Al-Anbiya

سورة الأنبياء

सूरह 21 · मक्की · 112 आयतें

21:1जुज़ 17 · पृ. 322

اقْتَرَبَ لِلنَّاسِ حِسَابُهُمْ وَهُمْ فِي غَفْلَةٍ مُعْرِضُونَ1

समीप आ गया है लोगों के ह़साब[1] का समय, जबकि वे अचेतना में मुँह फेरे हुए हैं।
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1. अर्थात प्रलय का समय, फिर भी लोग उस से अचेत माया मोह में लिप्त हैं।
21:2जुज़ 17 · पृ. 322

مَا يَأْتِيهِمْ مِنْ ذِكْرٍ مِنْ رَبِّهِمْ مُحْدَثٍ إِلَّا اسْتَمَعُوهُ وَهُمْ يَلْعَبُونَ2

नहीं आती उनके पास, उनके पालनहार की ओर से कोई नई शिक्षा[1], परन्तु उसे सुनते हैं और खेलते रह जाते हैं।
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1. अर्थात क़ुर्आन की कोई आयत अवतरित होती है तो उस में चिन्तन और विचार नहीं करते।
21:3जुज़ 17 · पृ. 322

لَاهِيَةً قُلُوبُهُمْ ۗ وَأَسَرُّوا النَّجْوَى الَّذِينَ ظَلَمُوا هَلْ هَٰذَا إِلَّا بَشَرٌ مِثْلُكُمْ ۖ أَفَتَأْتُونَ السِّحْرَ وَأَنْتُمْ تُبْصِرُونَ3

निश्चेत हैं उनके दिल और उन्होंने चुपके-चुपके आपस में बातें कीं, जो अत्याचारी हो गयेः ये (नबी) तो बस एक पुरुष है तुम्हारे समान, तो क्या तुम जादू के पास जाते हो, जबकि तुम देखते हो[1]?
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1. अर्थात यह कि वह तुम्हारे जैसा मनुष्य है, अतः इस का जो भी प्रभाव है वह जादू के कारण है।
21:4जुज़ 17 · पृ. 322

قَالَ رَبِّي يَعْلَمُ الْقَوْلَ فِي السَّمَاءِ وَالْأَرْضِ ۖ وَهُوَ السَّمِيعُ الْعَلِيمُ4

आप कह दें कि मेरा पालनहार जानता है प्रत्येक बात को, जो आकाश तथा धरती में है और वह सब सुनने-जानने वाला है।
21:5जुज़ 17 · पृ. 322

بَلْ قَالُوا أَضْغَاثُ أَحْلَامٍ بَلِ افْتَرَاهُ بَلْ هُوَ شَاعِرٌ فَلْيَأْتِنَا بِآيَةٍ كَمَا أُرْسِلَ الْأَوَّلُونَ5

बल्कि उन्होंने कह दिया कि ये[1] बिखरे स्वप्न हैं। बल्कि उस (नबी) ने इसे स्वयं बना लिया है, बल्कि वह कवि है! अन्यथा उसे चाहिए कि हमारे पास कोई निशानी ले आये, जैसे पूर्व के रसूल (निशानियों के साथ) भेजे गये।
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1. अर्थात क़ुर्आन की आयतें।
21:6जुज़ 17 · पृ. 322

مَا آمَنَتْ قَبْلَهُمْ مِنْ قَرْيَةٍ أَهْلَكْنَاهَا ۖ أَفَهُمْ يُؤْمِنُونَ6

नहीं ईमान[1] लायी इनसे पहले कोई बस्ती, जिसका हमने विनाश किया, तो क्या ये ईमान लायेंगे?
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1. अर्थात निशानियाँ देख कर भी ईमान नहीं लायी।
21:7जुज़ 17 · पृ. 322

وَمَا أَرْسَلْنَا قَبْلَكَ إِلَّا رِجَالًا نُوحِي إِلَيْهِمْ ۖ فَاسْأَلُوا أَهْلَ الذِّكْرِ إِنْ كُنْتُمْ لَا تَعْلَمُونَ7

और (हे नबी!) हमने आपसे पहले मनुष्य पुरुषों को ही रसूल बनाकर भेजा, जिनकी ओर वह़्यी भेजते रहे। फिर तुम ज्ञानियों[1] से पूछ लो, यदि तुम (स्वयं) नहीं[2] जानते हो।
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1. अर्थात आदि आकाशीय पुस्तकों के ज्ञानियों से। 2. देखियेः सूरह नह़्ल, आयतः43
21:8जुज़ 17 · पृ. 322

وَمَا جَعَلْنَاهُمْ جَسَدًا لَا يَأْكُلُونَ الطَّعَامَ وَمَا كَانُوا خَالِدِينَ8

तथा नहीं बनाये हमने उनके ऐसे शरीर,[1] जो भोजन न करते हों तथा न वे सदावासी थे।
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1. अर्थात उन में मनुष्य की ही सब विशेषतायें थीं।
21:9जुज़ 17 · पृ. 322

ثُمَّ صَدَقْنَاهُمُ الْوَعْدَ فَأَنْجَيْنَاهُمْ وَمَنْ نَشَاءُ وَأَهْلَكْنَا الْمُسْرِفِينَ9

फिर हमने पूरे कर दिये, उनसे किये हुए वचन और हमने बचा लिया उन्हें और जिसे हमने चाहा और विनाश कर दिया उल्लंघनकारियों का।
21:10जुज़ 17 · पृ. 322

لَقَدْ أَنْزَلْنَا إِلَيْكُمْ كِتَابًا فِيهِ ذِكْرُكُمْ ۖ أَفَلَا تَعْقِلُونَ10

निःसंदेह, हमने उतार दी है तुम्हारी ओर एक पुस्तक (क़ुर्आन) जिसमें तुम्हारे लिए शिक्षा है। तो क्या तुम समझते नहीं हो?
21:11जुज़ 17 · पृ. 323

وَكَمْ قَصَمْنَا مِنْ قَرْيَةٍ كَانَتْ ظَالِمَةً وَأَنْشَأْنَا بَعْدَهَا قَوْمًا آخَرِينَ11

और हमने तोड़कर रख दिया बहुत सी बस्तियों को, जो अत्याचारी थीं और हमने पैदा कर दिया उनके पश्चात् दूसरी जाति को।
21:12जुज़ 17 · पृ. 323

فَلَمَّا أَحَسُّوا بَأْسَنَا إِذَا هُمْ مِنْهَا يَرْكُضُونَ12

फिर जब उन्हें संवेदन हो गया हमारे प्रकोप का, तो अकस्मात् वहाँ से भागने लगे।
21:13जुज़ 17 · पृ. 323

لَا تَرْكُضُوا وَارْجِعُوا إِلَىٰ مَا أُتْرِفْتُمْ فِيهِ وَمَسَاكِنِكُمْ لَعَلَّكُمْ تُسْأَلُونَ13

(कहा गया) भागो नहीं! तथा तुम वापस जाओ, जिस सुख-सुविधा में थे तथा अपने घरों की ओर, ताकि तुमसे पूछा[1] जाये।
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1. अर्थात यह कि यातना आने पर तुम्हारी क्या दशा हुयी?
21:14जुज़ 17 · पृ. 323

قَالُوا يَا وَيْلَنَا إِنَّا كُنَّا ظَالِمِينَ14

उन्होंने कहाःहाय हमारा विनाश! वास्वम में, हम अत्याचारी थे।
21:15जुज़ 17 · पृ. 323

فَمَا زَالَتْ تِلْكَ دَعْوَاهُمْ حَتَّىٰ جَعَلْنَاهُمْ حَصِيدًا خَامِدِينَ15

और फिर बराबर यही उनकी पुकार रही, यहाँतक कि हमने बना दिया उन्हें कटी खेती के समान बुझे हुए।
21:16जुज़ 17 · पृ. 323

وَمَا خَلَقْنَا السَّمَاءَ وَالْأَرْضَ وَمَا بَيْنَهُمَا لَاعِبِينَ16

औप हमने नहीं पैदा किया है आकाश और धरती को तथा जो कुछ दोनों के बीच है, खेल के लिए।
21:17जुज़ 17 · पृ. 323

لَوْ أَرَدْنَا أَنْ نَتَّخِذَ لَهْوًا لَاتَّخَذْنَاهُ مِنْ لَدُنَّا إِنْ كُنَّا فَاعِلِينَ17

यदि हम कोई खेल बनाना चाहते, तो उसे अपने पास ही से बना[1] लेते, यदि हमें ये करना होता।
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1. अर्थात इस विशाल विश्व को बनाने की आवश्यक्ता न थी। इस आयत में यह बताया जा रहा है कि इस विश्व को खेल नहीं बनाया गया है। यहाँ एक साधारण नियम काम कर रहा है। और वह सत्य और असत्य के बीच संघर्ष का नियम है। अर्थात यहाँ जो कुछ होता है वह सत्य की विजय और असत्य की पराजय के लिये होता है। और सत्य के आगे असत्य समाप्त हो कर रह जाता है।
21:18जुज़ 17 · पृ. 323

بَلْ نَقْذِفُ بِالْحَقِّ عَلَى الْبَاطِلِ فَيَدْمَغُهُ فَإِذَا هُوَ زَاهِقٌ ۚ وَلَكُمُ الْوَيْلُ مِمَّا تَصِفُونَ18

बल्कि हम मारते हैं सत्य से असत्य पर, तो वह उसका सिर कुचल देता है और वह अकस्मात समाप्त हो जाता है और तुम्हारे लिए विनाश है, उन बातों के कारण, जो तुम बनाते हो।
21:19जुज़ 17 · पृ. 323

وَلَهُ مَنْ فِي السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ ۚ وَمَنْ عِنْدَهُ لَا يَسْتَكْبِرُونَ عَنْ عِبَادَتِهِ وَلَا يَسْتَحْسِرُونَ19

और उसी का है, जो आकाशों तथा धरती में है और जो फ़रिश्ते उसके पास हैं, वे उसकी इबादत (वंदना) से अभिमान नहीं करते और न थकते हैं।
21:20जुज़ 17 · पृ. 323

يُسَبِّحُونَ اللَّيْلَ وَالنَّهَارَ لَا يَفْتُرُونَ20

वे रात और दिन उसकी पवित्रता का गान करते हैं तथा आलस्य नहीं करते।
21:21जुज़ 17 · पृ. 323

أَمِ اتَّخَذُوا آلِهَةً مِنَ الْأَرْضِ هُمْ يُنْشِرُونَ21

क्या इनके बनाये हुए पार्थिव पूज्य ऐसे हैं, जो (निर्जीव) को जीवित कर देते हैं?
21:22जुज़ 17 · पृ. 323

لَوْ كَانَ فِيهِمَا آلِهَةٌ إِلَّا اللَّهُ لَفَسَدَتَا ۚ فَسُبْحَانَ اللَّهِ رَبِّ الْعَرْشِ عَمَّا يَصِفُونَ22

यदि होते उन दोनों[1] में अन्य पूज्य, अल्लाह के सिवा, तो निश्चय दोनों की व्यवस्था बिगड़[2] जाती। अतः पवित्र है अल्लाह, अर्श (सिंहासन) का स्वामी, उन बातों से, जो वे बता रहे हैं।
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1. क्यों कि दोनों अपनी-अपनी शक्ति का प्रयोग करते और उन के आपस के संघर्ष के कारण इस विश्व की व्यवस्था छिन्न भिन्न हो जाती। अतः इस विश्व की व्यवस्था स्वयं बता रही है कि इस का स्वामी एक ही है। और वही अकेला पूज्य है।
21:23जुज़ 17 · पृ. 323

لَا يُسْأَلُ عَمَّا يَفْعَلُ وَهُمْ يُسْأَلُونَ23

वह उत्तर दायी नहीं है अपने कार्य का और सभी (उसके समक्ष) उत्तर दायी हैं।
21:24जुज़ 17 · पृ. 323

أَمِ اتَّخَذُوا مِنْ دُونِهِ آلِهَةً ۖ قُلْ هَاتُوا بُرْهَانَكُمْ ۖ هَٰذَا ذِكْرُ مَنْ مَعِيَ وَذِكْرُ مَنْ قَبْلِي ۗ بَلْ أَكْثَرُهُمْ لَا يَعْلَمُونَ الْحَقَّ ۖ فَهُمْ مُعْرِضُونَ24

क्या उन्होंने बना लिए हैं, उसके सिवा अनेक पूज्य? (हे नबी!) आप कहें कि अपना प्रमाण लाओ। ये (क़ुर्आन) उनके लिए शिक्षा है, जो मेरे साथ हैं और ये मुझसे पूर्व के लोगों की शिक्षा[1] है, बल्कि उनमें से अधिक्तर सत्य का ज्ञान नहीं रखते। इसी कारण, वे विमुख हैं।
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1. आयत का भावार्थ यह है कि यह क़ुर्आन है और यह तौरात तथा इंजील हैं। इन में कोई प्रमाण दिखा दो कि अल्लाह के अन्य साझी और पूज्य हैं। बल्कि यह मिश्रणवादी निर्मूल बातें कर रहे हैं।
21:25जुज़ 17 · पृ. 324

وَمَا أَرْسَلْنَا مِنْ قَبْلِكَ مِنْ رَسُولٍ إِلَّا نُوحِي إِلَيْهِ أَنَّهُ لَا إِلَٰهَ إِلَّا أَنَا فَاعْبُدُونِ25

और नहीं भेजा हमने आपसे पहले कोई भी रसूल, परन्तु उसकी ओर यही वह़्यी (प्रकाशना) करते रहे कि मेरे सिवा कोई पूज्य नहीं है। अतः मेरी ही इबादत (वंदना) करो।
21:26जुज़ 17 · पृ. 324

وَقَالُوا اتَّخَذَ الرَّحْمَٰنُ وَلَدًا ۗ سُبْحَانَهُ ۚ بَلْ عِبَادٌ مُكْرَمُونَ26

और उन (मुश्रिकों) ने कहा कि बना लिया है अत्यंत कृपाशील ने संतति। वह पवित्र है। बल्कि वे (फ़रिश्ते)[1] आदरणीय भक्त हैं।
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1. अर्थात अरब के मिश्रणवादी जिन फ़रिश्तों को अल्लाह की पुत्रियाँ कहते हैं, वास्तव में वह उस के भक्त तथा दास हैं।
21:27जुज़ 17 · पृ. 324

لَا يَسْبِقُونَهُ بِالْقَوْلِ وَهُمْ بِأَمْرِهِ يَعْمَلُونَ27

वे उसके समक्ष बढ़कर नहीं बोलते और उसके आदेशानुसार काम करते हैं।
21:28जुज़ 17 · पृ. 324

يَعْلَمُ مَا بَيْنَ أَيْدِيهِمْ وَمَا خَلْفَهُمْ وَلَا يَشْفَعُونَ إِلَّا لِمَنِ ارْتَضَىٰ وَهُمْ مِنْ خَشْيَتِهِ مُشْفِقُونَ28

वह जानता है, जो उनके सामने है और जो उनसे ओझल है। वह किसी की सिफ़ारिश नहीं करेंगे, उसके सिवा जिससे वह (अल्लाह) प्रसन्न[1] हो तथा वह उसके भय से सहमे रहते हैं।
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1. अर्थात जो एकेश्वरवादी होंगे।
21:29जुज़ 17 · पृ. 324

۞ وَمَنْ يَقُلْ مِنْهُمْ إِنِّي إِلَٰهٌ مِنْ دُونِهِ فَذَٰلِكَ نَجْزِيهِ جَهَنَّمَ ۚ كَذَٰلِكَ نَجْزِي الظَّالِمِينَ29

और जो कह दे उनमें से कि मैं पूज्य हूँ अल्लाह के सिवा, तो वही है, जिसे हम दण्ड देंगे नरक का, इसी प्रकार, हम दण्ड दिया करते हैं अत्याचारियों को।
21:30जुज़ 17 · पृ. 324

أَوَلَمْ يَرَ الَّذِينَ كَفَرُوا أَنَّ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ كَانَتَا رَتْقًا فَفَتَقْنَاهُمَا ۖ وَجَعَلْنَا مِنَ الْمَاءِ كُلَّ شَيْءٍ حَيٍّ ۖ أَفَلَا يُؤْمِنُونَ30

और क्या उन्होंने विचार नहीं किया, जो काफ़िर हो गये कि आकाश तथा धरती दोनों मिले हुए[1] थे, तो हमने दोनों को अलग-अलग किया तथा हमने बनाया पानी से प्रत्येक जीवित चीज़ को? फिर क्या वे (इस बात पर) विश्वास नहीं करते?
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1. अर्थात अपनी उतपत्ति के आरंभ में।
21:31जुज़ 17 · पृ. 324

وَجَعَلْنَا فِي الْأَرْضِ رَوَاسِيَ أَنْ تَمِيدَ بِهِمْ وَجَعَلْنَا فِيهَا فِجَاجًا سُبُلًا لَعَلَّهُمْ يَهْتَدُونَ31

और हमने बना दिये धरती में पर्वत, ताकि झुक न[1] जाये उनके साथ और बना दिये उन (पर्वतों) में चौड़े रास्ते, ताकि लोग राह पायें।
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1. अर्थात यह वर्वत न होते तो धरती सदा हिलती रहती।
21:32जुज़ 17 · पृ. 324

وَجَعَلْنَا السَّمَاءَ سَقْفًا مَحْفُوظًا ۖ وَهُمْ عَنْ آيَاتِهَا مُعْرِضُونَ32

और हमने बना दिया आकाश को सुरक्षित छत, फिर भी वे उसके प्रतीकों (निशानियों) से मुँह फेरे हुए हैं।
21:33जुज़ 17 · पृ. 324

وَهُوَ الَّذِي خَلَقَ اللَّيْلَ وَالنَّهَارَ وَالشَّمْسَ وَالْقَمَرَ ۖ كُلٌّ فِي فَلَكٍ يَسْبَحُونَ33

तथा वही है, जिसने उत्पत्ति की है रात्रि तथा दिवस की और सूर्य तथा चाँद की, प्रत्येक एक मण्डल में तैर रहे[1] हैं।
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1. क़ुर्आन अपनी शिक्षा में विश्व की व्यवस्था से एक के पूज्य होने का प्रमाण प्रस्तुत करता है। यहाँ भी आयतः 30 से 33 तक एक अल्लाह के पूज्य होने का प्रमाण प्रस्तुत किया गया है।
21:34जुज़ 17 · पृ. 324

وَمَا جَعَلْنَا لِبَشَرٍ مِنْ قَبْلِكَ الْخُلْدَ ۖ أَفَإِنْ مِتَّ فَهُمُ الْخَالِدُونَ34

और (हे नबी!) हमने नहीं बनायी है, किसी मनुष्य के लिए आपसे पहले नित्यता। तो यदि, आप मर[1] जायें, तो क्या वे नित्य जीवी हैं?
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1. जब मनुष्य किसी का विरोधी बन जाता है तो उस के मरण की कामना करता है। यही दशा मक्का के काफ़िरों की भी थी। वह आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के मरण की कामना कर रहे थे। फिर यह कहा गया है कि संसार के प्रत्येक जीव को मरना है। यह कोई बड़ी बात नहीं, बड़ी बात तो यह है कि अल्लाह इस संसार में सब के कर्मों की परीक्षा कर रहा है। और फिर सब को अपने कर्मों का फल भी परलोक में मिलना है तो कौन इस परीक्षा में सफल होता है?
21:35जुज़ 17 · पृ. 324

كُلُّ نَفْسٍ ذَائِقَةُ الْمَوْتِ ۗ وَنَبْلُوكُمْ بِالشَّرِّ وَالْخَيْرِ فِتْنَةً ۖ وَإِلَيْنَا تُرْجَعُونَ35

प्रत्येक जीव को मरण का स्वाद चखना है और हम तुम्हारी परीक्षा कर रहे हैं, अच्छी तथा बुरी परिस्थितियों से तथा तुम्हें हमारी ही ओर फिर आना है।
21:36जुज़ 17 · पृ. 325

وَإِذَا رَآكَ الَّذِينَ كَفَرُوا إِنْ يَتَّخِذُونَكَ إِلَّا هُزُوًا أَهَٰذَا الَّذِي يَذْكُرُ آلِهَتَكُمْ وَهُمْ بِذِكْرِ الرَّحْمَٰنِ هُمْ كَافِرُونَ36

तथा जब देखते हैं आपको, जो काफ़िर हो गये, तो बना लेते हैं आपको उपहास, (वे कहते हैं:) क्या यही है, जो तुम्हारे पूज्यों की चर्चा किया करता है? जबकि वे स्वयं रह़मान (अत्यंत कृपाशील) के स्मरण के[1] निवर्ती हैं।
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1. अर्थात अल्लाह को नहीं मानते।
21:37जुज़ 17 · पृ. 325

خُلِقَ الْإِنْسَانُ مِنْ عَجَلٍ ۚ سَأُرِيكُمْ آيَاتِي فَلَا تَسْتَعْجِلُونِ37

मनुष्य जन्मजात व्यग्र (अधीर) है, मैं शीघ्र तुम्हें अपनी निशानियाँ दिखा दूँगा। अतः, तुम जल्दी न करो।
21:38जुज़ 17 · पृ. 325

وَيَقُولُونَ مَتَىٰ هَٰذَا الْوَعْدُ إِنْ كُنْتُمْ صَادِقِينَ38

तथा वे कहते हैं कि कब पूरी होगी ये[1] धमकी, यदि तुम लोग सच्चे हो?
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1. अर्थात हमारे न मानने पर यातना आने की धमकी।
21:39जुज़ 17 · पृ. 325

لَوْ يَعْلَمُ الَّذِينَ كَفَرُوا حِينَ لَا يَكُفُّونَ عَنْ وُجُوهِهِمُ النَّارَ وَلَا عَنْ ظُهُورِهِمْ وَلَا هُمْ يُنْصَرُونَ39

यदि जान लें, जो काफ़िर हो गये हैं, उस समय को, जब वे नहीं बचा सकेंगे अपने मुखों को अग्नि से और न अपनी पीठों को और न उनकी कोई सहायता की जायेगी (तो ऐसी बातें नहीं करेंगे।)
21:40जुज़ 17 · पृ. 325

بَلْ تَأْتِيهِمْ بَغْتَةً فَتَبْهَتُهُمْ فَلَا يَسْتَطِيعُونَ رَدَّهَا وَلَا هُمْ يُنْظَرُونَ40

बल्कि वह समय उनपर आ जायेगा अचानक और उन्हें आश्चर्य चकित कर देगा, जिसे वे फेर नहीं सकेंगे और न उन्हें समय दिया जायेगा।
21:41जुज़ 17 · पृ. 325

وَلَقَدِ اسْتُهْزِئَ بِرُسُلٍ مِنْ قَبْلِكَ فَحَاقَ بِالَّذِينَ سَخِرُوا مِنْهُمْ مَا كَانُوا بِهِ يَسْتَهْزِئُونَ41

और उपहास किया गया बहुत-से रसूलों का, आपसे पहले, तो घेर लिया उन्हें जिन्होंने उपहास किया उनमें से, उस चीज़ ने, जिस[1] का उपहास कर रहे थे।
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1. अर्थात यातना ने।
21:42जुज़ 17 · पृ. 325

قُلْ مَنْ يَكْلَؤُكُمْ بِاللَّيْلِ وَالنَّهَارِ مِنَ الرَّحْمَٰنِ ۗ بَلْ هُمْ عَنْ ذِكْرِ رَبِّهِمْ مُعْرِضُونَ42

आप पूछिये कि कौन तुम्हारी रक्षा करेगा रात तथा दिन में अत्यंत कृपाशील[1] से? बल्कि वे अपने पालनहार की शिक्षा (क़र्आन) से विमुख हैं।
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1. अर्थात उस की यातना से।
21:43जुज़ 17 · पृ. 325

أَمْ لَهُمْ آلِهَةٌ تَمْنَعُهُمْ مِنْ دُونِنَا ۚ لَا يَسْتَطِيعُونَ نَصْرَ أَنْفُسِهِمْ وَلَا هُمْ مِنَّا يُصْحَبُونَ43

क्या उनके पूज्य हैं, जो उन्हें बचायेंगे हम से? वे स्वयं अपनी सहायता नहीं कर सकेंगे और न हमारी ओर से उनका साथ दिया जायेगा।
21:44जुज़ 17 · पृ. 325

بَلْ مَتَّعْنَا هَٰؤُلَاءِ وَآبَاءَهُمْ حَتَّىٰ طَالَ عَلَيْهِمُ الْعُمُرُ ۗ أَفَلَا يَرَوْنَ أَنَّا نَأْتِي الْأَرْضَ نَنْقُصُهَا مِنْ أَطْرَافِهَا ۚ أَفَهُمُ الْغَالِبُونَ44

बल्कि हमने जीवन का लाभ पहुँचाया है, उनको तथा उनके पूर्वजों को, यहाँतक कि (सुखों में) उनकी बड़ी आयु गुज़र[1] गयी, तो क्या वह नहीं देखते कि हम धरती को कम करते आ रहे हैं उसके किनारों से, फिर क्या वे विजय हो रहे हैं?
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1.अर्थ यह है कि वह मक्का के काफ़िर सुख-सुविधा मंद रहने के कारण अल्लाह से विमुख हो गये हैं, और सोचते हैं कि उन पर यातना नहीं आयेगी और वही विजयी होंगे। जब कि दशा यह है कि उन के अधिकार का क्षेत्र कम होता जा रहा है और इस्लाम बराबर फैलता जा रहा है। फिर भी वे इस भ्रम में हैं कि वे प्रभुत्व प्राप्त कर लेंगे।
21:45जुज़ 17 · पृ. 326

قُلْ إِنَّمَا أُنْذِرُكُمْ بِالْوَحْيِ ۚ وَلَا يَسْمَعُ الصُّمُّ الدُّعَاءَ إِذَا مَا يُنْذَرُونَ45

(हे नबी!) आप कह दें कि मैं तो वह़्यी ही के आधार पर तुम्हें सावधान कर रहा हूँ। (परन्तु) बहरे पुकार नहीं सुनते, जब उन्हें सावधान किया जाता है।
21:46जुज़ 17 · पृ. 326

وَلَئِنْ مَسَّتْهُمْ نَفْحَةٌ مِنْ عَذَابِ رَبِّكَ لَيَقُولُنَّ يَا وَيْلَنَا إِنَّا كُنَّا ظَالِمِينَ46

और यदि छू जाये उन्हें आपके पालनहार की तनिक भी यातना, तो अवश्य पुकारेंगे कि हाय हमारा विनाश! निश्चय ही हम अत्याचारी[1] थे।
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1. अर्थात अपने पापों को स्वीकार कर लेंगे।
21:47जुज़ 17 · पृ. 326

وَنَضَعُ الْمَوَازِينَ الْقِسْطَ لِيَوْمِ الْقِيَامَةِ فَلَا تُظْلَمُ نَفْسٌ شَيْئًا ۖ وَإِنْ كَانَ مِثْقَالَ حَبَّةٍ مِنْ خَرْدَلٍ أَتَيْنَا بِهَا ۗ وَكَفَىٰ بِنَا حَاسِبِينَ47

और हम रख देंगे न्याय का तराज़ू[1] प्रलय के दिन, फिर नहीं अत्याचार किया जायेगा किसी पर कुछ भी तथा यदि होगा राय के दाने के बराबर (किसी का कर्म) तो हम उसे सामने ले आयेंगे और हम बस (काफ़ी) हैं ह़िसाब लेने वाले।
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1. अर्थात कर्मों को तोलने और ह़िसाब करने के लिये, ताकि प्रत्येक व्यक्ति को उस के कर्मानुसार बदला दिया जाये।
21:48जुज़ 17 · पृ. 326

وَلَقَدْ آتَيْنَا مُوسَىٰ وَهَارُونَ الْفُرْقَانَ وَضِيَاءً وَذِكْرًا لِلْمُتَّقِينَ48

और हम दे चुके हैं, मूसा तथा हारून को विवेक, प्रकाश और शिक्षाप्रद पुस्तक आज्ञाकारियों के लिए।
21:49जुज़ 17 · पृ. 326

الَّذِينَ يَخْشَوْنَ رَبَّهُمْ بِالْغَيْبِ وَهُمْ مِنَ السَّاعَةِ مُشْفِقُونَ49

जो डरते हों अपने पालनहार से बिन देखे और वे प्रलय से भयभीत हों।
21:50जुज़ 17 · पृ. 326

وَهَٰذَا ذِكْرٌ مُبَارَكٌ أَنْزَلْنَاهُ ۚ أَفَأَنْتُمْ لَهُ مُنْكِرُونَ50

और ये (क़ुर्आन) एक शुभ शिक्षा है, जिसे हमने उतारा है, तो क्या तुम इसके इन्कारी हो?
21:51जुज़ 17 · पृ. 326

۞ وَلَقَدْ آتَيْنَا إِبْرَاهِيمَ رُشْدَهُ مِنْ قَبْلُ وَكُنَّا بِهِ عَالِمِينَ51

और हमने प्रदान की थी इब्राहीम को, उसकी चेतना इससे पहले और हम उससे भली-भाँति अवगत थे।
21:52जुज़ 17 · पृ. 326

إِذْ قَالَ لِأَبِيهِ وَقَوْمِهِ مَا هَٰذِهِ التَّمَاثِيلُ الَّتِي أَنْتُمْ لَهَا عَاكِفُونَ52

जब उसने अपने बाप तथा अपनी जाति से कहाः ये प्रतिमाएँ (मूर्तियाँ) कैसी हैं, जिनकी पूजा में तुम लगे हुए हो?
21:53जुज़ 17 · पृ. 326

قَالُوا وَجَدْنَا آبَاءَنَا لَهَا عَابِدِينَ53

उन्होंने कहाः हमने पाया है अपने पूर्वजों को इनकी पूजा करते हुए।
21:54जुज़ 17 · पृ. 326

قَالَ لَقَدْ كُنْتُمْ أَنْتُمْ وَآبَاؤُكُمْ فِي ضَلَالٍ مُبِينٍ54

उस (इब्राहीम) ने कहाः निश्चय तुम और तुम्हारे पूर्वज खुले कुपथ में हो।
21:55जुज़ 17 · पृ. 326

قَالُوا أَجِئْتَنَا بِالْحَقِّ أَمْ أَنْتَ مِنَ اللَّاعِبِينَ55

उन्होंने कहाः क्या तुम लाये हो हमारे पास सत्य या तुम उपहास कर रहे हो?
21:56जुज़ 17 · पृ. 326

قَالَ بَلْ رَبُّكُمْ رَبُّ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ الَّذِي فَطَرَهُنَّ وَأَنَا عَلَىٰ ذَٰلِكُمْ مِنَ الشَّاهِدِينَ56

उसने कहाः बल्कि तुम्हारा पालनहार आकाशों तथा धरती का पालनहार है, जिसने उन्हें पैदा किया है और मैं तो इसीका साक्षी हूँ।
21:57जुज़ 17 · पृ. 326

وَتَاللَّهِ لَأَكِيدَنَّ أَصْنَامَكُمْ بَعْدَ أَنْ تُوَلُّوا مُدْبِرِينَ57

तथा अल्लाह की शपथ! मैं अवश्य चाल चलूँगा तुम्हारी मूर्तियों के साथ, इसके पश्चात् कि तुम चले जाओ।
21:58जुज़ 17 · पृ. 327

فَجَعَلَهُمْ جُذَاذًا إِلَّا كَبِيرًا لَهُمْ لَعَلَّهُمْ إِلَيْهِ يَرْجِعُونَ58

फिर उसने कर दिया उन्हें खण्ड-खण्ड, उनके बड़े के सिवा, ताकि वे उसकी ओर फिरें।
21:59जुज़ 17 · पृ. 327

قَالُوا مَنْ فَعَلَ هَٰذَا بِآلِهَتِنَا إِنَّهُ لَمِنَ الظَّالِمِينَ59

उन्होंने कहाः किसने ये दशा कर दी है, हमारे पूज्यों ( देवताओं) की? वास्तव में, वह कोई अत्याचारी होगा!
21:60जुज़ 17 · पृ. 327

قَالُوا سَمِعْنَا فَتًى يَذْكُرُهُمْ يُقَالُ لَهُ إِبْرَاهِيمُ60

लोगों ने कहाः हमने सुना है एक नवयुवक को उनकी चर्चा करते, जिसे इब्राहीम कहा जाता है।
21:61जुज़ 17 · पृ. 327

قَالُوا فَأْتُوا بِهِ عَلَىٰ أَعْيُنِ النَّاسِ لَعَلَّهُمْ يَشْهَدُونَ61

लोगों ने कहाः उसे लाओ लोगों के सामने, ताकि लोग देखें।
21:62जुज़ 17 · पृ. 327

قَالُوا أَأَنْتَ فَعَلْتَ هَٰذَا بِآلِهَتِنَا يَا إِبْرَاهِيمُ62

उन्होंने पूछाः क्या तूने ही ये किया है, हमारे पूज्यों के साथ, हे इब्राहीम?
21:63जुज़ 17 · पृ. 327

قَالَ بَلْ فَعَلَهُ كَبِيرُهُمْ هَٰذَا فَاسْأَلُوهُمْ إِنْ كَانُوا يَنْطِقُونَ63

उसने कहाः बल्कि इसे इनके इस बड़े ने किया[1] है, तो इन्हीं से पूछ लो, यदि ये बोलते हों?
____________________
1. यह बात इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने उन्हें उन के पूज्यों की विवशता दिखाने के लिये कही।
21:64जुज़ 17 · पृ. 327

فَرَجَعُوا إِلَىٰ أَنْفُسِهِمْ فَقَالُوا إِنَّكُمْ أَنْتُمُ الظَّالِمُونَ64

फिर अपने मन में वे सोच में पड़ गये और (अपने मन में) कहाः वास्तव में, तुम्हीं अत्याचारी हो।
21:65जुज़ 17 · पृ. 327

ثُمَّ نُكِسُوا عَلَىٰ رُءُوسِهِمْ لَقَدْ عَلِمْتَ مَا هَٰؤُلَاءِ يَنْطِقُونَ65

फिर वह ओंधे कर दिये गये अपने सिरों के बल[1] ( और बोलेः) तू जानता है कि ये बोलते नहीं हैं।
____________________
1. अर्थात सत्य को स्वीकार कर के उस से फिर गये।
21:66जुज़ 17 · पृ. 327

قَالَ أَفَتَعْبُدُونَ مِنْ دُونِ اللَّهِ مَا لَا يَنْفَعُكُمْ شَيْئًا وَلَا يَضُرُّكُمْ66

इब्राहीम ने कहाः तो क्या तुम इबादत (वंदना) अल्लाह के सिवा उसकी करते हो, जो न तुम्हें कुछ लाभ पहुँचा सकते हैं और न तुम्हें हानि पहूँचा सकते हैं?
21:67जुज़ 17 · पृ. 327

أُفٍّ لَكُمْ وَلِمَا تَعْبُدُونَ مِنْ دُونِ اللَّهِ ۖ أَفَلَا تَعْقِلُونَ67

तुफ़ (थू) है तुमपर और उसपर जिसकी तुम इबादत (वंदना) करते हो अल्लाह को छोड़कर। तो क्या तुम समझ नहीं रखते हो?
21:68जुज़ 17 · पृ. 327

قَالُوا حَرِّقُوهُ وَانْصُرُوا آلِهَتَكُمْ إِنْ كُنْتُمْ فَاعِلِينَ68

उन्होंने कहाः इसे जला दो तथा सहायता करो अपने पूज्यों की, यदि तुम्हें कुछ करना है।
21:69जुज़ 17 · पृ. 327

قُلْنَا يَا نَارُ كُونِي بَرْدًا وَسَلَامًا عَلَىٰ إِبْرَاهِيمَ69

हमने कहाः हे अग्नि! तू शीतल तथा शान्ति बन जा, इब्राहीम पर।
21:70जुज़ 17 · पृ. 327

وَأَرَادُوا بِهِ كَيْدًا فَجَعَلْنَاهُمُ الْأَخْسَرِينَ70

और उन्होंने उसके साथ बुराई चाही, तो हमने उन्हीं को क्षतिग्रस्त कर दिया।
21:71जुज़ 17 · पृ. 327

وَنَجَّيْنَاهُ وَلُوطًا إِلَى الْأَرْضِ الَّتِي بَارَكْنَا فِيهَا لِلْعَالَمِينَ71

और हम, उस (इब्राहीम) को बचाकर ले गये तथा लूत[1] को, उस भूमि[2] की ओर, जिसमें हमने सम्पन्नता रखी है, विश्व वासियों के लिए।
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1. लूत अलैहिस्सलाम इब्राहीम अलैहिस्सलाम के भतीजे थे। 2. इस से अभिप्राय सीरिया देश है। और अर्थ यह है कि अल्लाह ने इब्राहीम अलैहिस्सलाम की अग्नि से रक्षा करने के पश्चात् उन्हें सीरिया देश की ओर प्रस्तथान कर जाने का आदेश दिया। और वह सीरिया चले गये।
21:72जुज़ 17 · पृ. 327

وَوَهَبْنَا لَهُ إِسْحَاقَ وَيَعْقُوبَ نَافِلَةً ۖ وَكُلًّا جَعَلْنَا صَالِحِينَ72

और हमने उसे प्रदान किया (पुत्र) इस्ह़ाक़ और (पौत्र) याक़ूब उसपर अधिक और प्रत्येक को हमने सत्कर्मी बनाया।
21:73जुज़ 17 · पृ. 328

وَجَعَلْنَاهُمْ أَئِمَّةً يَهْدُونَ بِأَمْرِنَا وَأَوْحَيْنَا إِلَيْهِمْ فِعْلَ الْخَيْرَاتِ وَإِقَامَ الصَّلَاةِ وَإِيتَاءَ الزَّكَاةِ ۖ وَكَانُوا لَنَا عَابِدِينَ73

और हमने उन्हें अग्रणी (प्रमुख) बना दिया, जो हमारे आदेशानुसार (लोगों को) सुपथ दर्शाते हैं तथा हमने वह़्यी (प्रकाशना) की, उनकी ओर सत्कर्मों के करने, नमाज़ की स्थापना करने और ज़कात देने की तथा वे हमारे ही उपासक थे।
21:74जुज़ 17 · पृ. 328

وَلُوطًا آتَيْنَاهُ حُكْمًا وَعِلْمًا وَنَجَّيْنَاهُ مِنَ الْقَرْيَةِ الَّتِي كَانَتْ تَعْمَلُ الْخَبَائِثَ ۗ إِنَّهُمْ كَانُوا قَوْمَ سَوْءٍ فَاسِقِينَ74

तथा लूत को हमने निर्णय शक्ति और ज्ञान दिया और बचा लिया उस बस्ती से, जो दुष्कर्म कर रही थी, वास्तव में, वे बुरे अवज्ञाकारी लोग थे।
21:75जुज़ 17 · पृ. 328

وَأَدْخَلْنَاهُ فِي رَحْمَتِنَا ۖ إِنَّهُ مِنَ الصَّالِحِينَ75

और हमने प्रवेश दिया उसे अपनी दया में, वास्तव में, वह सदाचारियों में से था।
21:76जुज़ 17 · पृ. 328

وَنُوحًا إِذْ نَادَىٰ مِنْ قَبْلُ فَاسْتَجَبْنَا لَهُ فَنَجَّيْنَاهُ وَأَهْلَهُ مِنَ الْكَرْبِ الْعَظِيمِ76

तथा नूह़ को (याद करो) जब उसने पुकारा इन (नबियों) से पहले। तो हमने उसकी पुकार सुन ली, फिर उसे और उसके घराने को मुक्ति दी महा पीड़ा से।
21:77जुज़ 17 · पृ. 328

وَنَصَرْنَاهُ مِنَ الْقَوْمِ الَّذِينَ كَذَّبُوا بِآيَاتِنَا ۚ إِنَّهُمْ كَانُوا قَوْمَ سَوْءٍ فَأَغْرَقْنَاهُمْ أَجْمَعِينَ77

और उसकी सहायता की, उस जाति के मुक़ाबले में, जिन्होंने हमारी आयतों (निशानियों) को झुठला दिया, वास्तव में, वे बुरे लोग थे। अतः हमने डुबो दिया उन सभी को।
21:78जुज़ 17 · पृ. 328

وَدَاوُودَ وَسُلَيْمَانَ إِذْ يَحْكُمَانِ فِي الْحَرْثِ إِذْ نَفَشَتْ فِيهِ غَنَمُ الْقَوْمِ وَكُنَّا لِحُكْمِهِمْ شَاهِدِينَ78

तथा दावूद और सुलैमान को (याद करो) जब वे दोनों निर्णय कर रहे थे, खेत के विषय में, जब रात्रि में चर गईं उसे दूसरों की बकरियाँ और हम उनका निर्णय देख रहे थे।
21:79जुज़ 17 · पृ. 328

فَفَهَّمْنَاهَا سُلَيْمَانَ ۚ وَكُلًّا آتَيْنَا حُكْمًا وَعِلْمًا ۚ وَسَخَّرْنَا مَعَ دَاوُودَ الْجِبَالَ يُسَبِّحْنَ وَالطَّيْرَ ۚ وَكُنَّا فَاعِلِينَ79

तो हमने उसका उचित निर्णय समझा दिया सुलैमान[1] को और प्रत्येक को हमने प्रदान किया था निर्णय शक्ति तथा ज्ञान और हमने अधीन कर दिया था दावूद के साथ पर्वतों को, जो (अल्लाह की पवित्रता का) वर्णन करते थे तथा पक्षियों को और हम ही इसकार्य के करने वाले थे।
____________________
1. ह़दीस में वर्णित है कि दो नारियों के साथ शिशु थे। भेड़िया आया और एक को ले गया तो एक ने दूसरे से कहा कि तुम्हारे शिशु को ले गया है और निर्णय के लिये दावूद के पास गयीं। उन्हों ने बड़ी के लिये निर्णय कर दिया। फिर वह सुलैमान अलैहिस्सलाम के पास आयीं, उन्हों ने कहाः छुरी लाओ, मैं तुम दोनों के लिये दो भाग कर दूँ। तो छोटी ने कहाः ऐसा न करें, अल्लाह आप पर दया करे, यह उसी का शिशु है। यह सुन कर उन्हों ने छोटी के पक्ष में निर्णय कर दिया। ( बुख़ारीः 3427, मुस्लिमः1720)
21:80जुज़ 17 · पृ. 328

وَعَلَّمْنَاهُ صَنْعَةَ لَبُوسٍ لَكُمْ لِتُحْصِنَكُمْ مِنْ بَأْسِكُمْ ۖ فَهَلْ أَنْتُمْ شَاكِرُونَ80

तथा हमने उसे (दावूद को) सिखाया तुम्हारे लिए कवच बनाना, ताकि तुम्हें बचाये तुम्हारे आक्रमण से, तो क्या तुम कृतज्ञ हो?
21:81जुज़ 17 · पृ. 328

وَلِسُلَيْمَانَ الرِّيحَ عَاصِفَةً تَجْرِي بِأَمْرِهِ إِلَى الْأَرْضِ الَّتِي بَارَكْنَا فِيهَا ۚ وَكُنَّا بِكُلِّ شَيْءٍ عَالِمِينَ81

और सुलैमान के अधीन कर दिया उग्र वायु को, जो चल रही थी उसके आदेश से,[1] उस धरती की ओर जिसमें हमने सम्पन्नता (विभूतियाँ) रखी है और हम ही सर्वज्ञ हैं।
____________________
1. अर्थात वायु उन के सिंहासन को उन के राज्य में जहाँ चाहते क्षणों में पहुँचा देती थी।
21:82जुज़ 17 · पृ. 329

وَمِنَ الشَّيَاطِينِ مَنْ يَغُوصُونَ لَهُ وَيَعْمَلُونَ عَمَلًا دُونَ ذَٰلِكَ ۖ وَكُنَّا لَهُمْ حَافِظِينَ82

तथा शैतानों में से उन्हें (उसके अधीन कर दिया) जो उसके लिए डुबकी लगाते[1] तथा इसके सिवा दूसरे कार्य करते थे और हम ही उनके निरीक्षक[1] हैं।
____________________
1. अर्थात मोतियाँ तथा जवाहिरात निकालने के लिये। 2. ताकि शैतान उन को कोई हानि न पहुँचाये।
21:83जुज़ 17 · पृ. 329

۞ وَأَيُّوبَ إِذْ نَادَىٰ رَبَّهُ أَنِّي مَسَّنِيَ الضُّرُّ وَأَنْتَ أَرْحَمُ الرَّاحِمِينَ83

तथा अय्यूब (की उस स्थिति) को (याद करो), जब उसने पुकारा अपने पालनहार को कि मुझे रोग लग गया है और तू सबसे अधिक दयावान् है।
21:84जुज़ 17 · पृ. 329

فَاسْتَجَبْنَا لَهُ فَكَشَفْنَا مَا بِهِ مِنْ ضُرٍّ ۖ وَآتَيْنَاهُ أَهْلَهُ وَمِثْلَهُمْ مَعَهُمْ رَحْمَةً مِنْ عِنْدِنَا وَذِكْرَىٰ لِلْعَابِدِينَ84

तो हमने उसकी गुहार सुन ली[1] और दूर कर दिया, जो दुःख उसे था और प्रदान कर दिया उसे उसका परिवार तथा उतने ही और उनके साथ, अपनी विशेष दया से तथा शिक्षा के लिए उपासकों की।
____________________
1. आदरणीय अय्यूब अलैहिस्सलाम की अल्लाह ने उन के धन-धान्य तथा परिवार में परीक्षा ली। वह स्वयं रोगग्रस्त हो गये। परन्तु उन के धैर्य के कारण अल्लाह ने उन को फिर स्वस्थ कर दिया और धन-धान्य के साथ ही पहले से दो गुने पुत्र प्रदान किये।
21:85जुज़ 17 · पृ. 329

وَإِسْمَاعِيلَ وَإِدْرِيسَ وَذَا الْكِفْلِ ۖ كُلٌّ مِنَ الصَّابِرِينَ85

तथा इस्माईल, इद्रीस तथा ज़ुल किफ़्ल को (याद करो), सभी सहनशीलों में से थे।
21:86जुज़ 17 · पृ. 329

وَأَدْخَلْنَاهُمْ فِي رَحْمَتِنَا ۖ إِنَّهُمْ مِنَ الصَّالِحِينَ86

और हमने प्रवेश दिया उनको अपनी दया में, वास्तव में, वे सदाचारी थे।
21:87 · The prayer of Yunusजुज़ 17 · पृ. 329

وَذَا النُّونِ إِذْ ذَهَبَ مُغَاضِبًا فَظَنَّ أَنْ لَنْ نَقْدِرَ عَلَيْهِ فَنَادَىٰ فِي الظُّلُمَاتِ أَنْ لَا إِلَٰهَ إِلَّا أَنْتَ سُبْحَانَكَ إِنِّي كُنْتُ مِنَ الظَّالِمِينَ87

तथा ज़ुन्नून[1] को, जब वे चला[2] गया क्रोधित होकर और सोचा कि हम उसे पकड़ेंगे नहीं, अन्ततः, उसने पुकारा अन्धेरे में कि नहीं है कोई पूज्य तेरे सिवा, तू पवित्र है, वास्तव में, मैं ही दोषी[3] हूँ।
____________________
1. ज़ुन्नून से अभिप्रेत यूनुस अलैहिस्सलाम हैं। नून का अर्थ अर्बी भाषा में मछली है। उन को "साह़िबुल ह़ूत" कहा गया है। अर्थात मछली वाला। क्यों कि उन को अल्लाह के आदेश से एक मछली ने निगल लिया था। इस का कुछ वर्णन सूरह यूनुस में आ चुका है। और कुछ सूरह साफ़्फ़ात में आ रहा है। 2. अर्थात अपनी जाति से क्रोधित हो कर अल्लाह के आदेश के बिना अपनी बस्ती से चले गये। इसी पर उन्हें पकड़ लिया गया। 3. सह़ीह़ ह़दीस में आता है कि जो भी मुसलमान इस शब्द के साथ किसी विषय में दुआ करेगा तो अल्लाह उस की दुआ को स्वीकार करेगा। (तिर्मिज़ीः3505)
21:88जुज़ 17 · पृ. 329

فَاسْتَجَبْنَا لَهُ وَنَجَّيْنَاهُ مِنَ الْغَمِّ ۚ وَكَذَٰلِكَ نُنْجِي الْمُؤْمِنِينَ88

तब हमने उसकी पुकार सुन ली तथा मुक्त कर दिया शोक से और इसी प्रकार, हम बचा लिया करते हैं, ईमान वालों को।
21:89जुज़ 17 · पृ. 329

وَزَكَرِيَّا إِذْ نَادَىٰ رَبَّهُ رَبِّ لَا تَذَرْنِي فَرْدًا وَأَنْتَ خَيْرُ الْوَارِثِينَ89

तथा ज़करिय्या को (याद करो), जब पुकारा उसने अपने पालनहार[1] को, हे मेरे पालनहार! मुझे मत छोड़ दे अकेला और तू सबसे अच्छा उत्तराधिकारी है।
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1. आदरणीय ज़करिय्या ने एक पुत्र के लिये प्रार्थना की, जिस का वर्णन सूरह आले इमरान तथा सूरह ता-हा में आ चुका है।
21:90जुज़ 17 · पृ. 329

فَاسْتَجَبْنَا لَهُ وَوَهَبْنَا لَهُ يَحْيَىٰ وَأَصْلَحْنَا لَهُ زَوْجَهُ ۚ إِنَّهُمْ كَانُوا يُسَارِعُونَ فِي الْخَيْرَاتِ وَيَدْعُونَنَا رَغَبًا وَرَهَبًا ۖ وَكَانُوا لَنَا خَاشِعِينَ90

तो हमने सुन ली उसकी पुकार तथा प्रदान कर दिया उसे यह़्या और सुधार दिया उसके लिए उसकी पत्नी को। वास्तव में, वे सभी दौड़-धूप करते थे सत्कर्मों में और हमसे प्रार्थना करते थे रूचि तथा भय के साथ और हमारे आगे झुके हुए थे।
21:91जुज़ 17 · पृ. 330

وَالَّتِي أَحْصَنَتْ فَرْجَهَا فَنَفَخْنَا فِيهَا مِنْ رُوحِنَا وَجَعَلْنَاهَا وَابْنَهَا آيَةً لِلْعَالَمِينَ91

तथा जिसने रक्षा की अपनी सतीत्व[1] की, तो फूँक दी हमने उसके भीतर अपनी आत्मा से और उसे तथा उसके पुत्र को बना दिया एक निशानी संसार वासियों के लिए।
____________________
1. इस से संकेत मर्य़म तथा उस के पुत्र ईसा (अलैहिस्सलाम) की ओर है।
21:92जुज़ 17 · पृ. 330

إِنَّ هَٰذِهِ أُمَّتُكُمْ أُمَّةً وَاحِدَةً وَأَنَا رَبُّكُمْ فَاعْبُدُونِ92

वास्तव में, तुम्हारा धर्म एक ही धर्म[1] है और मैं ही तुम सबका पालनहार (पूज्य) हूँ। अतः, मेरी ही इबादत (वंदना) करो।
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1. अर्थात सब नबियों का मूल धर्म एक है। नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने कहाः मैं मर्यम के पुत्र ईसा से अधिक संबन्ध रखता हूँ। क्यों कि सब नबी भाई-भाई हैं, उन की मायें अलग अलग हैं, सब का धर्म एक है। (सह़ीह़ बुख़ारीः3443) और दूसरी ह़दीस में यह अधिक है किः मेरे और उस के बीच कोई और नबी नहीं है। (सह़ीह़ बुख़ारीः3442)
21:93जुज़ 17 · पृ. 330

وَتَقَطَّعُوا أَمْرَهُمْ بَيْنَهُمْ ۖ كُلٌّ إِلَيْنَا رَاجِعُونَ93

और खण्ड-खण्ड कर दिया लोगों ने अपने धर्म को (विभेद करके) आपस में, सबको हमारी ओर ही फिर आना है।
21:94जुज़ 17 · पृ. 330

فَمَنْ يَعْمَلْ مِنَ الصَّالِحَاتِ وَهُوَ مُؤْمِنٌ فَلَا كُفْرَانَ لِسَعْيِهِ وَإِنَّا لَهُ كَاتِبُونَ94

फिर जो सदाचार करेगा और वह एकेश्वरवादी हो, तो उसके प्रयास की उपेक्षा नहीं की जायेगी और हम उसे लिख रहे हैं।
21:95जुज़ 17 · पृ. 330

وَحَرَامٌ عَلَىٰ قَرْيَةٍ أَهْلَكْنَاهَا أَنَّهُمْ لَا يَرْجِعُونَ95

और असंभव है किसी भी बस्ती पर, जिसका हमने विनाश कर[1] दिया कि वह फिर (संसार में) आ जाये।
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1. अर्थात उस के वासियों के दुराचार के कारण।
21:96जुज़ 17 · पृ. 330

حَتَّىٰ إِذَا فُتِحَتْ يَأْجُوجُ وَمَأْجُوجُ وَهُمْ مِنْ كُلِّ حَدَبٍ يَنْسِلُونَ96

यहाँ तक कि जब खोल दिये जायेंगे याजूज तथा माजूज[1] और वे प्रत्येक ऊँचाई से उतर रहे होंगे।
____________________
1. याजूज तथा माजूज के विषय में देखियेः सूरह कह्फ, आयतः93 से 100 तक का अनुवाद।
21:97जुज़ 17 · पृ. 330

وَاقْتَرَبَ الْوَعْدُ الْحَقُّ فَإِذَا هِيَ شَاخِصَةٌ أَبْصَارُ الَّذِينَ كَفَرُوا يَا وَيْلَنَا قَدْ كُنَّا فِي غَفْلَةٍ مِنْ هَٰذَا بَلْ كُنَّا ظَالِمِينَ97

और समीप आ जायेगा सत्य[1] वचन, तो अकस्मात खुली रह जायेँगी काफ़िरों की आँखें, ( वे कहेंगेः) "हाय हमारा विनाश!" हम असावधान रह गये इससे, बल्कि हम अत्याचारी थे।
____________________
1. सत्य वचन से अभिप्राय प्रलय का वचन है।
21:98जुज़ 17 · पृ. 330

إِنَّكُمْ وَمَا تَعْبُدُونَ مِنْ دُونِ اللَّهِ حَصَبُ جَهَنَّمَ أَنْتُمْ لَهَا وَارِدُونَ98

निश्चय तुमसब तथा तुम जिन (मूर्तियों) को पूज रहे हो अल्लाह के अतिरिक्त, नरक के ईंधन हैं, तुमसब वहाँ पहुँचने वाले हो।
21:99जुज़ 17 · पृ. 330

لَوْ كَانَ هَٰؤُلَاءِ آلِهَةً مَا وَرَدُوهَا ۖ وَكُلٌّ فِيهَا خَالِدُونَ99

यदि वे वास्तव में पूज्य होते, तो नरक में प्रवेश नहीं करते और प्रत्येक उसमें सदावासी होंगे।
21:100जुज़ 17 · पृ. 330

لَهُمْ فِيهَا زَفِيرٌ وَهُمْ فِيهَا لَا يَسْمَعُونَ100

उनकी उसमें चीखें होंगी तथा वे उसमें (कुछ) सुन नहीं सकेंगे।
21:101जुज़ 17 · पृ. 330

إِنَّ الَّذِينَ سَبَقَتْ لَهُمْ مِنَّا الْحُسْنَىٰ أُولَٰئِكَ عَنْهَا مُبْعَدُونَ101

(परन्तु) जिनके लिए पहले ही से हमारी ओर से भलाई का निर्णय हो चुका है, वही उससे दूर रखे जायेंगे।
21:102जुज़ 17 · पृ. 331

لَا يَسْمَعُونَ حَسِيسَهَا ۖ وَهُمْ فِي مَا اشْتَهَتْ أَنْفُسُهُمْ خَالِدُونَ102

वे उस (नरक) की सरसर भी नहीं सुनेंगे और अपनी मनचाही चीज़ों में सदा (मगन) रहेंगे।
21:103जुज़ 17 · पृ. 331

لَا يَحْزُنُهُمُ الْفَزَعُ الْأَكْبَرُ وَتَتَلَقَّاهُمُ الْمَلَائِكَةُ هَٰذَا يَوْمُكُمُ الَّذِي كُنْتُمْ تُوعَدُونَ103

उन्हें उदासीन नहीं करेगी (प्रलय के दिन की) बड़ी व्यग्रता तथा फ़रिश्ते उन्हें हाथों-हाथ ले लेंगे, (तथा कहेंगेः) यही तुम्हारा वह दिन है, जिसका तुम्हें वचन दिया जा रहा था।
21:104जुज़ 17 · पृ. 331

يَوْمَ نَطْوِي السَّمَاءَ كَطَيِّ السِّجِلِّ لِلْكُتُبِ ۚ كَمَا بَدَأْنَا أَوَّلَ خَلْقٍ نُعِيدُهُ ۚ وَعْدًا عَلَيْنَا ۚ إِنَّا كُنَّا فَاعِلِينَ104

जिस दिन हम लपेट[1] देंगे आकाश को, पंजिका के पन्नों को लपेट देने के समान, जैसे हमने आरंभ किया था प्रथम उत्पत्ति का, उसी प्रकार, उसे[2] दुहरायेंगे, इस (वचन) को पूरा करना हमपर है और हम पूरा करके रहेंगे।
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1. (देखियेः सूरह ज़ुमर, आयतः67) 2. नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने भाषण दिया कि लोग अल्लाह के पास बिना जूते के, नग्न तथा बिना ख़तने के एकत्र किये जायेंगे। फिर इब्राहीम अलैहिस्सलाम सर्व प्रथम वस्त्र पहनाये जायेंगे। (सह़ीह़ बुख़ारीः 3349)
21:105जुज़ 17 · पृ. 331

وَلَقَدْ كَتَبْنَا فِي الزَّبُورِ مِنْ بَعْدِ الذِّكْرِ أَنَّ الْأَرْضَ يَرِثُهَا عِبَادِيَ الصَّالِحُونَ105

तथा हमने लिख दिया है ज़बूर[1] में शिक्षा के पश्चात् कि धरती के उत्तराधिकारी मेरे सदाचारी भक्त होंगे।
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1. ज़बूर वह पुस्तक है जो दावूद अलैहिस्सलाम को प्रदान की गयी।
21:106जुज़ 17 · पृ. 331

إِنَّ فِي هَٰذَا لَبَلَاغًا لِقَوْمٍ عَابِدِينَ106

वस्तुतः, इस (बात) में एक बड़ा उपदेश है उपासकों के लिए।
21:107जुज़ 17 · पृ. 331

وَمَا أَرْسَلْنَاكَ إِلَّا رَحْمَةً لِلْعَالَمِينَ107

और (हे नबी!) हमने आपको नहीं भेजा है, किन्तु समस्त संसार के लिए दया बना[1] कर।
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1. अर्थात जो आप पर ईमान लायेगा, वही लोक-परलोक में अल्लाह की दया का अधिकारी होगा।
21:108जुज़ 17 · पृ. 331

قُلْ إِنَّمَا يُوحَىٰ إِلَيَّ أَنَّمَا إِلَٰهُكُمْ إِلَٰهٌ وَاحِدٌ ۖ فَهَلْ أَنْتُمْ مُسْلِمُونَ108

आप कह दें कि मेरी ओर तो बस यही वह़्यी की जा रही है कि तुम सबका पूज्य बस एक ही पूज्य है, फिर क्या तुम उसके आज्ञाकारी[1] हो?
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1. अर्थात दया एकेश्वरवाद में है, मिश्रणवाद में नहीं।
21:109जुज़ 17 · पृ. 331

فَإِنْ تَوَلَّوْا فَقُلْ آذَنْتُكُمْ عَلَىٰ سَوَاءٍ ۖ وَإِنْ أَدْرِي أَقَرِيبٌ أَمْ بَعِيدٌ مَا تُوعَدُونَ109

फिर यदि वे विमुख हों, तो आप कह दें कि मैंने तुम्हें समान रूप से सावधान कर दिया[1] और मैं नहीं जानता कि समीप है अथवा दूर जिसका वचन तुम्हें दिया जा रहा है।
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1. अर्थात ईमान न लाने और मिश्रणवाद के दुष्परिणाम से।
21:110जुज़ 17 · पृ. 331

إِنَّهُ يَعْلَمُ الْجَهْرَ مِنَ الْقَوْلِ وَيَعْلَمُ مَا تَكْتُمُونَ110

वास्तव में, वही जानता है खुली बात को तथा जानता है जो कुछ तुम छुपाते हो।
21:111जुज़ 17 · पृ. 331

وَإِنْ أَدْرِي لَعَلَّهُ فِتْنَةٌ لَكُمْ وَمَتَاعٌ إِلَىٰ حِينٍ111

तथा मुझे ये ज्ञान (भी) नहीं, संभव है ये[1] तुम्हारे लिए कोई परीक्षा हो तथा लाभ हो एक निर्धारित समय तक?
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1. अर्थात यातना में विलम्ब।
21:112जुज़ 17 · पृ. 331

قَالَ رَبِّ احْكُمْ بِالْحَقِّ ۗ وَرَبُّنَا الرَّحْمَٰنُ الْمُسْتَعَانُ عَلَىٰ مَا تَصِفُونَ112

उस (नबी) ने प्रार्थना कीः हे मेरे पालनहार! सत्य के साथ निर्णय कर दे और हमारा पालनहार अत्यंत कृपाशील है, जिससे सहायता माँगी जाये उन बातों पर, जो तुम लोग बना रहे हो।

सूरह के आरंभ से चलाएँ