़सीर

निश्चय इनसान हानि और तबाही में है।

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