Al-Mujadila

سورة المجادلة

सूरह 58 · मदनी · 22 आयतें

58:1जुज़ 28 · पृ. 542

قَدْ سَمِعَ اللَّهُ قَوْلَ الَّتِي تُجَادِلُكَ فِي زَوْجِهَا وَتَشْتَكِي إِلَى اللَّهِ وَاللَّهُ يَسْمَعُ تَحَاوُرَكُمَا ۚ إِنَّ اللَّهَ سَمِيعٌ بَصِيرٌ1

(हे नबी!) अल्लाह ने सुन ली है उस स्त्री की बात, जो आपसे झगड़ रही थी अपने पति के विषय में तथा गुहार रही थी अल्लाह को और अल्लाह सुन रहा था तुम दोनों का वार्तालाप, वास्तव में, वह सब कुछ सुनने-देखने वाला है।
58:2जुज़ 28 · पृ. 542

الَّذِينَ يُظَاهِرُونَ مِنْكُمْ مِنْ نِسَائِهِمْ مَا هُنَّ أُمَّهَاتِهِمْ ۖ إِنْ أُمَّهَاتُهُمْ إِلَّا اللَّائِي وَلَدْنَهُمْ ۚ وَإِنَّهُمْ لَيَقُولُونَ مُنْكَرًا مِنَ الْقَوْلِ وَزُورًا ۚ وَإِنَّ اللَّهَ لَعَفُوٌّ غَفُورٌ2

जो ज़िहार[1] करते हैं तुममें से अपनी पत्नियों से, तो वे उनकी माँ नहीं हैं। उनकी माँ तो वे हैं, जिन्होंने उनहें जन्म दिया है और वह बोलते हैं अप्रिय तथा झूठी बात और वास्तव में अल्लाह माफ़ करने वाला, क्षमाशील है।
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1. ज़िहार का अर्थ है पति का अपनी पत्नी से यह कहना कि तू मुझ पर मेरी माँ की पीठ के समान है। इस्लाम से पूर्व अरब समाज में यह कुरीति थी कि पति अपनी पत्नी से यह कह देता तो पत्नी को तलाक़ हो जाती थी। और सदा के लिये पति से विलग हो जाती थी। और इस का नाम 'ज़िहार' था। इस्लाम में एक स्त्री जिस का नाम ख़ौला (रज़ियल्लाहु अन्हा) है उस से उस के पति औस पुत्र सामित (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने ज़िहार कर लिया। ख़ौला (रज़ियल्लाहु अन्हा) नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास आई। और आप से इस विषय में झगड़ने लगी। उस पर यह आयतें उतरीं। (सह़ीह़ अबूदाऊदः 2214)। आइशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) ने कहाः मैं उस की बात नहीं सुन सकी। और अल्लाह ने सुन ली। (इब्ने माजाः 156, यह ह़दीस सह़ीह़ है।)
58:3जुज़ 28 · पृ. 542

وَالَّذِينَ يُظَاهِرُونَ مِنْ نِسَائِهِمْ ثُمَّ يَعُودُونَ لِمَا قَالُوا فَتَحْرِيرُ رَقَبَةٍ مِنْ قَبْلِ أَنْ يَتَمَاسَّا ۚ ذَٰلِكُمْ تُوعَظُونَ بِهِ ۚ وَاللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ خَبِيرٌ3

और जो ज़िहार कर लेते हैं अपनी पत्नियों से, फिर वापस लेना चाहते हैं अपनी बात, तो (उसका दण्ड) एक दास मुक्त करना है, इससे पूर्व कि एक-दूसरे को हाथ लगायें।[1] इसीकी तुम्हें शिक्षा दी जा रही है और अल्लाह उससे जो तुम करते हो, भली-भाँति सूचित है।
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1. हाथ लगाने का अर्थ संभोग करना है। अर्थात संभोग से पहले प्रायश्चित चुका दे।
58:4जुज़ 28 · पृ. 542

فَمَنْ لَمْ يَجِدْ فَصِيَامُ شَهْرَيْنِ مُتَتَابِعَيْنِ مِنْ قَبْلِ أَنْ يَتَمَاسَّا ۖ فَمَنْ لَمْ يَسْتَطِعْ فَإِطْعَامُ سِتِّينَ مِسْكِينًا ۚ ذَٰلِكَ لِتُؤْمِنُوا بِاللَّهِ وَرَسُولِهِ ۚ وَتِلْكَ حُدُودُ اللَّهِ ۗ وَلِلْكَافِرِينَ عَذَابٌ أَلِيمٌ4

फिर जो (दास) न पाये, तो दो महीने निरन्तर रोज़ा (व्रत) रखना है, इससे पूर्व की एक-दूसरे को हाथ लगाये। फिर जो सकत न रखे, तो साठ निर्धनों को भोजन कराना है। ये आदेश इसलिए है, ताकि तुम ईमान लाओ अल्लाह तथा उसके रसूल पर और ये अल्लाह की सीमायें हैं तथा काफ़िरों के लिए दुःखदायी यातना है।
58:5जुज़ 28 · पृ. 542

إِنَّ الَّذِينَ يُحَادُّونَ اللَّهَ وَرَسُولَهُ كُبِتُوا كَمَا كُبِتَ الَّذِينَ مِنْ قَبْلِهِمْ ۚ وَقَدْ أَنْزَلْنَا آيَاتٍ بَيِّنَاتٍ ۚ وَلِلْكَافِرِينَ عَذَابٌ مُهِينٌ5

वास्तव में, जो विरोध करते हैं अल्लाह तथा उसके रसूल का, वे अपमानित कर दिये जायेंगे, जैसे अपमानित कर दिये गये, जो इनसे पूर्व हुए और हमने उतार दी हैं खुली आयतें और काफ़िरों के लिए अपमानकारी यातना है।
58:6जुज़ 28 · पृ. 542

يَوْمَ يَبْعَثُهُمُ اللَّهُ جَمِيعًا فَيُنَبِّئُهُمْ بِمَا عَمِلُوا ۚ أَحْصَاهُ اللَّهُ وَنَسُوهُ ۚ وَاللَّهُ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ شَهِيدٌ6

जिस दिन जीवित करेगा उन सब को अल्लाह, तो उन्हें सूचित कर देगा उनके कर्मों से। गिन रखा है उसे अल्लाह ने और वह भूल गये हैं उसे और अल्लह प्रत्येक वस्तु पर गवाह है।
58:7जुज़ 28 · पृ. 543

أَلَمْ تَرَ أَنَّ اللَّهَ يَعْلَمُ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ ۖ مَا يَكُونُ مِنْ نَجْوَىٰ ثَلَاثَةٍ إِلَّا هُوَ رَابِعُهُمْ وَلَا خَمْسَةٍ إِلَّا هُوَ سَادِسُهُمْ وَلَا أَدْنَىٰ مِنْ ذَٰلِكَ وَلَا أَكْثَرَ إِلَّا هُوَ مَعَهُمْ أَيْنَ مَا كَانُوا ۖ ثُمَّ يُنَبِّئُهُمْ بِمَا عَمِلُوا يَوْمَ الْقِيَامَةِ ۚ إِنَّ اللَّهَ بِكُلِّ شَيْءٍ عَلِيمٌ7

क्या आपने नहीं देखा कि अल्लाह जानता है, जो (भी) आकाशों तथा धरती में है? नहीं होती किसी तीन की काना-फूसी, परन्तु वह उनका चौथा होता है और न पाँच की, परन्तु वह उनका छठा होता है और न इससे कम की और न इससे अधिक की, परन्तु वह उनके साथ होता[1] है, वे जहाँ भी हों। फिर वह उन्हें सूचित कर देगा उनके कर्मों से प्रलय के दिन। वास्तव में, अल्लाह प्रत्येक वस्तु से भली-भाँति अवगत है।
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1. अर्थात जानता और सुनता है।
58:8जुज़ 28 · पृ. 543

أَلَمْ تَرَ إِلَى الَّذِينَ نُهُوا عَنِ النَّجْوَىٰ ثُمَّ يَعُودُونَ لِمَا نُهُوا عَنْهُ وَيَتَنَاجَوْنَ بِالْإِثْمِ وَالْعُدْوَانِ وَمَعْصِيَتِ الرَّسُولِ وَإِذَا جَاءُوكَ حَيَّوْكَ بِمَا لَمْ يُحَيِّكَ بِهِ اللَّهُ وَيَقُولُونَ فِي أَنْفُسِهِمْ لَوْلَا يُعَذِّبُنَا اللَّهُ بِمَا نَقُولُ ۚ حَسْبُهُمْ جَهَنَّمُ يَصْلَوْنَهَا ۖ فَبِئْسَ الْمَصِيرُ8

क्या आपने नहीं देखा उन्हें, जो रोके गये हैं काना-फूसी[1] से? फिर (भी) वही करते हैं जिससे रोके गये हैं तथा काना-फूसी करते हैं पाप और अत्याचार तथा रसूल की अवज्ञा की और वे जब आपके पास आते हैं, तो आपको ऐसे (शब्द से) सलाम करते हैं, जिससे आपपर सलाम नहीं भेजा अल्लाह ने तथा कहते हैं अपने मनों में: क्यों अल्लाह हमें यातना नहीं देता उसपर जो हम कहते[1] हैं? पर्याप्त है उन्हें नरक, जिसमें वे प्रवेश करेंगे, तो बुरा है उनका ठिकाना।
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1. इन से अभिप्राय मुनाफ़िक़ हैं। क्योंकि उन की काना फूसी बुराई के लिये होती थी। (देखियेः सूरह निसा, आयतः 144)। 2. मुनाफ़िक़ और यहूदी जब नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की सेवा में आते तो "अस्सलामो अलैकुम" (अनुवादः आप पर सलाम और शान्ति हो) की जगह "अस्सामो अलैकुम" (अनुवादः आप पर मौत आये।) कहते थे। और अपने मन में यह सोचते थे कि यदि आप अल्लाह के सच्चे रसूल होते तो हमारे इस दुराचार के कारण हम पर यातना आ जाती। और जब कोई यातना नहीं आई तो आप अल्लाह के रसूल नहीं हो सकते। ह़दीस में है कि यहूदी तुम को सलाम करें तो वह "अस्सामो अलैका" कहते हैं, तो तुम "व अलैका" कहो। अर्थात और तुम पर भी। (सह़ीह़ बुख़ारीः 6257, सह़ीह़ मुस्लिमः 2164)।
58:9जुज़ 28 · पृ. 543

يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا إِذَا تَنَاجَيْتُمْ فَلَا تَتَنَاجَوْا بِالْإِثْمِ وَالْعُدْوَانِ وَمَعْصِيَتِ الرَّسُولِ وَتَنَاجَوْا بِالْبِرِّ وَالتَّقْوَىٰ ۖ وَاتَّقُوا اللَّهَ الَّذِي إِلَيْهِ تُحْشَرُونَ9

हे लोगो जो ईमान लाये हो! जब तुम काना-फूसी करो, तो काना-फूसी न करो पाप तथा अत्याचार एवं रसूल की अवज्ञा की और काना फूसी करो पुण्य तथा सदाचार की और डरते रहो अल्लाह से, जिसकी ओर ही तुम एकत्र किये जोओगे।
58:10जुज़ 28 · पृ. 543

إِنَّمَا النَّجْوَىٰ مِنَ الشَّيْطَانِ لِيَحْزُنَ الَّذِينَ آمَنُوا وَلَيْسَ بِضَارِّهِمْ شَيْئًا إِلَّا بِإِذْنِ اللَّهِ ۚ وَعَلَى اللَّهِ فَلْيَتَوَكَّلِ الْمُؤْمِنُونَ10

वास्तव में, काना-फूसी शैतानी काम हैं, ताकि वो उदासीन हों,[1] जो ईमान लाये। जबकि नहीं है वह हानिकर उन्हें कुछ, परन्तु अल्लाह की अनुमति से और अल्लाह ही पर चाहिये कि भरोसा करें ईमान वाले।
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2. ह़दीस में है कि जब तुम तीन एक साथ रहो तो दो आपस में काना फूसी न करें। क्योंकि इस से तीसरे को दुःख होता है। (सह़ीह़ बुख़ारीः 6290, सह़ीह़ मुस्लिमः 2184)
58:11जुज़ 28 · पृ. 543

يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا إِذَا قِيلَ لَكُمْ تَفَسَّحُوا فِي الْمَجَالِسِ فَافْسَحُوا يَفْسَحِ اللَّهُ لَكُمْ ۖ وَإِذَا قِيلَ انْشُزُوا فَانْشُزُوا يَرْفَعِ اللَّهُ الَّذِينَ آمَنُوا مِنْكُمْ وَالَّذِينَ أُوتُوا الْعِلْمَ دَرَجَاتٍ ۚ وَاللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ خَبِيرٌ11

हे ईमान वालो! जब तुमसे कहा जाये कि विस्तार कर दो अपनी सभाओं में, तो विस्तार[1] कर दो, विस्तार कर देगा अल्लाह तुम्हारे लिए तथा जब कहा जाये कि सुकड़ जाओ, तो सुकड़ जाओ। ऊँचा[2] कर देगा अल्लाह उन्हें, जो ईमान लाये हैं तुममें से तथा जिन्हें ज्ञान प्रदान किया गया है, कई श्रेणियाँ तथा अल्लाह उससे जो तुम करते हो, भली-भाँति अवगत है।
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1. भावार्थ यह है कि कोई आये तो उसे भी खिसक कर और आपस में सुकड़ कर जगह दो। 2. ह़दीस में है कि जो अल्लाह के लिये झुकता और अच्छा व्यवहार चयन करता है तो अल्लाह उसे ऊँचा कर देता है। (सह़ीह़ मुस्लिमः 2588)
58:12जुज़ 28 · पृ. 544

يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا إِذَا نَاجَيْتُمُ الرَّسُولَ فَقَدِّمُوا بَيْنَ يَدَيْ نَجْوَاكُمْ صَدَقَةً ۚ ذَٰلِكَ خَيْرٌ لَكُمْ وَأَطْهَرُ ۚ فَإِنْ لَمْ تَجِدُوا فَإِنَّ اللَّهَ غَفُورٌ رَحِيمٌ12

हे ईमान वालो! जब तुम अकेले बात करो रसूल से, तो बात करने से पहले कुछ दान करो।[1] ये तुम्हारे लिए उत्तम तथा अधिक पवित्र है। फिर यदि तुम (दान के लिए कुछ) न पाओ, तो अल्लाह अति क्षमाशील, दयावान् है।
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1. प्रत्येक मुसलमान नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से एकांत में बात करना चाहता था। जिस से आप को परेशानी होती थी। इस लिये यह आदेश दिया गया।
58:13जुज़ 28 · पृ. 544

أَأَشْفَقْتُمْ أَنْ تُقَدِّمُوا بَيْنَ يَدَيْ نَجْوَاكُمْ صَدَقَاتٍ ۚ فَإِذْ لَمْ تَفْعَلُوا وَتَابَ اللَّهُ عَلَيْكُمْ فَأَقِيمُوا الصَّلَاةَ وَآتُوا الزَّكَاةَ وَأَطِيعُوا اللَّهَ وَرَسُولَهُ ۚ وَاللَّهُ خَبِيرٌ بِمَا تَعْمَلُونَ13

क्या तुम (इस आदेश से) डर गये कि एकान्त में बात करने से पहले कुछ दान कर दो? फिर जब तुमने ऐसा नहीं किया, तो स्थापना करो नमाज़ की तथा ज़कात दो और आज्ञा पालन करो अल्लाह तथा उसके रसूल की और अल्लाह सूचित है उससे, जो कुछ तुम कर रहे हो।
58:14जुज़ 28 · पृ. 544

۞ أَلَمْ تَرَ إِلَى الَّذِينَ تَوَلَّوْا قَوْمًا غَضِبَ اللَّهُ عَلَيْهِمْ مَا هُمْ مِنْكُمْ وَلَا مِنْهُمْ وَيَحْلِفُونَ عَلَى الْكَذِبِ وَهُمْ يَعْلَمُونَ14

क्या आपने उन्हें देखा[1] जिन्होंने मित्र बना लिया उस समुदाय को, जिसपर क्रोधित हो गया अल्लाह? न वे तुम्हारे हैं और न उनके और वे शपथ लेते हैं झूठी बात पर, जान-बूझ कर।
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1. इस से संकेत मुनाफ़िक़ों की ओर है जिन्होंने यहूदियों को अपना मित्र बना रखा था।
58:15जुज़ 28 · पृ. 544

أَعَدَّ اللَّهُ لَهُمْ عَذَابًا شَدِيدًا ۖ إِنَّهُمْ سَاءَ مَا كَانُوا يَعْمَلُونَ15

तैयार की है अल्लाह ने उनके लिए कड़ी यातना, वास्तव में, वह बुरा है, जो वे कर रहे हैं।
58:16जुज़ 28 · पृ. 544

اتَّخَذُوا أَيْمَانَهُمْ جُنَّةً فَصَدُّوا عَنْ سَبِيلِ اللَّهِ فَلَهُمْ عَذَابٌ مُهِينٌ16

उन्होंने बना लिया अपनी शपथों को एक ढाल। फिर रोक दिया (लोगों को) अल्लाह की रोह से, तो उन्हीं के लिए अपमानकारी यातना है।
58:17जुज़ 28 · पृ. 544

لَنْ تُغْنِيَ عَنْهُمْ أَمْوَالُهُمْ وَلَا أَوْلَادُهُمْ مِنَ اللَّهِ شَيْئًا ۚ أُولَٰئِكَ أَصْحَابُ النَّارِ ۖ هُمْ فِيهَا خَالِدُونَ17

कदापि नहीं काम आयेंगे उनके धन और न उनकी संतान अल्लाह के समक्ष कुछ। वही नारकी हैं, वे उसमें सदावासी होंगे।
58:18जुज़ 28 · पृ. 544

يَوْمَ يَبْعَثُهُمُ اللَّهُ جَمِيعًا فَيَحْلِفُونَ لَهُ كَمَا يَحْلِفُونَ لَكُمْ ۖ وَيَحْسَبُونَ أَنَّهُمْ عَلَىٰ شَيْءٍ ۚ أَلَا إِنَّهُمْ هُمُ الْكَاذِبُونَ18

जिस दिन खड़ा करेगा उन्हें अल्लाह, तो वे शपथ लेंगे अल्लाह के समक्ष, जैसे वे शपथ ले रहे हैं तुम्हारे समक्ष और वे समझ रहे हैं कि वे कुछ (तर्क)[1] पर हैं। सुन लो! वास्तव में वही झूठे हैं।
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1. अर्थात उन्हें अपनी शपथ का कुछ लाभ मिल जायेगा जैसे दुनिया में मिलता रहा।
58:19जुज़ 28 · पृ. 544

اسْتَحْوَذَ عَلَيْهِمُ الشَّيْطَانُ فَأَنْسَاهُمْ ذِكْرَ اللَّهِ ۚ أُولَٰئِكَ حِزْبُ الشَّيْطَانِ ۚ أَلَا إِنَّ حِزْبَ الشَّيْطَانِ هُمُ الْخَاسِرُونَ19

छा[1] गया है उनपर शैतान और भुला दी है उन्हें अल्लाह की याद। यही शैतान की सेना है। सुन लो! शैतान की सेना ही क्षतिग्रस्त होने वाली है।
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1. अर्थात उन को अपने नियंत्रण में ले रखा है।
58:20जुज़ 28 · पृ. 544

إِنَّ الَّذِينَ يُحَادُّونَ اللَّهَ وَرَسُولَهُ أُولَٰئِكَ فِي الْأَذَلِّينَ20

वास्तव में, जो विरोध करते हैं अल्लाह तथा उसके रसूल का, वही अपमानितों में से हैं।
58:21जुज़ 28 · पृ. 544

كَتَبَ اللَّهُ لَأَغْلِبَنَّ أَنَا وَرُسُلِي ۚ إِنَّ اللَّهَ قَوِيٌّ عَزِيزٌ21

लिख रखा है अल्लाह ने कि अवश्य मैं प्रभावशाली (विजयी) रहूँगा[1] तथा मेरे रसूल। वास्तव में, अल्लाह अति शक्तिशाली, प्रभावशाली है।
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1. (देखियेः सूरह मुमिन, आयतः 51-52)
58:22जुज़ 28 · पृ. 545

لَا تَجِدُ قَوْمًا يُؤْمِنُونَ بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الْآخِرِ يُوَادُّونَ مَنْ حَادَّ اللَّهَ وَرَسُولَهُ وَلَوْ كَانُوا آبَاءَهُمْ أَوْ أَبْنَاءَهُمْ أَوْ إِخْوَانَهُمْ أَوْ عَشِيرَتَهُمْ ۚ أُولَٰئِكَ كَتَبَ فِي قُلُوبِهِمُ الْإِيمَانَ وَأَيَّدَهُمْ بِرُوحٍ مِنْهُ ۖ وَيُدْخِلُهُمْ جَنَّاتٍ تَجْرِي مِنْ تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ خَالِدِينَ فِيهَا ۚ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُمْ وَرَضُوا عَنْهُ ۚ أُولَٰئِكَ حِزْبُ اللَّهِ ۚ أَلَا إِنَّ حِزْبَ اللَّهِ هُمُ الْمُفْلِحُونَ22

आप नहीं पायेंगे उन्हें, जो ईमान रखते हों अल्लाह तथा अन्त-दिवस (प्रलय) पर कि वे मैत्री करते हों उनसे, जिन्होंने विरोध किया अल्लाह और उसके रसूल का, चाहे वे उनके पिता हों, उनके पुत्र, उनके भाई अथवा उनके परिजन[1] हों। वही हैं, लिख दिया है (अल्लाह ने) जिनके दिलों में ईमान और समर्थन दिया है जिन्हें अपनी ओर से रूह़ (आत्मा) द्वारा तथा प्रवेश देगा उन्हें ऐसे स्वर्गों में, बहती हैं जिनमें नहरें, वे सदावासी होंगे जिनमें। प्रसन्न हो गया अल्लाह उनसे तथा वे प्रसन्न हो गये उससे। वह अल्लाह का समूह है। सुन लो, अल्लाह का समूह ही सफल होने वाला है।
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1. इस आयत में इस बात का वर्णन किया गया है कि ईमान, और काफ़िर जो इस्लाम और मुसलमानों के जानी दुश्मन हों उन से सच्ची मैत्री करना एकत्र नहीं हो सकते। अतः जो इस्लाम और इस्लाम के विरोधियों से एक साथ सच्चे सम्बंध रखते हों तो उन का ईमान सत्य नहीं है।

सूरह के आरंभ से चलाएँ