إِذَا السَّمَاءُ انْشَقَّتْ1
Al-Inshiqaq
سورة الإنشقاق
सूरह 84 · मक्की · 25 आयतें
وَأَذِنَتْ لِرَبِّهَا وَحُقَّتْ2
وَإِذَا الْأَرْضُ مُدَّتْ3
وَأَلْقَتْ مَا فِيهَا وَتَخَلَّتْ4
وَأَذِنَتْ لِرَبِّهَا وَحُقَّتْ5
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1. (1-5) इन आयतों में प्रलय के समय आकाश एवं धरती में जो हलचल होगी उस का चित्रण करते हुये यह बताया गया है कि इस विश्व के विधाता के आज्ञानुसार यह आकाश और धरती कार्यरत हैं और प्रलय के समय भी उसी की आज्ञा का पालन करेंगे। धरती को फैलाने का अर्थ यह है कि पर्वत आदि खण्ड-खण्ड हो कर समस्त भूमि चौरस कर दी जायेगी।
يَا أَيُّهَا الْإِنْسَانُ إِنَّكَ كَادِحٌ إِلَىٰ رَبِّكَ كَدْحًا فَمُلَاقِيهِ6
فَأَمَّا مَنْ أُوتِيَ كِتَابَهُ بِيَمِينِهِ7
فَسَوْفَ يُحَاسَبُ حِسَابًا يَسِيرًا8
وَيَنْقَلِبُ إِلَىٰ أَهْلِهِ مَسْرُورًا9
وَأَمَّا مَنْ أُوتِيَ كِتَابَهُ وَرَاءَ ظَهْرِهِ10
فَسَوْفَ يَدْعُو ثُبُورًا11
وَيَصْلَىٰ سَعِيرًا12
إِنَّهُ كَانَ فِي أَهْلِهِ مَسْرُورًا13
إِنَّهُ ظَنَّ أَنْ لَنْ يَحُورَ14
بَلَىٰ إِنَّ رَبَّهُ كَانَ بِهِ بَصِيرًا15
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1. (6-15) इन आयतों में इन्सान को सावधान किया गया है कि तुझे भी अपने पालनहार से मिलना है। और धीरे-धीरे उसी की ओर जा रहा है। वहाँ अपने कर्मानुसार जिसे दायें हाथ में कर्म पत्र मिलेगा वह अपनों से प्रसन्न हो कर मिलेगा। और जिस को बायें हाथ में कर्म पत्र दिया जायेगा तो वह विनाश को पुकारेगा। यह वही होगा जिस ने मायामोह में क़ुर्आन को नकार दिया था। और सोचा कि इस संसारिक जीवन के पश्चात कोई जीवन नहीं आयेगा।
فَلَا أُقْسِمُ بِالشَّفَقِ16
وَاللَّيْلِ وَمَا وَسَقَ17
وَالْقَمَرِ إِذَا اتَّسَقَ18
لَتَرْكَبُنَّ طَبَقًا عَنْ طَبَقٍ19
فَمَا لَهُمْ لَا يُؤْمِنُونَ20
وَإِذَا قُرِئَ عَلَيْهِمُ الْقُرْآنُ لَا يَسْجُدُونَ ۩21
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1. (16-21) इन आयतों में विश्व के कुछ लक्षणों को साक्ष्य स्वरूप परस्तुत कर के सावधान किया गया है कि जिस प्रकार यह विश्व तीन स्थितियों से गुज़रता है इसी प्रकार तुम्हें भी तीन स्थितियों से गुज़रना हैः संसारिक जीवन, फिर मरण, फिर परलोक का स्थायी जीवन जिस का सुख दुःख संसारिक कर्मों के आधार पर होगा।
بَلِ الَّذِينَ كَفَرُوا يُكَذِّبُونَ22
وَاللَّهُ أَعْلَمُ بِمَا يُوعُونَ23
فَبَشِّرْهُمْ بِعَذَابٍ أَلِيمٍ24
إِلَّا الَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ لَهُمْ أَجْرٌ غَيْرُ مَمْنُونٍ25
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1. (22-25) इन आयतों में उन के लिये चेतावनी है जो इन स्वभाविक साक्ष्यों के होते हुये क़ुर्आन को न मानने पर अड़े हुये हैं। और उन के लिये शूभ सूचना है जो इसे मान कर विश्वास (ईमान) तथा सुकर्म की राह पर अग्रसर हैं।