Al-Jathiyah

سورة الجاثية

सूरह 45 · मक्की · 37 आयतें

45:1जुज़ 25 · पृ. 499

حم1

ह़ा मीम।
45:2जुज़ 25 · पृ. 499

تَنْزِيلُ الْكِتَابِ مِنَ اللَّهِ الْعَزِيزِ الْحَكِيمِ2

इस पुस्तक[1] का उतरना अल्लाह, सब चीज़ों और गुणों को जानने वाले की ओर से है।
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1. इस सूरह में भी तौह़ीद तथा परलोक के संबन्ध में मुश्रिकों के संदेहा को दूर किया गया है तथा उन की दुराग्रह की निन्दा की गई है।
45:3जुज़ 25 · पृ. 499

إِنَّ فِي السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ لَآيَاتٍ لِلْمُؤْمِنِينَ3

वास्तव में, आकाशों तथा धरती में बहुत-सी निशानियाँ (लक्षण) हैं, ईमान लाने वालों के लिए।
45:4जुज़ 25 · पृ. 499

وَفِي خَلْقِكُمْ وَمَا يَبُثُّ مِنْ دَابَّةٍ آيَاتٌ لِقَوْمٍ يُوقِنُونَ4

तथा तुम्हारी उत्पत्ति में तथा जो फैला[1] दिये हैं उसने जीव, बहुत-सी निशानियाँ हैं, उन लोगों के लिए, जो विश्वास रखते हों।
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1. तौह़ीद (एकेश्वरवाद) के प्रकरण में क़ुर्आन ने प्रत्येक स्थान पर आकाश तथा धरती में अल्लाह के सामर्थ्य की फैली हुई निशानियों को प्रस्तुत किया है। और यह बताया है कि जैसे उस ने वर्षा द्वारा मनुष्य के आर्थिक जीवन की व्यवस्था कर दी है वैसे ही रसूलों तथा पुस्तकों द्वारा उस के आत्मिक जीवन की व्यवस्था कर दी है जिस पर आश्चर्य नहीं होना चाहिये। यह विश्व की व्यवस्था स्वयं ऐसी खुली पुस्तक है जिस के पश्चात् ईमान लाने के लिये किसी और प्रमाण की आवश्यक्ता नहीं है।
45:5जुज़ 25 · पृ. 499

وَاخْتِلَافِ اللَّيْلِ وَالنَّهَارِ وَمَا أَنْزَلَ اللَّهُ مِنَ السَّمَاءِ مِنْ رِزْقٍ فَأَحْيَا بِهِ الْأَرْضَ بَعْدَ مَوْتِهَا وَتَصْرِيفِ الرِّيَاحِ آيَاتٌ لِقَوْمٍ يَعْقِلُونَ5

तथा रात और दिन के आने जाने में तथा अल्लाह ने आकाश से जो जीविका उतारी है, फिर जीवित किया है उसके द्वारा धरती को, उसके मरने के पश्चात् तथा हवाओं के फेरने में, बड़ी निशानियाँ हैं, उनके लिए, जो समझ-बूझ रखते हों।
45:6जुज़ 25 · पृ. 499

تِلْكَ آيَاتُ اللَّهِ نَتْلُوهَا عَلَيْكَ بِالْحَقِّ ۖ فَبِأَيِّ حَدِيثٍ بَعْدَ اللَّهِ وَآيَاتِهِ يُؤْمِنُونَ6

ये अल्लाह की आयतें हैं, जो वास्तव में हम तुम्हें सुना रहे हैं। फिर कौन सी बात रह गई है, अल्लाह तथा उसकी आयतों के पश्चात्, जिसपर वे ईमान लायेंगे?
45:7जुज़ 25 · पृ. 499

وَيْلٌ لِكُلِّ أَفَّاكٍ أَثِيمٍ7

विनाश है प्रत्येक झूठे पापी के लिए।
45:8जुज़ 25 · पृ. 499

يَسْمَعُ آيَاتِ اللَّهِ تُتْلَىٰ عَلَيْهِ ثُمَّ يُصِرُّ مُسْتَكْبِرًا كَأَنْ لَمْ يَسْمَعْهَا ۖ فَبَشِّرْهُ بِعَذَابٍ أَلِيمٍ8

जो अल्लाह की उन आयतों को, जो उसके सामने पढ़ी जायें सुने, फिर भी वह अकड़ता हुआ (कुफ़्र पर) अड़ा रहे, जैसे कि उन्हें सुना ही न हो! तो आप उसे दुःखदायी यातना की सूचना पहुँचा दें।
45:9जुज़ 25 · पृ. 499

وَإِذَا عَلِمَ مِنْ آيَاتِنَا شَيْئًا اتَّخَذَهَا هُزُوًا ۚ أُولَٰئِكَ لَهُمْ عَذَابٌ مُهِينٌ9

और जब, उसे ज्ञान हो हमारी किसी आयत का, तो उसे उपहास बना ले। यही हैं, जिनके लिए अपमानकारी यातना है।
45:10जुज़ 25 · पृ. 499

مِنْ وَرَائِهِمْ جَهَنَّمُ ۖ وَلَا يُغْنِي عَنْهُمْ مَا كَسَبُوا شَيْئًا وَلَا مَا اتَّخَذُوا مِنْ دُونِ اللَّهِ أَوْلِيَاءَ ۖ وَلَهُمْ عَذَابٌ عَظِيمٌ10

तथा उनके आगे नरक है और नहीं काम आयेगा उनके, जो कुछ उन्होंने कमाया है और न जिसे उन्होंने अल्लाह के सिवा संरक्षक बनाया है और उन्हीं के लिए कड़ी यातना है।
45:11जुज़ 25 · पृ. 499

هَٰذَا هُدًى ۖ وَالَّذِينَ كَفَرُوا بِآيَاتِ رَبِّهِمْ لَهُمْ عَذَابٌ مِنْ رِجْزٍ أَلِيمٌ11

ये (क़ुर्आन) मार्गदर्शन है तथा जिन्होंने कुफ़्र किया अपने पालनहार की आयतों के साथ, तो उन्हीं के लिए यातना है, दुःखदायी यातना।
45:12जुज़ 25 · पृ. 499

۞ اللَّهُ الَّذِي سَخَّرَ لَكُمُ الْبَحْرَ لِتَجْرِيَ الْفُلْكُ فِيهِ بِأَمْرِهِ وَلِتَبْتَغُوا مِنْ فَضْلِهِ وَلَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ12

अल्लाह ही ने वश में किया है तुम्हारे लिए सागर को, ताकि नाव चलें उसमें उसके आदेश से और ताकि तुम खोज करो उसके अनुग्रह (दया) की और ताकि तुम उसके कृतज्ञ (आभारी) बनो।
45:13जुज़ 25 · पृ. 499

وَسَخَّرَ لَكُمْ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ جَمِيعًا مِنْهُ ۚ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَآيَاتٍ لِقَوْمٍ يَتَفَكَّرُونَ13

तथा उसने तुम्हारी सेवा में लगा रखा है, जो कुछ आकाशों तथा धरती में है, सबको अपनी ओर से। वास्तव में, इसमें बहुत-सी निशानियाँ हैं, उनके लिए, जो सोच-विचार करें।
45:14जुज़ 25 · पृ. 500

قُلْ لِلَّذِينَ آمَنُوا يَغْفِرُوا لِلَّذِينَ لَا يَرْجُونَ أَيَّامَ اللَّهِ لِيَجْزِيَ قَوْمًا بِمَا كَانُوا يَكْسِبُونَ14

(हे नबी!) आप उनसे कह दें जो ईमान लाये हैं कि क्षमा कर[1] दें उन्हें, जो आशा नहीं रखते हैं अल्लाह के दिनों[2] की, ताकि वह बदला दे एक समुदाय को उनकी कमाई का।
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1. अर्थात उन की ओर से जो दुःख पहुँचता है। 2. अल्लाह के दिनों से अभिप्राय वे दिन हैं जिन में अल्लाह ने अपराधियों को यातनायें दी हैं। (देखियेःसूरह इब्राहीम, आयतः 5)
45:15जुज़ 25 · पृ. 500

مَنْ عَمِلَ صَالِحًا فَلِنَفْسِهِ ۖ وَمَنْ أَسَاءَ فَعَلَيْهَا ۖ ثُمَّ إِلَىٰ رَبِّكُمْ تُرْجَعُونَ15

जिसने सदाचार किया, तो अपने भले के लिए किया तथा जिसने दुराचार किया, तो अपने ऊपर किया। फिर तुम (प्रतिफल के लिए) अपने पालनहार की ओर ही फेरे[1] जाओगे।
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1. अर्थात प्रलय के दिन। जिस अल्लाह ने तुम्हें पैदा किया है उसी के पास तुम्हें जाना भी है।
45:16जुज़ 25 · पृ. 500

وَلَقَدْ آتَيْنَا بَنِي إِسْرَائِيلَ الْكِتَابَ وَالْحُكْمَ وَالنُّبُوَّةَ وَرَزَقْنَاهُمْ مِنَ الطَّيِّبَاتِ وَفَضَّلْنَاهُمْ عَلَى الْعَالَمِينَ16

तथा हमने प्रदान की इस्राईल की संतान को पुस्तक तथा राज्य और नबूअत (दूतत्व) और जीविका दी उन्हें, स्वच्छ चीज़ों से तथा प्रधानता दी उन्हें (उनके युग के) संसारवासियों पर।
45:17जुज़ 25 · पृ. 500

وَآتَيْنَاهُمْ بَيِّنَاتٍ مِنَ الْأَمْرِ ۖ فَمَا اخْتَلَفُوا إِلَّا مِنْ بَعْدِ مَا جَاءَهُمُ الْعِلْمُ بَغْيًا بَيْنَهُمْ ۚ إِنَّ رَبَّكَ يَقْضِي بَيْنَهُمْ يَوْمَ الْقِيَامَةِ فِيمَا كَانُوا فِيهِ يَخْتَلِفُونَ17

तथा दिये हमने उन्हें, खुले आदेश। तो उन्होंने विभेद नहीं किया, परन्तु अपने पास ज्ञान[1] आ जाने के पश्चात्, आपस के द्वेष के कारण। निःसंदेह आपका पालनहार ही निर्णय करेगा उनके बीच परलय के दिन, जिस बात में वे विभेद कर रहे हैं।
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1. अर्थात वैध तथा अवैध, और सत्योसत्य का ज्ञान आ जाने के पश्चात्।
45:18जुज़ 25 · पृ. 500

ثُمَّ جَعَلْنَاكَ عَلَىٰ شَرِيعَةٍ مِنَ الْأَمْرِ فَاتَّبِعْهَا وَلَا تَتَّبِعْ أَهْوَاءَ الَّذِينَ لَا يَعْلَمُونَ18

फिर (हे नबी!) हमने कर दिया आपको एक खुले धर्म विधान पर, तो आप अनुसरण करें इसका तथा न चलें उनकी आकांक्षाओं पर, जो ज्ञान नहीं रखते।
45:19जुज़ 25 · पृ. 500

إِنَّهُمْ لَنْ يُغْنُوا عَنْكَ مِنَ اللَّهِ شَيْئًا ۚ وَإِنَّ الظَّالِمِينَ بَعْضُهُمْ أَوْلِيَاءُ بَعْضٍ ۖ وَاللَّهُ وَلِيُّ الْمُتَّقِينَ19

वास्तव में, वे आपके काम न आयेंगे अल्लाह के सामने कुछ। ये अत्याचारी एक-दूसरे के मित्र हैं और अल्लाह आज्ञाकारियों का साथी है।
45:20जुज़ 25 · पृ. 500

هَٰذَا بَصَائِرُ لِلنَّاسِ وَهُدًى وَرَحْمَةٌ لِقَوْمٍ يُوقِنُونَ20

ये (क़ुर्आन) सूझ की बातें हैं, सब मनुष्यों के लिए तथा मार्गदर्शन एवं दया है, उनके लिए, जो विश्वास करें।
45:21जुज़ 25 · पृ. 500

أَمْ حَسِبَ الَّذِينَ اجْتَرَحُوا السَّيِّئَاتِ أَنْ نَجْعَلَهُمْ كَالَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ سَوَاءً مَحْيَاهُمْ وَمَمَاتُهُمْ ۚ سَاءَ مَا يَحْكُمُونَ21

क्या समझ रखा है जिन्होंने दुष्कर्म किया है कि हम कर देंगे उन्हें उनके समान, जो ईमान लाये तथा सदाचार किये हैं कि उनका जीवन तथा मरण समान[1] हो जाये? वे बुरा निर्णय कर रहे हैं।
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1. अर्थात दोनों के परिणाम में अवश्य अन्तर होगा।
45:22जुज़ 25 · पृ. 500

وَخَلَقَ اللَّهُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ بِالْحَقِّ وَلِتُجْزَىٰ كُلُّ نَفْسٍ بِمَا كَسَبَتْ وَهُمْ لَا يُظْلَمُونَ22

तथा पैदा किया है अल्लाह ने आकाशों एवं धरती को, न्याय के साथ और ताकि बदला दिया जाये प्रत्येक प्राणी को, उसके कर्म का तथा उनपर अत्याचार नहीं किया जायेगा।
45:23जुज़ 25 · पृ. 501

أَفَرَأَيْتَ مَنِ اتَّخَذَ إِلَٰهَهُ هَوَاهُ وَأَضَلَّهُ اللَّهُ عَلَىٰ عِلْمٍ وَخَتَمَ عَلَىٰ سَمْعِهِ وَقَلْبِهِ وَجَعَلَ عَلَىٰ بَصَرِهِ غِشَاوَةً فَمَنْ يَهْدِيهِ مِنْ بَعْدِ اللَّهِ ۚ أَفَلَا تَذَكَّرُونَ23

क्या आपने उसे देखा, जिसने बना लिया अपना पूज्य अपनी इच्छा को तथा कुपथ कर दिया अल्लाह ने उसे जानते हुए और मुहर लगा दी उसके कान तथा दिल पर और बना दिया उसकी आँख पर आवरण (पर्दा)? फिर कौन है, जो सीधी राह दिखायेगा उसे अल्लाह के पश्चात्? तो क्या तुम शिक्षा ग्रहण नहीं करते?
45:24जुज़ 25 · पृ. 501

وَقَالُوا مَا هِيَ إِلَّا حَيَاتُنَا الدُّنْيَا نَمُوتُ وَنَحْيَا وَمَا يُهْلِكُنَا إِلَّا الدَّهْرُ ۚ وَمَا لَهُمْ بِذَٰلِكَ مِنْ عِلْمٍ ۖ إِنْ هُمْ إِلَّا يَظُنُّونَ24

तथा उन्होंने कहा कि हमारा यही सांसारिक जीवन है। हम यहीं मरते और जीते हैं और हमारा विनाश, युग (काल) ही करता है। उन्हें इसका ज्ञान नहीं। वे केवल अनुमान की बात[1] कर रहे हैं।
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1. ह़दीस में है कि अल्लाह फ़रमाता है कि मनुष्य मुझे बुरा कहता है। वह युग को बुरा कहता है जब कि युग मैं हूँ। रात और दिन मेरे हाथ में हैं। (सह़ीह़ बुख़ारीः6181) ह़दीस का अर्थ यह है कि युग को बुरा कहना अल्लाह को बुरा कहना है। क्योंकि युग में जो होता है उसे अल्लाह ही करता है।
45:25जुज़ 25 · पृ. 501

وَإِذَا تُتْلَىٰ عَلَيْهِمْ آيَاتُنَا بَيِّنَاتٍ مَا كَانَ حُجَّتَهُمْ إِلَّا أَنْ قَالُوا ائْتُوا بِآبَائِنَا إِنْ كُنْتُمْ صَادِقِينَ25

और पढ़कर सुनाई जाती हैं उन्हें, हमारी खुली आयतें, तो उनका तर्क केवल ये होता है कि ले आओ हमारे पूर्वजों को, यदि तुम सच्चे हो।
45:26जुज़ 25 · पृ. 501

قُلِ اللَّهُ يُحْيِيكُمْ ثُمَّ يُمِيتُكُمْ ثُمَّ يَجْمَعُكُمْ إِلَىٰ يَوْمِ الْقِيَامَةِ لَا رَيْبَ فِيهِ وَلَٰكِنَّ أَكْثَرَ النَّاسِ لَا يَعْلَمُونَ26

आप कह दें: अल्लाह ही तुम्हें जीवन देता तथा मारता है, फिर एकत्र करेगा तुम्हें प्रलय के दिन, जिसमें कोई संदेह नहीं। परन्तु अधिक्तर लोग (इस तथ्य को) नहीं[1] जानते।
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1. आयत का अर्थ यह है कि जीवन और मौत देना अल्लाह के हाथ में है। वही जीवन देता है तथा मारता है। और उस ने संसार में मरने के बाद प्रलय के दिन फिर जीवित करने का समय रखा है। ताकि उन के कर्मों का प्रतिफल प्रदान करे।
45:27जुज़ 25 · पृ. 501

وَلِلَّهِ مُلْكُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ ۚ وَيَوْمَ تَقُومُ السَّاعَةُ يَوْمَئِذٍ يَخْسَرُ الْمُبْطِلُونَ27

तथा अल्लाह ही का है आकाशों तथा धरती का राज्य और जिस दिन स्थापना होगी प्रलय की, तो उस दिन क्षति में पड़ जायेंगे झूठे।
45:28जुज़ 25 · पृ. 501

وَتَرَىٰ كُلَّ أُمَّةٍ جَاثِيَةً ۚ كُلُّ أُمَّةٍ تُدْعَىٰ إِلَىٰ كِتَابِهَا الْيَوْمَ تُجْزَوْنَ مَا كُنْتُمْ تَعْمَلُونَ28

तथा देखेंगे आप प्रत्येक समुदाय को घुटनों के बल गिरा हुआ। प्रत्येक समुदाय पुकारा जायेगा अपने कर्म-पत्र की ओर। आज, बदला दिया जायेगा तुम लोगों को, तुम्हारे कर्मों का।
45:29जुज़ 25 · पृ. 501

هَٰذَا كِتَابُنَا يَنْطِقُ عَلَيْكُمْ بِالْحَقِّ ۚ إِنَّا كُنَّا نَسْتَنْسِخُ مَا كُنْتُمْ تَعْمَلُونَ29

ये हमारा कर्म-पत्र है, जो बोल रहा है तुमपर सह़ीह़ बात। वास्तव में, हम लिखवा रहे थे, जो कुछ तुम कर रहे थे।
45:30जुज़ 25 · पृ. 501

فَأَمَّا الَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ فَيُدْخِلُهُمْ رَبُّهُمْ فِي رَحْمَتِهِ ۚ ذَٰلِكَ هُوَ الْفَوْزُ الْمُبِينُ30

तो जो ईमान लाये तथा सदाचार किये, उन्हें प्रवेश देगा उनका पालनहार अपनी दया में, यही प्रत्यक्ष (खुली) सफलता है।
45:31जुज़ 25 · पृ. 501

وَأَمَّا الَّذِينَ كَفَرُوا أَفَلَمْ تَكُنْ آيَاتِي تُتْلَىٰ عَلَيْكُمْ فَاسْتَكْبَرْتُمْ وَكُنْتُمْ قَوْمًا مُجْرِمِينَ31

परन्तु जिन्होंने कुफ़्र किया, (उनसे कहा जायेगाः) क्या मेरी आयतें तुम्हें पढ़कर नहीं सुनायी जा रही थीं? तो तुमने घमंड किया तथा तुम अपराधी बनकर रहे?
45:32जुज़ 25 · पृ. 501

وَإِذَا قِيلَ إِنَّ وَعْدَ اللَّهِ حَقٌّ وَالسَّاعَةُ لَا رَيْبَ فِيهَا قُلْتُمْ مَا نَدْرِي مَا السَّاعَةُ إِنْ نَظُنُّ إِلَّا ظَنًّا وَمَا نَحْنُ بِمُسْتَيْقِنِينَ32

तो जब कहा जाता था कि निश्चय अल्लाह का वचन सच है तथा प्रलय होने में तनिक भी संदेह नहीं, तो तुम कहते थे कि प्रलय क्या है? हम तो केवल एक अनुमान रखते हैं तथा हम विश्वास करने वाले नहीं हैं।
45:33जुज़ 25 · पृ. 502

وَبَدَا لَهُمْ سَيِّئَاتُ مَا عَمِلُوا وَحَاقَ بِهِمْ مَا كَانُوا بِهِ يَسْتَهْزِئُونَ33

तथा खुल जायेंगी उनके लिए, उनके दुष्कर्मों की बुराईयाँ और घेर लेगा उन्हें, जिसका वे उपहास कर रहे थे।
45:34जुज़ 25 · पृ. 502

وَقِيلَ الْيَوْمَ نَنْسَاكُمْ كَمَا نَسِيتُمْ لِقَاءَ يَوْمِكُمْ هَٰذَا وَمَأْوَاكُمُ النَّارُ وَمَا لَكُمْ مِنْ نَاصِرِينَ34

और कहा जायेगा कि आज हम तुम्हें भुला देंगे,[1] जैसे तुमने इस दिन से मिलने को भुला दिया और तुम्हारा कोई सहायक नहीं है।
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1. जैसे ह़दीस में आता है अल्लाह अपने कुछ बंदों से कहेगाः क्या मैं ने तुम्हें पत्नी नहीं दी थी? क्या मैं ने तुम्हें सम्मान नहीं दिया था? क्या मैं ने घोड़े तथा बैल इत्यादि तेरे आधीन नहीं किये थे? तू सरदारी भी करता तथा चुंगी भी लेता रहा। वह कहेगाः हाँ ये सह़ीह़ है, हे मेरे पालनहार! फिर अल्लाह उस से प्रश्न करेगाः क्या तुम्हें मुझ से मिलने का विश्वास था? वह कहेगाः "नहीं!" अल्लाह फ़रमायेगाः (तो आज मैं तुझे नरक में डाल कर भूल जाऊँगा जैसे तू मुझे भूला रहा। (सह़ीह़ मुस्लिमः 2968)
45:35जुज़ 25 · पृ. 502

ذَٰلِكُمْ بِأَنَّكُمُ اتَّخَذْتُمْ آيَاتِ اللَّهِ هُزُوًا وَغَرَّتْكُمُ الْحَيَاةُ الدُّنْيَا ۚ فَالْيَوْمَ لَا يُخْرَجُونَ مِنْهَا وَلَا هُمْ يُسْتَعْتَبُونَ35

ये (यातना) इस कारण है कि तुमने बना लिया था अल्लाह की आयतों को उपहास तथा धोखे में रखा तुम्हें सांसारिक जीवन ने। तो आज वे नहीं निकाले जायेंगे (यातना से) और न उन्हें क्षमा माँगने का अवसर दिया जायेगा।[1]
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1. अर्थात अल्लाह की निशानियों तथा आदेशों का उपहास तथा दुनिया के धोखे में लिप्त रहना। यह दो अपराध ऐसे हैं जिन्होंने तुम्हें नरक की यातना का पात्र बना दिया। अब उस से निकलने की संभावना नहीं तथा न इस बात की आशा है कि किसी प्रकार तुम्हें तौबा तथा क्षमा याचना का अवसर प्रदान कर दिया जाये और तुम क्षमा माँग कर अल्लाह को मना लो।
45:36जुज़ 25 · पृ. 502

فَلِلَّهِ الْحَمْدُ رَبِّ السَّمَاوَاتِ وَرَبِّ الْأَرْضِ رَبِّ الْعَالَمِينَ36

तो अल्लाह के लिए सब प्रशंसा है, जो आकाशों तथा धरती का पालनहार एवं सर्वलोक का पनालनहार है।
45:37जुज़ 25 · पृ. 502

وَلَهُ الْكِبْرِيَاءُ فِي السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ ۖ وَهُوَ الْعَزِيزُ الْحَكِيمُ37

और उसी की महिमा[1] है आकाशों तथा धरती में और वही प्रबल और सब गुणों को जानने वाला है।
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1. अर्थात महिमा और बड़ाई अल्लाह के लिये विशेष है। जैसा कि एक ह़दीस क़ुद्सी में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है कि महिमा मेरी चादर है तथा बड़ाई मेरा तहबंद है। और जो भी इन दोनों में से किसी एक को मुझ से खींचेगा तो मैं उसे नरक में फेंक दूँगा। (सह़ीह़ मुस्लिमः 2620)

सूरह के आरंभ से चलाएँ