सूरह 10 · जुज़ 11

Yunus · 10:59

قُلْ أَرَأَيْتُمْ مَا أَنْزَلَ اللَّهُ لَكُمْ مِنْ رِزْقٍ فَجَعَلْتُمْ مِنْهُ حَرَامًا وَحَلَالًا قُلْ آللَّهُ أَذِنَ لَكُمْ ۖ أَمْ عَلَى اللَّهِ تَفْتَرُونَ

(हे नबी!) उनसे कहोः क्या तुमने इसपर विचार किया है कि अल्लाह ने तुम्हारे लिए, जो जीविका उतारी है, तुमने उसमें से कुछ को ह़राम (अवैध) बना दिया है और कुछ को ह़लाल (वैध) , तो कहो कि क्या अल्लाह ने तुम्हें इसकी अनुमति दी है? अथवा तुम अल्लाह पर आरोप लगा रहे[1] हो?
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1. आयत का भावार्थ यह है कि किसी चीज़ को वर्जित करने का अधिकार केवल अल्लाह को है। अपने विचार से किसी चीज़ को अवैध करना अल्लाह पर मिथ्या आरोप लगाना है।

तफ़सीर

(ऐ रसूल!) आप इन मुश्रिकों (बहुदेववादियों) से कह दें : मुझे इस बारे में बताओ कि अल्लाह ने जो रोज़ी उतारकर तुमपर उपकार किया है, फिर तुमने उसमें अपनी इच्छाओं से काम लेते हुए कुछ को हराम ठहरा लिया है और कुछ को हलाल। आप उनसे पूछें : क्या जिन चीज़ों को तुमने हलाल ठहराया है, उन्हें हलाल ठहराने तथा जिन चीज़ों को तुमने हराम ठहराया है, उन्हें हराम ठहराने की अल्लाह ने तुम्हें अनुमति प्रदान की है, या तुम लोग अल्लाह पर झूठ गढ़ते हो?!

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